ध्यानचंद से पहले सचिन को भारत रत्न क्यों

Share Article

कांग्रेस पार्टी ने देश के बहुत से संस्थानों को बर्बाद कर दिया यहां तक कि देश का सर्वोच्च पुरस्कार को भी नहीं छोड़ा. सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने का निर्णय उन्होंने कर लिया लेकिन ध्यानचंद के नाम को दरकिनार कर दिया, सचिन आज जितने बड़े भी खिलाड़ी क्यों न हों लेकिन ध्यानचंद का कद आज भी उनसे बहुत बड़ा है. सरकार ने सचिन को ध्यानचंद से पहले भारत रत्न देकर सरकार ने भारत के सर्वोच्च सम्मान का अपमान किया है, इस सम्मान का निर्णय किसी परिवार की डायनिंग टेबल पर नहीं किया जा सकता. यदि ऐसा हुआ है, तो यह भारत रत्न की छवि को धूमिल करता है.

sachin-bharatवर्ष 2011 में भारत रत्न दिए जाने के नियमों में कुछ मूलभूत बदलाव किए गए थे, जिन क्षेत्र के लोगों को यह सम्मान दिया जाता है उसमें मूलभूत बदलाव किए गए थे. जब सरकार ने यह कदम उठाया गया तब यह आशा की गई थी कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न मिलने का रास्ता साफ हो गया है, जल्दी ही वह भारत रत्न से पुरस्कृत होने वाले पहले खिलाड़ी होंगे. ऐसा लोगों का इसलिए भी मानना था, क्योंकि ध्यानचंद देश ऐसे पहले खिलाड़ी थे जिन्हें केवल देश में ही नहीं विदेश में भी ख्याति प्राप्त थी. लेकिन विडंबना यह है कि भारत को आजादी से पहले दुनिया में सम्मान दिलाने वाले खिलाड़ी की लगातार अनदेखी की गई और हॉकी के जादूगर को भारत रत्न नहीं दिया गया. लेकिन क्रिकेट के जादूगर मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को उनके 200 वां टेस्ट मैच खेलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के ठीक अगले दिन ही भारत रत्न दिए जाने की घोषणा कर दी गई. खेल प्रेमी सरकार के इस फैसले से खुश भी थे और दुखी भी. खेल प्रमी चाहते थे कि भारत रत्न सबसे पहले उस खिलाड़ी को मिले जिसने गुलामी के दौर में भी भारत को दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई और भारतीय हॉकी को उसके सबसे ऊंचे मुकाम पर पहुंचा दिया. ऐसी सफलता भारत को आज भी किसी खेल में नहीं मिल सकी है.

वर्ष 2011 में ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की मांग में तेजी आई. इसके बाद भारत रत्न के प्रावधान में संशोधन करते हुए खिलाड़ियों को भी इस पुरस्कार से नवाजे जा सकने का प्रावधान किया गया. यह बदलाव मुख्यरुप से ध्यानचंद को ध्यान में रखकर किया गया था. 2013 में खेल मंत्री द्वारा उनके नाम की अनुशंसा किए जाने से पहले तक कई बार लोग ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की मांग करते रहे हैं. खेल मंत्रालय ने इसके लिए पहल भी की. 16 जुलाई, 2013 को तत्कालीन खेल मंत्री जितेंद्र सिंह ने ध्यानचंद को मरणोपरांत भारत रत्न दिए जाने की अनुशंसा एक पत्र लिखकर प्रधानमंत्री कार्यालय से की थी. इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में भी सहमति थी. लेकिन ध्यानचंद के मान को दरकिनार करते हुए सरकार ने 24 घंटे के अंदर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने का निर्णय कर लिया. इसके पीछे क्या कारण हैं? पिछले साल ध्यानचंद को भारत रत्न से नवाजे जाने का फैसला लगभग हो ही गया था, लेकिन सचिन तेंदुलकर के सन्यास की घोषणा करने से अचानक सब कुछ बदल गया. 24 अक्टूबर 2013 को जाने माने वैज्ञानिक सी एन आर राव के नाम को प्रधानमंत्री की स्वीकृति मिल चुकी थी, लेकिन 14 नवंबर 2013 अचानक खेल मंत्रालय को सचिन का बायोडेटा प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजने को कहा गया, खेल मंत्रालय ने इसपर त्वरित कार्रवाई करते हुए बायोडॉटा प्रधानमंत्री कार्यालय भेज दिया. नबंबर-दिसंबर के दौरान मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने थे. इस वजह से यूपीए सरकार को दोनों के नामों को स्वीकृति के लिए चुनाव आयोग भेजा, इसे चुनाव आयोग ने भी बिना किसी विलंब के अपनी स्वीकृति दे दी और सचिन को भारत रत्न देने का रास्ता साफ कर दिया.

