एक नए अध्याय की शुरुआत

DSC00868जिस समय देश में सांप्रदायिक सद्भाव कम हो रहा है. लोगों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं. ऐसे समय में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की धरती ने हिंदी साहित्य जगत को विमर्श के लिए एक नया मंच प्रदान किया है. 4 सितंबर से 6 सितंबर के बीच आयोजित तीन दिवसीय अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल में देश के सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने के उद्देश्य के साथ नये साहित्य सृजन का संकल्प लिया गया. साहित्य और संस्कृति के संवर्धन के लिए देश भर के विख्यात साहित्यकार और कलाविद एक मंच पर आए. सांप्रदायिक सद्भाव की भावना को लोगों के बीच प्रगाढ़ करने के लिए इस तरह के मंच की आवश्यकता थी. अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल ने इसकी कमी को पूरा कर दिया है. सम्मेलन का उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के संवर्धन के लिए देेश और दुनिया के बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाविद और पत्रकार सहित विभिन्न वर्गों की बौद्धिक सहभागिता से सकारात्मक विमर्श करना था. जिससे समकालीन चुनौतियों का सामना करने के लिए सभ्य, सुसंस्कृत और संवेदनशील समाज का निर्माण किया जा सके. अब अजमेर भी देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो गया है जहां लोगों के पास देश को संबोधित करने, देश-विदेश के घटना क्रम पर विमर्श और टिप्पणी करने के लिए एक मंच उपलब्ध है. इस मंच के जरिए अजमेर के लोग अपनी आवाज देश के कोने-कोने में पहुंचा सकते हैं. इस मंच ने अजमेर के लोगों को सवाल पूछने आजादी दी है. अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल के लोगो और संकेतों में भी सद्भावना के प्रतीक नज़र आ रहे थे. फेस्टिवल के लोगो में ख्वाजा की दरगाह, पुष्कर का मंदिर और पृथ्वी राज चौहान के तारागढ़ किले को जगह दी गई थी. जो कि अजमेर के इतिहास, सांप्रदायिक सद्भाव और धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए था. इस साहित्य उत्सव में समाज के उन सभी विषयों को जगह दी गई थी. जिनका आम और खास सभी लोगों से ताल्लुक होता है. साहित्य, कला,राजनीति, शिक्षा, लोक संस्कृति, पत्रकारिता और सोशल मीडिया जैसे कई क्षेत्रों के विषयों को इस उत्सव में जगह दी गई थी.

फेस्टिवल का आगाज मुख्य अतिथि प्रख्यात फिल्मकार मुज़फ्फर अली और उनकी पत्नी मीरा अली ने किया. इस दौरान मुज़फ्फर अली ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. साहित्य हमें आत्मीय बनाता है. इससे समाज को दिशा मिलती है. इस तरह के आयोजनों से समाज में अच्छा वातावरण बनता है. सार्थक विचार के मंच बाजार के युग में नज़र नहीं आते हैं, इसलिए इस तरह के मंच की आवश्यकता है. अजमेर की अपनी परंपरा है बावजूद इसके वह वैश्‍विक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पा रहा था. साहित्य जड़ों से पनपता है इसलिए लोगों को इस तरह के सम्मेलनों से जोड़ना जरूरी है, अजमेर साहित्य सम्मेलन का आयोजन इस दिशा में उठाया गया पहला कदम है. आज देश का युवा इंटरनेट से जुड़ा है. उसे सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए साहित्य की ओर लाना होगा. इस तरह के आयोजनों से युवाओं को साहित्य की ओर वापस लाया जा सकता है. लोगों का किताबों से रोमांस कम हुआ है. लिटरेचर फेस्टिवल उस रोमांस को एक नई जान दे सकते हैं. जो शुरूआत हुई है उसमें सबसे बड़ी चुनौती उस विरासत को आगे लेकर जाने की है, साहित्य समाज की आत्मा होता है, जिस समाज में साहित्य नहीं होता है वह कंगाल होता है. अजमेर की धरती मानवता से प्रेम से जुड़ी हुई है, यहां जिस साहित्य का श्रृजन होगा वह मानवता से जुड़ा होगा. यही मानवता वाला साहित्य इस साहित्य उस्सव का रंग ढंग बनेगा. यहां वो लोग आएंगे जिनकी सांप्रदायिक सद्भाव में यकीन होगा. ये मुहब्बत की जमीन है यहां जो आएगा वह कुछ न कुछ लेकर ही जाएगा. पुष्कर का भी अपना अलग रंग है, यह अगर साहित्य से जुड़ता है तो साहित्य को अलग-अलग रंग मिलेंगे. इस तरह के आयोजन से शहर को एक नई पहचान मिलेगी.
राजस्थानी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने की आवाज भी यहां से उठी. साहित्यकार पद्मश्री सी पी देवल ने कहा कि राजस्थानी भाषा संस्कृति का मूल है. लेकिन ग्यारह सौ साल पुरानी भाषा अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है. देश के दूसरों राज्यों में भी अन्य भाषाओं को संवैधानिक दर्जा देने के लिए आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन राजस्थानी भाषा दौड़ में सबसे आगे है सरकार को महापात्रा कमेटी की सिफारिशों को लागू करना चाहिए. देश में शिक्षा के स्तर को सुधारने, अच्छे दिनों की राजनीति राजनीति के अच्छे दिन जैसे मसलों पर विमर्श हुआ. राजनीति के अच्छे दिनों पर विमर्श करते हुए चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीति अच्छे दिन कभी ला ही नहीं सकती. उन्होंने इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ से लेकर वी पी सिंह के भ्रष्टाचार हटाओ के नारों का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों ही नारे झूठे साबित हुए. और अब अच्छे दिनों की बात भी बेमानी साबित हो रही है.
कुल मिलाकर अजमेर में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई है, आयोजक रास विहारी गौड़ और उनकी टीम इस आयोजन को विवादास्पद होने से बचते रहे लेकिन अंतिम दिन पत्रकार वेद प्रताप वैदिक ने अपने बयान से इस साहित्य उत्सव को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया. वैदिक ने कहा कि यदि सरकार उन्हें जेल भेजना चाहती है तो वह तिहाड़ में अपने बगल में पू़र्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देखना चाहेंगे, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ से बात की थी, जो कारगिल में सैकड़ों जवानों की हत्या के दोषी माने जाते हैं.