राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट की मार

pagalपाकिस्तान इस समय गंभीर राजनीतिक हालात से गुज़र रहा है. इमरान ख़ान एवं धर्मगुरु ताहिरुल क़ादरी के विरोध प्रदर्शन से उत्पन्न उथल-पुथल का सिलसिला अभी रुका भी नहीं कि तीन पाकिस्तानियों को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किए जाने से दुनिया भर में पाकिस्तान की जगहंसाई शुरू हो गई है. इन समस्याओं को नवाज़ शरीफ़ किस तरह हल करेंगे, इस बारे में फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता. ज़ाहिर है, प्रधानमंत्री ऐसे संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि पाकिस्तान में सब कुछ सामान्य नहीं है. एक ओर इमरान ख़ान एवं ताहिरुल क़ादिरी का विरोध प्रदर्शन निरंतर जारी रहने के कारण देश राजनीतिक संकट का शिकार है और सरकार लड़खड़ा रही है.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ अब भी कह रहे हैं कि सत्ता में परिवर्तन की संभावनाएं हैं. दूसरी ओर इमरान ख़ान नवाज़ शरीफ़ के इस्ती़फे से कम किसी भी शर्त पर अपना विरोध ख़त्म करने के मूड में नज़र नहीं आ रहे हैं. हालांकि उन्हें दोबारा बातचीत की पेशकश की जा रही है. संघीय मंत्री अहसन इक़बाल पाकिस्तानी अवामी तहरीक और तहरीक-ए-इंसाफ़ से धरना-प्रदर्शन ख़त्म करने की अपील कर रहे हैं. उन्होंने अभी हाल में मीडिया से बात करते हुए कहा, देश धरनों को सहन नहीं कर सकता. इमरान ख़ान हर दिन आरोप-प्रत्यारोप करके पगड़ी उछाल रहे हैं, वह जनता को भ्रमित कर रहे हैं और नौजवानों में ज़हर भर रहे हैं. तहरीक-ए-इंसाफ़ का रवैया असंवैधानिक और बिखराव पर आधारित है. दोनों पार्टियों को चाहिए कि वे धरना-प्रदर्शन ख़त्म करके बातचीत के जरिये समाधान खोजें. स्वयं नवाज़ शरीफ़ ने भी दोनों पार्टियों से धरना ख़त्म करके बातचीत द्वारा समस्या का हल तलाशने की पेशकश की है. लेकिन, इमरान ख़ान सत्ता परिवर्तन के सिवाय किसी और बात पर राज़ी नहीं हैं.
राजनीतिक परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि एक ओर नवाज़ शरीफ़ हैं, वहीं दूसरी ओर विरोध प्रदर्शन कर रही इन पार्टियों के साथ पाकिस्तान मुस्लिम लीग (क़ायदे आजम), मजलिस वहदत मुस्लमीन और सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल आदि भी नज़र आ रही हैं और वे सब किसी भी तरह अपनी मांगों से पीछे हटने के मूड में नहीं हैं. ज़ाहिर है, यह स्थिति नवाज़ शरीफ़ के लिए समस्याएं खड़ी कर रही है और देश की अर्थव्यवस्था को नुक़सान हो रहा है. क़ौमी असेंबली में विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी सरकार को निशाना बनाते हुए कहा है कि वह अपनी दिशा दुरुस्त करे. दूसरी ओर कुछ दल तमाम पक्षों के बीच मामलों को बातचीत के ज़रिये हल कराने के लिए सक्रिय हैं, जिनमें जमीअत-ए-इस्लामी, मुत्तेहदा कौमी मूवमेंट आदि शामिल हैं.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ अब भी कह रहे हैं कि सत्ता में परिवर्तन की संभावनाएं हैं. दूसरी ओर इमरान ख़ान नवाज़ शरीफ़ के इस्ती़फे से कम किसी भी शर्त पर अपना विरोध ख़त्म करने के मूड में नज़र नहीं आ रहे हैं. हालांकि उन्हें दोबारा बातचीत की पेशकश की जा रही है. संघीय मंत्री अहसन इक़बाल पाकिस्तानी अवामी तहरीक और तहरीक-ए-इंसाफ़ से धरना-प्रदर्शन ख़त्म करने की अपील कर रहे हैं. उन्होंने अभी हाल में मीडिया से बात करते हुए कहा, देश धरनों को सहन नहीं कर सकता.