स्वर्गीय मेजर ध्यानचंद मरणोपरांत भारत रत्न पाने के सबसे काबिल उम्मीदवार हैं. उन्होंने खेल के क्षेत्र में उच्च स्तरीय प्रदर्शन किया है जिससे देश गौरान्वित हुआ है. उनके चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण ही उन्हें हॉकी के जादूगर के नाम से जाना जाता है. जिस दौर में वह हॉकी खेला करते थे वह भारतीय हॉकी का स्वर्णिम दौर था. वह न कवल एक बेहतरीन खिलाड़ी थे बल्कि वह टीम के एक बेहतरीन सदस्य भी थे. हॉकी के मैदान में अपने  बेहतरीन खेल की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें बहुत प्रशंसा और सम्मान मिला.

इस विवाद ने इस वजह से तूल पकड़ा, क्योंकि सूचना के अधिकार के अंतर्गत खेल मंत्रालय का लिखा एक पीएमओ का एक दस्तावेज सामने आया है कि खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद नाम की अनुशंसा की थी न कि सचिन तेंदुलकर के नाम की. आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल को मिली सूचनाओं से यह भी मालूम होता है कि खेल मंत्रालय द्वारा की गई अन्य अनुशंसाओं को भी प्रधानमंत्री कार्यालय ने नज़रअंदाज कर दिया. जिसमें उड़नपरी पीटी ऊषा और शतरंज खिलाड़ी विश्‍वनाथन आनंद के नाम भी शामिल थे. इस पुरस्कार के लिए की जाने वाली अनुशंसाएं पूरी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय पर निर्भर होती हैं. अधिकारी किसी भी तीसरे पक्ष के साथ सुझाव के लिए बातचीत करने के लिए स्वतंत्र होते हैं. इसके बाद जिन नामों पर राष्ट्रपति सहमत होते हैं उन नामों की सूची राष्ट्रपति सचिवालय जारी करता है.
खेल मंत्री जितेंद्र सिंह ने 16 जुलाई,2013 को जो पत्र लिखा था उसमें उन्होंने कहा था कि ध्यानचंद के नाम पर भारत रत्न पुरस्कार के लिए उनके भारत में खेलों में उनके योगदान के लिए विचार किया जाना चाहिए. उन्होंने देश को तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलाने में योगदान दिया. स्वर्गीय मेजर ध्यानचंद मरणोपरांत भारत रत्न पाने के सबसे काबिल उम्मीदवार हैं. उन्होंने खेल के क्षेत्र में उच्च स्तरीय प्रदर्शन किया है जिससे देश गौरान्वित हुआ है. उनके चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण ही उन्हें हॉकी के जादूगर के नाम से जाना जाता है. जिस दौर में वह हॉकी खेला करते थे वह भारतीय हॉकी का स्वर्णिम दौर था. वह न केवल एक बेहतरीन खिलाड़ी थे बल्कि वह टीम के एक बेहतरीन सदस्य भी थे. हॉकी के मैदान में अपने बेहतरीन खेल की वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें बहुत प्रशंसा और सम्मान मिला. वे बेहद सामान्य, विनम्र और निःस्वार्थ व्यक्ति थे. उनकी उपलब्धियों का सम्मान करते हुए देश का एक प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार लाइफटाइम एचीवमेंट पुरस्कार उनके नाम पर दिया जाता है, यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिन्होंने खिलाड़ी के रुप में बेहतरीन प्रदर्शन किया और संन्यास के बाद भी खेलों से जुड़े रहे, इसके अलावा उनके जन्मदिन को देश में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में बनाया जाता है. प्रधानमंत्री खेल मंत्री जितेंद्र सिंह के पत्र से बहुत खुश हुए और पत्र को प्रिंसिपल सेक्रेटरी के पास अग्रिम कार्रवाई के लिए भेज दिया. दुर्भाग्यवश वह पत्र नौकरशाहों के बीच कहीं खो गया. इसके एक महीने बाद अगस्त 2013 में प्रधानमंत्री कार्यालय के तत्कालीन निदेशक राजीव टोपनो ने कहा कि इस मसले(ध्यानचंद) को प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव के समक्ष दिसंबर में पद्म पुरस्कारों की सूची को अंतिम रुप देते वक्त रखा जाएगा. लेकिन इसके बाद इस मसले पर एक बार फिर से खामोशी छा गई. 14 नवंबर 2014 को राजीव टोपनो ने खेल मंत्रालय से सचिन तेंदुलकर का प्रोफाइल तत्काल प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजने का अनुरोध किया. जिसे कि राष्ट्रपति को भारत रत्न के लिए भेजे जाने वाले पत्र के साथ संलग्न किया जाना था. संयोगवश सचिन तेंदुलकर उसी दिन अपने करियर का आखिरी टेस्ट मुंबई में वेस्टइंडीज के खिलाफ खेल रहे थे. इसके बाद 16 नवंबर को सचिन तेंदुलकर और सीएनआर राव को भारत रत्न दिए जाने का अंतिम निर्णय हो गया. इस पूरे वाकये में यह बात साफ नहीं हुई कि प्रधानमंत्री कार्यालय और राष्ट्रपति ने भारत रत्न की घोषणा करने से पहले ध्यानचंद के नाम की चर्चा की या नहीं. लेकिन इससे एक बात तो पूरी तरह साफ हो गई कि खेल मंत्रालय भी मानता है कि ध्यानचंद सचिन से पहले भारत रत्न पाने के हकदार थे. इसी वजह से खेल मंत्रालय ने ध्यानचंद को भारत रत्न देने की सिफारिश की थी.
