मोहनलालगंज कांड पर राजनाथ मुलायम क्यों…!

राजनीतिक विश्‍लेषकों का तो यह कहना है कि लोस चुनाव में राजनाथ की राह को पहले मुलायम सिंह ने अहम भूमिका निभाई और केंद्र में सत्तासीन होने के बाद अब राजनाथ की बारी आ गई थी कि वे सपा प्रमुख का अहसान कैसे उतारें. प्रेक्षकों की मानें तो लोकसभा चुनाव में मात खाए मुलायम अब केंद्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को लेकर कशमकश की स्थिति में हैं.

Pradarshan-3राजधानी लखनऊ की सीमा से सटे मोहनलालगंज के बालसिंहखेड़ा गांव के एक प्राइमरी स्कूल प्रांगण में एक विधवा युवती के साथ गैंगरेप करने के बाद उसकी हत्या कर दी गई. मीडिया ने गैंगरेप व हत्या की इस घटना को दिल्ली के दामिनी कांड से भी वीभत्स बताया तब जाकर उत्तर प्रदेश पुलिस हरकत में आई. और उदासीन पड़े शासन-प्रशासन भी इस वारदात को लेकर तेजी बरतना शुरू की. अंत में
गाहे-बगाहे सपा सरकार भी चौतरफा दबाव के बाद गैंगरेप की इस घटना को लेकर गंभीर होती है और पुलिस प्रशासन को पारदर्शी ढंग से इस मामले की गहन जांच करने का फरमान जारी करती है. लेकिन राजनीतिक गलियारे से लेकर लखनऊ के आम लोगों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर मोहनलालगंज कांड पर केंद्रीय गृहमंत्री और लखनऊ संसदीय के सांसद राजनाथ सिंह का रुख इतना मुलायम क्यों हैं! इस संवेदनशील कांड पर केंद्रीय गृह मंत्री की चुप्पी का राज क्या है? कहीं इसकी वजह राजनाथ की मुलायम से नजदीकियां तो नहीं?
यहां सवाल उठना भी लाज़िमी है क्योंकि राजनाथ सिंह बतौर केंद्रीय गृह मंत्री पूरे देश की निगरानी के लिए स्थापित क़ानून-व्यवस्था की निगरानी तंत्र के मुखिया हैं. हालांकि जिस क्षेत्र में यह जघन्य कांड हुआ है वह राजधानी लखनऊ से तकरीबन 15-16 किमी की दूरी पर स्थित है. मोहनलालगंज संसदीय सीट भी भाजपा के ही कब्जे में है. ग़ौरतलब है कि मोहनलालगंज प्रकरण को लेकर अभी तक गृह मंत्रालय ने यूपी सरकार से मात्र एक औपचारिक रिपोर्ट ही तलब की है, यानी महज खानापूर्ती. इस मामले की रिपोर्ट कब पूरी होगी, जबकि स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संज्ञान में आने व उनके बार-बार निर्देश देने के बावजूद इस कांड की जांच-पड़ताल की गुत्थी सुलझने के बजाए दिन-ब-दिन उलझती ही जा रही है. कभी पुलिसिया जांच में यह बताया जाता है कि युवति के साथ गैंगरेप नहीं हुआ, यह केवल एक व्यक्ति की करतूत है. बहरहाल मामले की जांच अभी चल रही है. लेकिन गुत्थी सुलझने की बजाए उलझती चली जा रही है. मृतका के परिजन व तमाम सामाजिक संगठन रोजाना प्रर्दशन करके मामले की निष्पक्ष जांच करने की मांग कर रहे हैं. नतीजतन, यूपी में बदहाल होती
कानून-व्यवस्था खासकर महिला सुरक्षा को लेकर हर दिन अखिलेश सरकार को कभी विरोधी राजनीतिक दलों के तो कभी सामाजिक संगठनों के बगावती सुर सुनने पड़ रहे हैं. सड़क से लेकर विधानसभा तक मोहनलालगंज कांड की गूंज सुनाई पड़ रही है. सारे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी.
इस सब से इतर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इस मामले के साथ साथ उत्तर प्रदेश में ध्वस्त होती कानून-व्यवस्था के मसले पर चुप्पी साध रखी है. यहां सवाल यह उठता है कि लोकसभा चुनाव के दौरान और उससे पहले प्रदेश की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर राजनाथ सिंह सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर लगातार कटाक्ष कर रहे थे, लेकिन अचानक उनके रुख में नरमी कैसे आ गई. सपा सरकार के खिलाफ वह कठोर बयान क्यों नहीं दे रहे हैं. जबकि प्रदेश में आपराधिक वारदातों की बाढ़ सी आ गई है. आलम यह है कि मोहनलालगंज गैंगरेप पर पहले विवादास्पद बयान देने वाले यूपी के पूर्व कार्यवाहक राज्यपाल अज़ीज कुरैशी ने भी प्रदेश से विदा होते-होते ही इस प्रकरण की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाया था. अब भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ मराठी नेता राम नाईक ने प्रदेश के राज्यपाल की कमान संभाल ली है, उन्होंने पहले भी यूपी की अनियंत्रित होती कानून-व्यवस्था पर चिंता जाहिर की थी.
राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो यूपी की डामाडोल होती कानून-व्यवस्था पर राजनाथ की चुप्पी के पीछे मुलायम से उनकी नजदीकी एक बहुत बड़ी वजह है. गृह मंत्री बनने के बाद पिछले दिनों राजनाथ सिंह लखनऊ आए थे तब कुछ मीडियाकर्मियों ने लगातार बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था के नाम पर अखिलेश सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने का सवाल किया तो राजनाथ सिंह ने महज यह कहकर इस सवाल को टाल दिया था कि समय आने पर देखा जाएग और साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सपा सरकार की नीयत में कोई गड़बड़ी नहीं है. वहीं मुलायम-राजनाथ के पुराने नजदीकी संबंधों को लेकर यूपी भाजपा के ही एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि इसी दोस्ती की वजह से लोकसभा चुनाव के लिए एक साल पहले से घोषित लखनऊ लोकसभा सीट से सपा डॉ. अशोक बाजपेयी को हटाकर अंतिम समय में अखिलेश सरकार में मंत्री प्राफेसर अभिषेक मिश्रा को लखनऊ से उम्मीदवार बना दिया था, परिणामस्वरूप सपा उम्मीदवार के रूप में अभिषेक राजनाथ के आसपास कहीं ठहर नहीं पाए और वोटकटुआ की भूमिका निभाते हुए भाजपा प्रत्याशी को कड़ी टक्कर देने की कुव्वत रखने वाली कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. रीता बहुगुणा जोशी के ब्राह्मण वोटरों को काफी हद तक अपनी ओर खींच लिया. लोकसभा चुनाव के पूर्व जब भी राजनाथ लखनऊ पहुंचे उन्होंने विशेषकर कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सपा सरकार को जमकर घेरा. यहां तक कि प्रदेश भाजपा की टीम ने भी इस मुद्दे पर लगातार सपा सरकार पर पलटवार किया. लेकिन जब मोहनलालगंज कांड को लेकर मीडिया से लेकर देश-प्रदेश के तमाम नागरिक संगठन और यहां तक कि दिखावटी ही सही प्रदेश सरकार भी हरकत में दिख रही है, तो केंद्र में बैठे राजनाथ औपचारिक भूमिका क्यों निभा रहे हैं?
राजनीतिक विश्‍लेषकों का तो यह कहना है कि लोस चुनाव में राजनाथ की राह में पहले मुलायम सिंह ने अहम भूमिका निभाई और केंद्र में सत्तासीन होने के बाद अब राजनाथ की बारी आ गई थी कि वे सपा प्रमुख का अहसान कैसे उतारें. प्रेक्षकों की मानें तो लोकसभा चुनाव में मात खाए मुलायम अब केंद्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को लेकर कशमकश की स्थिति में हैं. ऐसे में उनकी और समस्त समाजवादी पार्टी की उम्मीदों की साइकिल अखिलेश सरकार के प्रदर्शन पर आकर टिक गई है. वर्तमान सपा सरकार का कार्यकाल लगभग आधा बीत चुका है. ऐसे में मुलायम व अखिलेश के अलावा पूरी सपा के राजनीतिक अस्तित्व का आधार अब यूपी ही रह गया है. ऐेसे में प्रदेश में बदहाल कानून-व्यवस्था को लेकर सपा सरकार पर चौतरफा दबाव बना हुआ है. यदि शासनकाल के बीच में ही केंद्र की सिफारिश पर यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है, तो सपा प्रमुख की बेचैनी बढ़ना लाज़िमी है. अब यही वक्त है जब राजनाथ मुलायम के काम आ सकते हैं.

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