जनता चाहती है, वादे पूरे हों

विदेश मंत्रालय इस बात में भाग्यशाली है कि उसे दो कैबिनेट मंत्री देख रहे हैं, प्रधानमंत्री और सुषमा स्वराज. जबकि रक्षा और वित्त मंत्रालय अकेले अरुण जेटली देख रहे हैं. शायद अरुण जेटली ही हैं, जो एक तीसरा मंत्रालय भी देख सकते हैं और चेहरे पर शिकन के भाव भी नहीं लाएंगे. लेकिन एक बात जो हमें याद रहनी चाहिए, वह यह है कि मई में शपथ ग्रहण के दौरान की गईं कैबिनेट नियुक्तियां काफी हद तक शुरुआती व्यवस्था भी थीं. 

narendra-modi_640वर्ष 2013 में छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा के समापन के मौ़के पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकली लाल किले से भाषण दिया था, जिसकी काफी
आलोचना हुई थी. इस बार के 15 अगस्त को वास्तविक लाल किले से भाषण देकर उन्होंने अपना सपना साकार कर लिया. सिंबोलिज्म (प्रतीकवाद) प्रधानमंत्री के लिए महत्वपूर्ण है. संसद में पहली बार प्रवेश करने से पहले उन्होंने माथा टेका, जिसने सभी को आकर्षित किया. उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क प्रमुखों को बुलाया, जिसका एक मजबूत असर देखने को मिल रहा है. वह नेपाल और भूटान की यात्रा पर भी गए, जहां उन्होंने वहां की भाषा में बात करके लोगों का दिल जीता. सरकार के शुरुआती 80 दिनों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि एनडीए सरकार की विदेश नीतियां भी पिछली सरकार की तरह ही होंगी, लेकिन जोश और प्रतीकवाद भी शामिल होगा.
विदेश मंत्रालय इस बात में भाग्यशाली है कि उसे दो कैबिनेट मंत्री देख रहे हैं, प्रधानमंत्री और सुषमा स्वराज. जबकि रक्षा और वित्त मंत्रालय अकेले अरुण जेटली देख रहे हैं. शायद अरुण जेटली ही हैं, जो एक तीसरा मंत्रालय भी देख सकते हैं और चेहरे पर शिकन के भाव भी नहीं लाएंगे. लेकिन एक बात जो हमें याद रहनी चाहिए, वह यह है कि मई में शपथ ग्रहण के दौरान की गईं कैबिनेट नियुक्तियां काफी हद तक शुरुआती व्यवस्था भी थीं. अभी भी कई पदों पर नियुक्तियां की जानी हैं और कई फेरबदल भी किए जाने हैं. मुख्य मुद्दा लोग नहीं, नीतियां हैं. बहुत सारी घटनाएं घट रही हैं, कई निर्णय लिए जा रहे हैं और बहुत से आईएएस अधिकारी कैबिनेट मंत्रियों के औचक निरीक्षण की वजह से अपनी नींद खो रहे हैं तथा उन्होंने अब दफ्तर सही समय पर पहुंचना भी शुरू कर दिया है. इसके बावजूद अभी एक बड़ी तस्वीर सामने आने की प्रतीक्षा की जा रही है. बहुत से दबे हुए प्रोजेक्ट्स बाहर निकाले गए हैं और उन पर काम किया जा रहा है, इसके बावजूद अभी भी कोई ऐसा नया प्रोजेक्ट नहीं शुरू किया गया है, जो लोगों का आकर्षण खींच सके.
शायद सरकार तेजी से दौड़ने के पहले तेज चलना सीख रही है, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान किए गए वादों को पूरा किया जाना अभी भी बाकी है. स्पष्ट रूप से जनता वादे पूरे होते देखना चाहती है. देश के पास इस समय ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो छोटे विवादों को ज़्यादा तरजीह नहीं देते. लेकिन विडंबना यह है कि इसके बावजूद सरकार कुछ विवादों में आ ही गई. शायद इसका मतलब यही है कि विपक्ष के पास अब कुछ करने को रह नहीं गया है, सिवाय सरकार की कमजोरियां सामने लाने के. विपक्ष के समक्ष एक समस्या यह भी है कि प्रधानमंत्री की वैसी छवि भी जनता के सामने नहीं आई, जिसका हो-हल्ला चुनाव प्रचार के समय विपक्ष मचा रहा था. इस वजह से कनिष्ठ मंत्रियों द्वारा की गई किसी भी छोटी गलती पर भरपूर शोर मचाया जाता है और संसदीय कार्यवाही स्थगित करनी पड़ती है.
हालिया यूपीएसी विवाद इसका एक उदाहरण है. दुनिया भर में सभी जगह परीक्षार्थी यही चाहते हैं कि परीक्षाएं सरल हों न कि कठिन. कठिन टेस्ट से बचने के लिए वे किसी भी तरह का तर्क देते हैं. वास्तविक बात यह है कि अगर परीक्षार्थी स्टील प्लांट का हिंदी अनुवाद, बुरा या अच्छा, चाहते हैं, तो यह शर्मनाक है. इस तरह की मांगें रखना निकृष्टता है. लेकिन सभी क्षेत्रीय भाषाओं के हित की आड़ में हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों के आगे झुकना राजनीतिक भूल है. भाजपा चाहे जो भी सोचती हो, लेकिन हिंदी भारत को बांधने वाला कारण नहीं है. यह स़िर्फ उत्तर भारत के उन इलाकों में बोली जाती है, जहां देश का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व है. अगर यह बॉलीवुड की भाषा नहीं होती, तो शायद इसे बहुत कम लोग समझ पाते.
हिंदी को नेशनल लैंग्वेज बनाने का कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड का प्रस्ताव कांस्टिटूएंट असेंबली में एक वोट से पास हुआ था. यह आधिकारिक बिल न होकर एक निजी बिल था, जो विवादित था. इसने संघ को प्रैक्टिकली तोड़ दिया था, जबकि 1965 में इसमें लाल बहादुर शास्त्री ने हस्तक्षेप नहीं किया. उसके बाद भारत ने तीन भाषा के फॉर्मूले पर काम करना शुरू किया था अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषा. अगर कोई ऐसा दिन आ जाए, जब कोई आईएएस अधिकारी इन तीनों में से दो भाषाओं का इस्तेमाल न कर सके, तो उसी दिन भारत बिखरना शुरू हो जाएगा. यह विचार कि पूरे देश में एक ही भाषा हो, यूरोपीय है. भारत ऐसे कई देशों का मिश्रण है. इसे लोकतंत्र के जरिये ही बांधकर रखा जा सकता है, न कि एक भाषा के जरिये.

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