अब इस सबसे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि लगभग एक साल पहले सत्तारूढ़ हुई मुस्लिम लीग (एन) के लिए दिन-प्रतिदिन चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं और उसे अपनी सत्ता संभालना मुश्किल होता जा रहा है. इस सबके बीच मूल रूप से एक सवाल जन्म लेता है कि अगर अन्य दल सरकार गिराने में सफल हो जाते हैं, तो फिर क्या होगा? क्या आने वाली सरकार जनता की आशाओं पर खरी उतरेगी? इस बात की क्या गारंटी है कि उसे बाकी दलों की ओर से इस प्रकार के विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा? ऐसे तमाम सवाल हर पाकिस्तानी के दिमाग में कौंध रहे हैं. इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक बात तय है कि अगर सरकार विरोधी आंदोलन के नतीजे में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) सत्ता से बाहर होती है, तो फिर नई बनने वाली सरकार को भी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. वजह, अगर आज विरोधी दल सरकार के विरुद्ध संगठित हो सकते हैं, तो कोई शक नहीं कि कल नई सरकार को इन्हीं परिस्थितियों से गुज़रना पड़ जाए और नतीजे में देश इससे भी ख़तरनाक संकट का शिकार होता चला जाए.
अगर ऐसा होता है, तो फिर यह याद रखना चाहिए कि ऐसे किसी भी संकट के परिणाम में देश के किसी राजनीतिज्ञ का कुछ नहीं बिगड़ेगा. नुक़सान होगा, तो सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़रीब जनता का, जिसे शायद दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं है. पाकिस्तान में ग़रीबी का आलम यह है कि 18 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 33 प्रतिशत आबादी यानी 5 करोड़ 87 लाख लोग ग़रीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं. एक ग़ैर सरकारी संगठन थिंक टैंक, सस्टेनेबल डेवलपमेंट पॉलिसी इंस्टीट्यूट ने रिपोर्ट जारी की है कि पाकिस्तान की एक तिहाई आबादी भयानक भुखमरी का शिकार है. इसका साफ़ मतलब है कि पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी है, लेकिन सरकार ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ने की बजाय राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रही है. पाकिस्तान की हालत देखते हुए बेहतर यही है कि एक निर्वाचित सरकार गिराने की बजाय सभी दल, समूह मिल-बैठकर समस्या का हल तलाश करें. एक क़दम सत्तारूढ़ पार्टी को बढ़ाना चाहिए, तो दूसरा क़दम सरकार के विरोध में खड़े दलों एवं नेताओं को. उन्हें अपनी मांगों में संशोधन करके इस संकट से बाहर निकलने की कोशिश करनी चाहिए.
आर्थिक संकट के अलावा पाकिस्तान की दूसरी बड़ी समस्या आतंकवाद है. पिछले दिनों भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ एक मुलाक़ात के दौरान पाकिस्तान में पनप रहे आतंकवाद पर चिंता व्यक्त की थी. अमेरिका को यह सबूत भी मिल गया है कि पाकिस्तान में आतंकवाद को संरक्षण मिल रहा है. अमेरिका ने पाकिस्तान के उग्रवादी संगठन हरकतुल मुजाहिदीन के संस्थापक एवं जिहादी प्रतिनिधि अफज़ल रहमान ख़लील, लश्कर-ए-तैयबा के मोहम्मद नईम शेख़ और उम्र नईम शेख़ पाकिस्तानी को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल कर लिया है. ज़ाहिर है, इन संगठनों से जुड़े लोग नवाज़ शरीफ़ पर अमेरिकी निर्णय के ख़िलाफ़ दबाव बनाएंगे. यह स्थिति नवाज़ शरीफ़ के लिए एक नई चुनौती है. लांग मार्च पर जिहादी संगठनों की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी, लेकिन अब अगर नवाज़ शरीफ़ इस ़फैसले पर कोई अंतिम निर्णय करेंगे, तो इन संगठनों का झुकाव प्रदर्शनकारियों की ओर हो सकता है. चूंकि पाकिस्तान में इनका नेटवर्क बहुत मज़बूत है, इसलिए यह स्थिति नवाज़ सरकार के ख़िलाफ़ जा सकती है. पाकिस्तान एक के बाद एक, नए-नए संकटों से घिरता जा रहा है, जिससे निबटने के लिए सरकार को बेहद समझदारी भरे क़दम उठाने होंगे.