संकट में नवाज़ सरकार

2014_8$img20_Aug_2014_AP8_2कभी क्रिकेट के मैदान पर जलवा दिखाकर पाकिस्तान को विश्‍व चैंपियन बनाने वाले इमरान ख़ान और मौलाना ताहिर उल क़ादरी इन दिनों नवाज़ शरीफ़ सरकार के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं. जब से नवाज़ शरीफ़ की पार्टी चुनाव में जीत कर आई, उसके बाद से ही इमरान ख़ान लगातार इस बात का आरोप लगा रहे थे कि चुनाव में बड़े स्तर पर पर धांधली की गई. इस बीच ताहिर क़ादरी ने भी कई बार सरकार का विरोध किया, लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उम्मीद नवाज़ शरीफ़ भी नहीं कर रहे थे. इससे पाकिस्तान में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के हालात बनते दिख रहे हैं. शरीफ़ सरकार बेबस नज़र आ रही है. मदद के लिए सेना को जरूर बुलाया गया है, लेकिन इसी सेना द्वारा वर्ष 1999 में किए गए तख्तापलट का ख़ौफ़ अब भी नवाज़ शरीफ़ के जेहन में है.

हालांकि, नवाज़ शरीफ़ ने इस बात का साफ़ ऐलान कर दिया था कि प्रदर्शनकारियों पर न गोली चलाई जाए और न ही लाठी चार्ज किया जाए, लेकिन क्या स़िर्फ इन निर्णयों से ही वे आम जनता का दिल जीत पाने में कामयाब हो सकते हैं, क्योंकि आंदोलनकारियों में किसी एक उम्र के लोग नहीं हैं. इनमें बच्चों से लेकर उम्रदराज लोग तक शामिल थे. इससे पहले भी नवाज़ शरीफ़ एक बार सेना द्वारा तख्ता पलट देख चुके हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने कई वर्षों तक निर्वासन भी झेला है. इसलिए वह पूरी तरह वाकिफ हैं कि सत्ता से जबरदस्ती हटाए जाने का मतलब क्या होता है. अंतर स़िर्फ इतना है कि इस बार उनके सामने कोई मिलिट्री जनरल नहीं, बल्कि एक राजनेता ही हैं. कमाल की बात यह है कि उनसे निपटने के लिए नवाज उसी सेना की मदद भी चाहते हैं, जिसने कभी उन्हें सत्ता से बेदख़ल किया था.
तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी के नेता इमरान ख़ान का आरोप है कि वर्ष 2013 में हुए आम चुनावों में नवाज़ शरीफ़ ने धांधली की थी और इसी के दम पर वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं. वह चुनाव प्रक्रिया में सुधार की मांग भी कर रहे हैं. मौलाना कादरी सात साल कनाडा में रहने के बाद वर्ष 2012 में पाकिस्तान लौटे थे. इससे पहले उन्होंने ज़रदारी पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए, उन्हें पद से हटाने की मांग की थी. अब वह नवाज़ शरीफ़ के इस्ती़फे की मांग कर रहे हैं. ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान में संपन्न हुआ पिछला चुनाव काफ़ी विवादों में रहा. चुनाव परिणाम आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के पास देश की 139 संसदीय सीटों का लेखाजोखा है ही नहीं. वहीं, मशहूर पाकिस्तानी न्यूज चैनल जियो टीवी ने 18 फीसद वोटों की गिनती के साथ ही शरीफ़ की पार्टी को विजयी घोषित कर दिया था. इसके अलावा, एक ख़ास बात यह भी है कि पाकिस्तानी सियासत में सेना की भूमिका काफी मायने रखती है. इस पूरे मामले में सेना के रुझान पर राय भिन्न हैं. अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके हुसैन हक्कानी ने वाशिंगटन पोस्ट में लिखे अपने आर्टिकल में आशंका जताई है कि इस विरोध प्रदर्शन को सेना का समर्थन भी हो सकता है. कारण यह है कि शरीफ भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं और यह बात सेना को नापसंद है. सेना इसी बहाने शरीफ़ को दबाना चाहती है. शरीफ सरकार से भले ही यह संकट टल जाए, लेकिन मुल्क में जम्हूरियत यानी लोकतंत्र कमज़ोर हो जाएगा. सेना का अभी सरकार में सीधा दख़ल नहीं है. शरीफ़ खुद को बचाने के लिए मदद लेते हैं, तो यह भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा. वैसे भी सत्ता में आने के बाद से अब तक दो मौक़ों पर शरीफ़ को सत्ता की मदद लेना पड़ी है. पहले रावलपिंडी में जहां
शिया-सुन्नी हिंसा भड़क गई थी. दूसरी बार कराची एयरपोर्ट पर आतंकी हमले के वक्त.
पाकिस्तान के उद्योगपति भी मान रहे हैं कि शरीफ़ की सरकार गिरी तो ठीक नहीं होगा. बड़ी संख्या में उद्योगपति इमरान के क्रांति मार्च की आलोचना कर रहे हैं. कराची चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इडस्ट्री के पूर्व अध्यक्ष जुबैर मोतीवाला ने बिजनेस रिपोर्टर अख़बार से बातचीत में कहा कि स्थिर सरकार का सीधा नाता देश की आर्थिक सेहत से है. आज मुल्क मुश्किल दौर से गुजर रहा है. सभी को ठहराव चाहिए्.
नवाज़ हुए कमज़ोर
मौजूदा संकट ने नवाज़ शरीफ़ को कमज़ोर कर दिया है. विशेष यह हो रहा है कि नवाज़ को अब सेना की आवश्यकता महसूस हो रही है, जिसे वह सरकारी नीतियों से दूर रखना चाहते थे. पाकिस्तान में ज़्यादातर लोगों का यह मानना है कि इसके पीछे सेना का हाथ है. पिछले साल नवाज़ के शपथ लेते ही बहुत सारे लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि यह सियासत में फ़ौज़ी दख़ल के अंत का समय है.
हालांकि, इमरान ख़ान और ताहिर-उल-कादरी के आंदोलन के बाद ये सोच बदलने लगी है. पाकिस्तान में फ़िलहाल जारी राजनीतिक उथल-पुथल ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं, जिसे कुछ हलकों में एक विकट स्थिति के तौर पर देखा जा रहा है. जानकारों का मानना है कि इससे मुल्क की सियासत में सेना के हस्तक्षेप के रास्ते खुल गए हैं. खैर यह देखने वाली बात होगी कि भविष्य में इस आंदोलन का क्या होगा? जानकारों की मानें, तो नवाज़ शरीफ़ को इस आंदोलन से काफ़ी नुक़सान हुआ है. भारत से रिश्ते, तालिबान के ख़िलाफ़ जंग और नाटो के जाने के बाद अफगानिस्तान से रिश्ते जैसे मुद्दों को पहले जहां शरीफ अपने हिसाब से तय करने की कोशिश कर रहे थे, वहीं अब उन्हें सेना की इच्छा के मुताबिक चलना पड़ सकता है.