यूपीए सरकार ने ध्यानचंद के नाम को नज़रअंदाज कर दिया और अप्रत्याशित रुप से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दे दिया. इस पूरे मामले को देखकर तो ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए ध्यानचंद को दरकिनार कर दिया, जब सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान दिया जा रहा था तो कई लोगों ने यह सवाल उठाया कि भारत रत्न पाने के लिए सचिन तेंदुलकर से पहले यह सम्मान ध्यानचंद को दिया जाना चाहिए था, ध्यानचंद के नाम पर आम सहमति बनने के बाद अचानक से सचिन का नाम आगे आना और उन्हें भारत रत्न दिया जाना बड़ा ही नाटकीय दिखाई पड़ता है. यह फैसला भी तब किया गया जब सामान्य रूप से पुरस्कारों की घोषणा नहीं की जाती है, पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर यह निर्णय लिया गया था. खेल मंत्रालय के पत्र पर प्रधानमंत्री का सहमत होना और आग्रिम कार्यवाही के लिए पत्र भेजने के बाद भी उस पर अमल नहीं होता है, तो इसे पूरी तरह राजनीति ही कहा जाएगा. तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निजी सचिव ने अक्टूबर 2013 में आंतरिक पत्र व्यवहार में लिखा कि पीए सहमत हैं अब टीएसटी से राइट अप मंगाया जाए, मुख्यचुनाव आयुक्त से अनापत्ति ली जाए और इसके बाद पीएम की तरफ से औपचारिक संस्तुति भेजी जाए. लेकिन यहां इस बात को लेकर सवाल उठता है कि सचिन तेंदुलकर को किसके दबाव में देश का सर्वोच्च सम्मान इतनी जल्दबाजी में दिया गया और इसके लिए ध्यानचंद के नाम को क्यों दरकिनार किया गया. इस मसले पर ध्यानचंद के बेटे और पूर्व ओलंपियन अशोक कुमार का इस मसले पर कहना है कि इसे लेकर राजनीति हो रही है. यह उन हजारों लाखों लोगों के लिए निराशाजनक है कि सचिन तेंदुलकर को ध्यानचंद पर वरीयता दी गई. यह मेजर ध्यानचंद के खिलाफ खेला गया एक राजनीतिक खेल है. जिस तरह हाल ही में संपन्न हुए फीफा विश्‍वकप में मेसी को गोल्डन बॉल खिताब देने को लेकर हमवतन मैराडोना ने आपत्ति दर्ज की थी कि मेसी को गोल्डन बॉल दिया जाना मार्केटिंग का निर्णय है, शायद ऐसा ही कुछ सचिन को भारत रत्न देने में भी हुआ, यहां बाजार के फायदे के साथ-साथ राजनीतिक फायदे भी देखे गए. सरकार चाहती तो सचिन के साथ ध्यानचंद को भी भारतरत्न दे सकती थी, लेकिन देश के बड़े-बड़े नेता क्रिकेट बोर्ड में किसी ने किसी पद पर रहे हैं या रह चुके हैं, उन्हें क्रिकेट के अलावा और किसी खेल की चिंता नहीं है. संसद में बैठे लोग सिर्फ हॉकी को प्रोत्साहित करने की बात करते हैं, हॉकी की खैर खबर लेने वाला कोई भी सदन में मौजूद नहीं है, इसी वजह से यह विवाद हो रहा है और सचिन के नाम को बेवजह घसीटा जा रहा है और ध्यानचंद को दरकिनार किया जा रहा है.
ध्यानचंद का देश के लिए योगदान अविस्मरणीय है. सचिन को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी पिछले कुछ समय से चल रही थी. ऐसा नहीं है कि सचिन को भारत रत्न देने से उनका कद छोटा या बड़ा हो गया है. यहां सवाल यह है कि भारत रत्न पाने का सबसे पहला हकदार कौन था सचिन या ध्यानचंद? आज नहीं कल इस विवाद के बाद ध्यानचंद को भारत रत्न से सम्मानित कर दिया जाएगा, लेकिन यह विवाद उसी तरह का है कि राजीव गांधी को सरदार पटेल से पहले भारत रत्न दे दिया गया. दोनों ही खिलाड़ी महान हैं दोनों ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग खेलों का प्रतिनिधित्व किया, दोनों ने ही देश कौ गौरव के कई मौके दिए और देश का सम्मान बढ़ाया. बावजूद इसके ध्यानचंद का कद सचिन से कहीं ज्यादा बड़ा है, ऐसे में उनके नाम को नज़रअंदाज किया जाना दुःखद है. सरकार को पुरस्कारों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए.

You May also Like

Share Article

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *