दिल्ली से लंदन तक गूंज रहा: कबड्डी कबड्डी कबड्डी

14th-match-umumbai-vs-bengaप्रो कबड्डी लीग की शुरुआत क्या हुई, भारत के गांव-देहात का खेल माने जाने वाला कबड्डी दिल्ली से लंदन तक धूम मचाने लगा है. हर जगह कबड्डी-कबड्डी की गूंज सुनाई पड़ने लगी है. कबड्डी लीग की शुरूआत के बाद एक बार लोगों का ध्यान इस पारंपरिक खेल की ओर गया है. जिस तरह प्रो कबड्डी लीग की शुरूआत हुई और लोगों ने उसे जो रिसपॉन्स दिया है, वह काबिले तारीफ है. इसे एक तरह तो कबड्डी का पुनर्जन्म कहा जा सकता है. मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू वाले खेतों से पहले यह खेल घास के मैदान पर पहुंचा और अब दुनिया भर के बेहतरीन स्टेडियमों में हज़ारों दर्शकों के बीच मैट पर खेला जा रहा है. एक विशुद्ध भारतीय खेल को वैश्‍विक पहचान मिल रही है, तो पारंपरिक खेलों के लिहाज से इससे बेहतर और क्या हो सकता है. इन दिनों कबड्डी के दो बड़े टूर्नामेंट हो रहे हैं, एक प्रोफ़ेशनल कबड्डी लीग और दूसरा विश्‍व कबड्डी लीग. विश्‍व कबड्डी लीग के शुरुआती नौ मैच 10 अगस्त को लंदन में खेले गए. उसके बाद बर्मिंघम और दिल्ली में मुक़ाबले आयोजित किए गए. इसके बाद इस लीग के मुक़ाबले लुधियाना, कैलिफ़ोर्निया, वैंकूवर, टोरंटो, अमृतसर, मोहाली, जालंघर, लुधियाना और भटिंडा में आयोजित होंगे. फाइनल मुक़ाबले 29 और 30 नवंबर को लाहौर में खेले जाएंगे. इस लीग में कुल मिलाकर आठ टीमें भाग ले रही हैं. इनके मालिकों में फ़िल्मी दुनिया के जाने-पहचाने चेहरे भी शामिल हैं. पंजाब थंडर, वैंकूवर के साथ बालीवुड अभिनेता रजत बेदी, ख़ालसा वॉरियर्स के साथ हीरो अक्षय कुमार, यो यो टाइगर्स के साथ गायक और संगीत निर्देशक यो यो हनी सिंह और यूनाइटेड सिंघ्स के साथ सह मालिक के रूप में अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा और जयपुर पिंक पैंय्र से अभिषेक बच्चन जुड़े हैंं.

सालों से कबड्डी को ओलंपिक खेलों में शामिल करने की मांग उठ रही है, लेकिन यह मांग बहुत प्रभावी ढंग से नहीं उठाई गई है. यह खेल मुख्य रुप से एशिया के देशों या कहें भारतीय उप-महाद्वीप में खेला जाने वाला पारंपरिक खेल है. इस वजह से इसे ओलंपिक खेलों में शामिल करने के लिए अन्य देशों का सहयोग नहीं मिल पाता है. एशियाई खेलों में कबड्डी को जगह मिली हुई है. 1990 में बीजिंग में आयोजित एशियाई खेलों में कबड्डी को पहली बार शामिल किया गया था, तब से लेकर अब तक आयोजित एशियाई खेलों में कबड्डी में भारत का दबदबा रहा है. वह इसमें सात स्वर्ण पदक अपने नाम कर चुका है. एशियाई में कबड्डी के रजत पदक को लेकर ही प्रतिस्पर्धा होती है. फिलहाल इंटरनेशनल कबड्डी फेडरेशन में 31 सदस्य देश हैं. इसमें एशिया के 19 देश अफग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीनी-ताईपेई, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, किरगिस्तान, मलेशिया, मालदीव, नेपाल, ओमान, पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, थाइलैंड, तुर्कमेनिस्तान, जापान आदि शामिल हैं. जबकि यूरोप के सात देश ऑस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, इटली, स्पेन, स्वीडन सदस्य हैं. अमेरिकी महाद्वीपों से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा और वेस्टइंडीज सदस्य हैं. ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का आस्ट्रेलिया इकलौता सदस्य देश है.

कबड्डी दुनिया का सबसे सस्ता खेल है, इसे खेलने के लिए केवल मैदान और सीटी की आवश्यकता होती है. यह एक सरल और आसान नियमों वाला खेल है इस वजह से इसे आम लोगों के खेल के रूप में जाना जाता है. उसमें किसी प्रकार के बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है. इस वजह गरीब और विकासशील देशों यह एक लोकप्रिय खेल है. कबड्डी मूल रूप से मिट्टी के मैदान में खेला जाने वाला आउटडोर खेल है. लेकिन समय के साथ यह कृत्रिम फर्श पर खेले जाने वाले इंडोर खेल में परिवर्तित हो गया है. कबड्डी को नियमबद्ध बनाने में महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा योगदान है. महाराष्ट्र में कबड्डी को हु-तू-तू कहते हैं.

कबड्डी की शुरूआत भारत में हुई. यह एशियाई देशों के ग्रामीण इलाकों में खेले जाने वाले लोकप्रिय खेलों में से एक है. अंतरराष्ट्रीय स्तर कबड्डी पहली बार वर्ष 1985 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित दक्षिण एशियाई खेल (सैफ) में खेली गया था. इससे पहले 1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों में कबड्डी को डेमोस्ट्रेशन स्पोर्ट्स के रुप में शामिल किया गया था. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी को सबसे बड़ी सफलता 1990 में मिली जब उसे बीजिंग एशियाई खेलों में शामिल किया था. तब से लेकर अब तक कबड्डी एशियाई खेलों का नियमित तौर पर हिस्सा है. 2010 में चीन के ही ग्वांग्जू में पहली बार महिला कबड्डी को भी एशियाई खेलों में शामिल किया गया. 1990 में एशियाई खेलों में जगह मिलने के बाद कबड्डी को लगातार लोकप्रियता मिलने लगी इसके बाद कबड्डी को 1997 में मकाऊ में आयोजित दूसरे एशियाई इंडोर खेलों में शामिल किया गया. इसके बाद इंडोनेशिया के बाली में आयोजित एशियाई बीच खेलों में भी कबड्डी को शामिल कर लिया गया. बीच कबड्डी में पुरुष और महिला दोनों वर्गों को जगह दी गई थी. इसके बाद कबड्डी के नाम एक अनोखी उपलब्धि हो गई. कबड्डी एक मात्र खेल है जिसे एशियाई खेलों के तीनों संस्करणों में जगह मिली है.
कबड्डी दुनिया का सबसे सस्ता खेल है, इसे खेलने के लिए केवल मैदान और सीटी की आवश्यकता होती है. यह एक सरल और आसान नियमों वाला खेल है इस वजह से इसे आम लोगों के खेल के रूप में जाना जाता है. उसमें किसी प्रकार के बाहरी उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है. इस वजह से गरीब और विकासशील देशा में यह एक लोकप्रिय खेल है. कबड्डी मूल रूप से मिट्टी के मैदान में खेला जाने वाला आउटडोर खेल है. लेकिन समय के साथ यह कृत्रिम फर्श पर खेले जाने वाले इंडोर खेल में परिवर्तित हो गया है. कबड्डी को नियमबद्ध बनाने में महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा योगदान है. महाराष्ट्र में कबड्डी को हु-तू-तू कहते हैं. महाराष्ट्र के अमरावती के हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल ने सबसे पहले कबड्डी के विकास और उसे वैज्ञानिक बनाने का बीड़ा उठाया था. 1928 से 1938 तक डेक्कन जिमखाना के बनाए नियमों के अनुसार इसे खेला गया. वर्ष 1952 तक देश के विभिन्न हिस्सों में कबड्डी अलग-अगल नियमों के अनुसार खेली जाती थी. 1952 में ऑल इंडिया कबड्डी फेडेरेशन की स्थापना हुई थी, जिसने कबड्डी के नियमों को बनाने के लिए एक कमेटी का गठन किया था. जिससे कि पूरे देश में एक जैसे नियम लागू किए जा सकें. इस तरह खेल में बहुत से बदलाव आते गए क्लबों की संख्या जिस तरह बढ़ रही थी उसी प्रकार नियम भी बदलते रहे.
पारंपरिक तौर पर कबड्डी तीन प्रकार की होती है, अमर, जैमिनी और संजीवनी. आधुनिक कबड्डी इन तीनों तरह की कबड्डी का साझा स्वरुप है, जो ज्यादातर संजीवनी से मिलती जुलती है. अमर में हार जीत का फैसला दोनों टीमों द्वारा बनाए गए प्वाइंट पर निर्भर करता है. इसमें मैदान का कोई निश्‍चित आकार नहीं होता है. प्रत्येक टीम में नौ से ग्यारह खिलाड़ी होते हैं. इसमें खिलाड़ियों के बाहर जाने और वापस आने का कोई नियम नहीं होता है, समय इसमें मुख्य कारक होता है. इसकी एक विशेषता यह है कि इसमें खिलाड़ी पूरे समय मैदान में होते हैं और हर समय अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करते हैं. जैमिनी में प्रत्येक टीम में नौ खिलाड़ी होते हैं, लेकिन खेल के मैदान का कोई निश्‍चित माप नहीं होता है. इस तरह के खेल के दौरान बाहर गया खिलाड़ी तब तक बाहर रहता है जब तक उसकी टीम के सभी खिलाड़ी बाहर नहीं हो जाते हैं. जो टीम दूसरी टीम के सभी खिलाड़ियों को बाहर कर देती है, उसे एक प्वाइंट मिलता है. जब किसी एक टीम के खिलाड़ी बाहर हो जाते हैं, तो सारे खिलाड़ी वापस आ जाते हैं और मैच आगे बढ़ता है. एक निश्‍चित समय में जो टीम ज्यादा अंक बटोर पाती है वह विजेता होती है. संजीवनी तीसरे प्रकार की कबड्डी है, जो कि आधुनिक कबड्डी से मिलती-जुलती है. इसमें खिलाड़ी बाहर जाते हैं और अंदर आते हैं खेल 40 मिनट तक चलता है. जिसमें 5 मिनट का ब्रेक होता है. प्रत्येक टीम में 9 खिलाड़ी होते हैं. जो टीम दूसरी टीम के खिलाड़ियों को पूरी तरह बाहर कर देती है, उसे 4 अतिरिक्तअंक मिलते हैं. जो टीम नियत समय में ज्यादा अंक बटोरती है वह टीम विजेता होती है. इसमें खेल का मैदान थोड़ा बड़ा होता है. यह दुनिया का एकमात्र ऐसा खेल है जिसमें अटैक करने वाला अकेला होता है और बचाव करने वाले लोग समूह में होते हैं.
1979 में पहली बार कोचिंग देने के लिए प्रोफेसर सुंदर राम को जापान भेजा गया था. उसके बाद 1986 में कोचिंग दल रूस भेजा गया. इसी तरह अमेरिका, वेस्टइंडीज, जर्मनी और कई अफ्रीकी देशों में भी भारतीय कोशिशों के चलते खिलाड़ियों ने न केवल कबड्डी का ककहरा सीखा, बल्कि टीमें बेहतर प्रदर्शन भी करने में लगी हैं. दरअसल खेल अधिकारियों की आपसी खींचतान और तालमेल का अभाव भी कहीं न कहीं दोषी है. अब ऐसा नहीं है कि भारत को कबड्डी में चुनौती नहीं मिल रही है. एशिया में हमें ज्यादातर समय पाकिस्तान और बांग्लादेश से कड़ी चुनौती मिलती है, लेकिन इस बार विश्‍वकप के फाइनल मुक़ाबले में ईरान ने भारत को कड़ी टक्कर मिली थी. जैसे-जैसे कबड्डी की लोकप्रियता बढ़ेगी, प्रतियोगिता का स्तर भी बढ़ेगा. इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्जा दिलाने के लिए प्रयत्न करने के साथ-साथ देश में भी लोकप्रिय बनाना होगा ताकि स्कूल और कॉलेज के स्तर पर कबड्डी एक बार फिर पुराने रंग में नज़र आने लगे. कहीं ऐसा न हो जाए कि दुनिया का गुरू अपने चेलों के सामने ही ढेर हो जाए. इसके लिए हमें अभी से तैयारी करनी होगी और ऐसा ढांचा विकसित करना होगा ताकि देश के हर कोने से कबड्डी के खिलाड़ी निकलकर सामने आने लगेें.
भारत ने जब पहला विश्‍वकप 2004 में मुंबई में कराया था. तब इसमें 16 देशों ने भाग लिया था. उसके बाद पिछले साल भी भारत ने विश्‍व कप का आयोजन किया तब 18 देश शरीक हुए थे. इसी मकसद को पूरा करने के लिए पूरे विश्‍व को कबड्डी सिखाने के लिए भारत की ओर से कम कोशिश नहीं हो रही. कबड्डी में भारत पांच बार का एशिया चैंपियन और दो बार का विश्‍व चैंपियन है. रूस, इंग्लैंड, कनाडा और ईरान जैसे देश कबड्डी सीख ही नहीं रहे हैं, बल्कि अब वह वहां जड़ें भी जमाने लगे हैं. विश्‍व भर के 38 से अधिक देशों ने इस खेल को सीखने या अपनाने में दिलचस्पी ली है. इन सबके बावजूद इस खेल को ओलंपिक के लिए मान्यता नहीं मिल रही. वजह साफ है कि इस खेल में एशिया, खासकर भारत का दबदबा है. अमेरिकी और कई यूरोपीय देश संभवतः नहीं चाहते कि किसी ऐसे खेल को मान्यता मिल जाए, जिसमें उन्हें महारत हासिल नहीं है. इसलिए कबड्डी की ओलंपिक में गूंज सुनाई देने में लंबा वक्त लगेगा, लेकिन जो शुरूआत फिलहाल हुई है वह समय की चाल बढ़ाने में निश्‍चित तौर पर मददगार साबित होगा.

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