वित्त मंत्री जी, आप मिसाल बन सकते हैं

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Santosh-Sirजबसे स्विटजरलैंड में काले धन की बात चली है, तबसे यह माहौल बना है कि अगर वह सारा धन देश में वापस आ जाए, तो हमारी सारी समस्याएं हल हो जाएंगी. हमें टैक्स नहीं देना पड़ेगा और विकास में हम किसी भी विकासशील देश के मुकाबले खड़े होने की ताकत पैदा कर लेंगे. हालांकि, अभी किसी को पता नहीं है कि विदेशों में भारत का कितना काला धन जमा है. इस जमा धन में बहुत सारा धन बेनामी है, जिसके वारिसों को यह धन कभी नहीं मिलने वाला. इसका मात्र एक कारण है कि जिन राजनीतिज्ञों या धनाढ्यों ने स्विटजरलैंड में हवाला से पैसा भेजा और वहां के बैंक में जमा कराया, उनमें से बहुतों ने इस डर से कि उनके वारिसों में झगड़ा न खड़ा हो जाए या उनके इस जमा धन के बारे में कोई सरकार को न बता दे या फिर इस धन के लालच में उनकी खुद की हत्या न हो जाए, अपना यह राज अपने परिवार वालों से भी नहीं बताया. संयोग से उनमें से कईयों की मृत्यु हो चुकी है और मृत्यु से पहले वे उस नंबर को, जिसे बैंक आईडेंटिफिकेशन नंबर कहते हैं, कहां रखा है, बता नहीं पाए. पर जितना धन अभी ज़िंदा लोगों का है, वह भी काफी है. अब सरकार चुनाव से पहले किए हुए राजनीतिक वादे से पीछे हट रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे थे, तो उन्होंने कहा था, हम विदेशों से काला धन वापस लेकर आएंगे. श्री लालकृष्ण आडवाणी और बाबा रामदेव इसके लिए लगातार लोगों से वादे करते रहे, पर अब यह कहा जा रहा है, खासकर वित्त मंत्री की तरफ़ से कि काला धन वापस आना मुश्किल है. कितनी संख्या है, यह भी नहीं बताई जा सकती, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को ध्यान में रखकर हमारे कुछ देशों के साथ ऐसे ही संबंध बने हैं.
श्री अरुण जेटली, आपकी छवि देश के व्यापारिक घरानों के साथ सबसे ज़्यादा संबंध रखने वाले नेता की रही है. आपने अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में सुप्रीम कोर्ट में जितने मुकदमे लड़े, उनमें से ज़्यादातर इन बड़े घरानों से जुड़े मुकदमे रहे हैं. यह आपका प्रोफेशन था, इसमें कोई बुराई नहीं है, पर जब आप देश के वित्त मंत्री हैं, तो आपको कहीं देश की जनता के सामने कुछ नए तरीके रखने पड़ेंगे और जनता को समझाना पड़ेगा कि आपने रिसोर्स जनरेशन में अपना दिमाग लगाया है. जनता की जेब से पैसे निकालने की जगह हमारे पास उपलब्ध साधनों का इस्तेमाल रिसोर्स जनरेशन में हो, यह अत्यावश्यक है. मैं विनम्रता से आपको एक सुझाव देता हूं. जितना धन विदेशों में काले धन के रूप में जमा है और जो आम तौर पर धारणा बनी है, उससे कई सौ गुना धन हमारे देश की अर्थव्यवस्था में काले धन के रूप में चलन में है. हर जगह हमारा टैक्स सिस्टम हर साल लाखों करोड़ काले धन का उत्पादन करता है और उसे अर्थ व्यवस्था में लगाता है. जितना घोषित धन देश की अर्थव्यवस्था को चलाने में लगा है, उससे ज़्यादा अघोषित धन लगा है. इससे सरकार को कितना नुक़सान हो रहा है, इसका आकलन सरकार स्वयं कर सकती है. पर मोटे अनुमान के अनुसार, सरकार कर्ज के जाल से निकलने की कोशिश कर सकती है, अगर वह रिसोर्स जनरेशन की दिशा में कोई फैसला करे.
वित्त मंत्री जी, मैं आपके सामने एक सुझाव रख रहा हूं कि आप यह घोषणा कीजिए कि जिसके पास भी अघोषित धन है, वह उसे छह महीने के भीतर बैंक में जमा करे. सरकार उससे नहीं पूछेगी कि उसने यह धन कैसे कमाया. सरकार स़िर्फ एक शर्त रखे कि पांच साल तक वह इस धन पर कोई ब्याज नहीं देगी. पांच साल तक इस धन को वह देश के निर्माण में लगाएगी और पांच साल के बाद इस धन के ऊपर बीस प्रतिशत के हिसाब से सोर्स पर कटौती करेगी और सामान्य इनकम टैक्स के दायरे को लागू करते हुए इस धन का वापस उपयोग, जिसने जमा किया है, वह कर सकेगा. इसका मतलब यह कि लाखों करोड़ या शायद उससे ज़्यादा रुपया, जो स्विटजरलैैंड के बैंकों में जमा है, भारत सरकार को रिसोर्स के रूप में मिल जाएगा. भारत सरकार इस धन का इस्तेमाल देश में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और खासकर, किसानों की फसल उपजाऊ या लाभदायी बनाने में कर सकती है. यह इतना पैसा होगा, जितना सरकार सोच भी नहीं सकती है. अगर सरकार यह आश्‍वासन देती है कि वह इस जमा पैसे के ऊपर न कोई सवाल करेगी, न कोई घूूस मांगेगी, न कोई लंगड़ी मारेगी, तो देश के लोग उस सारे पैसे को सरकार को दे भी देंगे और पांच साल के बाद अपने उस पैसे को, जिसे बिना ब्याज के पांच साल तक सरकार ने इस्तेमाल किया है, स़िर्फ मूलधन के रूप में प्राप्त कर और उसके बाद भी उस पर बीस प्रतिशत टैक्स देकर वे अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में एक नया रोल तलाशेंगे.
इस तरह के कुछ और उदाहरण हैं. वित्त मंत्री को चाहिए कि वह रेलवे से कहें कि जितना भी स्क्रैप उसके पास सारे देश में पड़ा है, जिसे अपनी आंखों से कोई भी किसी भी रेलवे ट्रैक पर सफर करते हुए स्टेशन के किनारे देख सकता है, चाहे वह पुराने डिब्बों के रूप में हो, पुरानी रेलवे लाइन के रूप में हो या झाड़-झंखाड़ के रूप में हो, उसका आकलन करके उसे नीलाम कर देना चाहिए. एक मोटे अनुमान के हिसाब से यह स्क्रैप 20 हज़ार से 30 हज़ार करोड़ रुपये का है. वित्त मंत्री जी, आपने 8 हज़ार करोड़ रुपये साधारण जनता की जेब से निकाले हैं, ताकि रेलवे का सुधार किया जा सके. जबकि आप भी जानते हैं और हम भी जानते हैं कि रेलवे का कोई सुधार नहीं होगा. यह पैसा कहीं न कहीं मिस्यूज होगा, अनप्रोडक्टिव योजनाओं में लगेगा. उससे अच्छा है कि अब आप लोगों की जेब से टैक्स के रूप में पैसा निकालने की नीति पर रोक लगाएं. आप 20 हज़ार से 30 हज़ार करोड़ रुपये एक दिन में सरकारी खजाने में रेलवे की बेहतरी के लिए जमा कर सकते हैं और उसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
तीसरी बात, अगर निहित स्वार्थों के ऊपर लगाम लगाने की ठोस कोशिश वित्त मंत्री जी आप करें, तो आप प्रधानमंत्री के बड़े मददगार साबित हो सकते हैं. आप कृपा कर इस देश में यह नीति घोषित करें कि जो भी व्यक्ति अपने यहां आपकी सरकार द्वारा तय मानकों के आधार पर भंडारण गृह बना सकता है, बना ले. भंडारण गृह के तौर पर हम ताप नियंत्रित, शीत ताप नियंत्रित कोल्ड स्टोरेज की बात नहीं कह रहे, बल्कि टैम्परेचर कंट्रोल वेयर हाउस की बात कह रहे हैं. उसमें पूरे रखरखाव की ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की हो. अगर वहां अनाज सड़ता है या उसे चूहे खाते हैं, तो ज़िम्मेदारी उस व्यक्ति की हो, जिसने उसे बनाया है. हर ब्लॉक में जिसमें वह चाहे, सरकारी पैमाने पर इसे बनाए. सरकार स़िर्फ उसकी देखभाल करे और उसका किराया उस व्यक्ति को दे. आप देखेंगे कि एफसीआई से करोड़ गुना ज़्यादा अनाज का भंडारण लोग अपने आप कर लेंगे, बोरों में रखेंगे, चूहे नहीं खाएंगे, दीमक नहीं लगेगी. और, यह देश जिसका 40 प्रतिशत अनाज चूहे खा जाते हैं या सड़ जाता है या काला बाज़ार में चला जाता है, वह अनाज देश की जनता के लिए अर्थव्यवस्था के विकासशील चक्र में इस्तेमाल होगा.
मैं अगला सुझाव वित्त मंत्री जी आपके सामने यह रखता हूं कि आप ऊर्जा मंत्रालय से कहें कि वह इस बात की घोषणा कर दे कि जो भी इस देश में सोलर आधारित, छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा पॉवर जनरेशन प्रोजेक्ट लगाना चाहे, लगा सकता है. उसे स़िर्फ नियामक संस्था को जानकारी देनी है. वह अपने आप ज़मीनें खरीदे, सौ प्रतिशत अपना पैसा लगाए, बिजली का उत्पादन करे और उस उत्पादित बिजली को सरकार स्थानीय तौर पर खरीद ले. सारे देश में कुछ रुपयों के अंतर के हिसाब से उस उत्पादित बिजली को सरकार खरीद ले. आप देखेंगे कि दो साल तब बीतेंगे, जब हमारा देश बिजली के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा. सारा देश विकास के चक्र पर चलने लगेगा, जिसका सबसे बड़ा प्रभाव देश के गांवों और शहरों की न केवल जीवन शैली पर पड़ेगा, बल्कि उसके विकास तंत्र के ऊपर भी एक अद्भुत, क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा.
वित्त मंत्री जी, दो मिनट का समय आप इस तरह के सुझावों पर सोचने के लिए दें. यह इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि हमारे देश में किसी भी योजना की तैयारी के लिए विदेशों से कर्ज लेने की बात हो जाती है. हम बड़े विदेशी घरानों और विदेशी कंपनियों को देश में आमंत्रित करने की बात सोचते हैं, लेकिन हम अपने देश में पड़े हुए रिसोर्स को, संपत्ति को देश के विकास चक्र में इस्तेमाल करने के बारे में कभी नहीं सोचते. मेरा आपसे अनुरोध है और आख़िरी सुझाव के तौर पर मैं यह कहता हूं कि आप इनकम ग्रुप का बंटवारा कर दें कि इस इनकम ग्रुप पर कभी कोई टैक्स नहीं लगेगा. और, उससे ऊपर खास तौर से कारपोरेट घरानों पर, आप जो टैक्स लगाना चाहें, लगा लें. ये संपूर्ण सुझाव ग़रीबों को महंगाई से, भ्रष्टाचार से न केवल मुक्त कराएंगे, बल्कि बेरा़ेजगारी भी दूर करने में एक क्रांतिकारी रोल पैदा करेंगे. इन सारे सुझावों में रा़ेजगार निहित हैं और जिसका दूसरा परिणाम यह निकलने वाला है, जिसे हम स्वाभाविक परिणाम भी कहते हैं कि जब बिजली होगी, जब अनाज सुरक्षित होगा, जब सरकार का खजाना उस पैसे से भरा होगा, जो अरबों करोड़ रुपये का खजाना है, तो हमारी कई समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी. जो धन देश की अर्थव्यवस्था में अघोषित तौर पर लगा हुआ है, अगर वह घोषित तौर पर सामने आ जाएगा, तो सरकार को पांच साल तक इस्तेमाल करने के लिए एक ऐसा फंड मिल जाएगा, जिसके चलते उसे किसी भी देश की तरफ़ देखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. और, हमारा देश स्वयं को दुनिया में एक सर्वशक्तिशाली अर्थसत्ता से संपन्न ताकत के रूप में पेश कर सकेगा.
श्री अरुण जेटली जी, आप सोचने-समझने लायक हैं, क्योंकि आपने अपनी कई योजनाएं कई प्रधानमंत्रियों को बताई हैं. मैं आपसे यह अपेक्षा कर सकता हूं कि आप कई लोगों से बहुत अच्छे साबित हो सकते हैं, बशर्ते आप रिसोर्स जनरेशन के संबंध में साधारण व्यक्तियों द्वारा दिए गए सुझावों पर गंभीरता से सोचें, देश की अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव के लिए नए रिसोर्स, नए संसाधन तलाशने में अपनी ताकत लगाएं और प्रधानमंत्री जी को अपनी नई सोच से न केवल कायल करें, बल्कि उन्हें देश में एक नया विकास का रास्ता तलाशने के लिए प्रेरित भी करें.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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