दादरी पॉवर प्लांट भूमि अधिग्रहण प्रकरण : रिलायंस ने घुटने टेके

किसान को विकास का अगुवा और संस्कृति का खुदा कहा गया है, लेकिन जैसे-जैसे मानव सभ्यता आगे बढ़ी, वैसे-वैसे किसान हाशिये पर चला गया. रील लाइफ से रियल लाइफ तक किसान का चरित्र हमेशा से हारने वाला रहा है. वह कभी मौसम से हारता है, कभी साहूकार से, तो कभी सरकार से, लेकिन संघर्ष किसान के डीएनए में है. और शायद इसीलिए, रिलायंस जैसी बड़ी आर्थिक ताकत को दादरी के किसानों की ज़िद के आगे घुटने टेकने पड़े. 

1907427_1465928150347619_27उत्तर प्रदेश के दादरी में किसानों ने इतिहास रचा है. देश में पहली बार किसी ज़मीन अधिग्रहण के मामले में व्यवसायिक घराने को अपने पांव पीछे खींचने पड़े हैं. दादरी पॉवर प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहीत की गई ज़मीन वापस पाने के लिए पिछले दस सालों से संघर्ष कर रहे किसानों ने जीत हासिल की है. रिलायंस ने अधिग्रहीत की गई ज़मीन पर अपना दावा छोड़ दिया है. किसानों के लिए यह जीत इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि उनके सामने देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने ने घुटने टेके हैं. रिलायंस का दादरी में ज़मीन पर दावा छोड़ना शायद पहली घटना है, जहां किसानों की सीधे तौर पर जीत हुई है.
क़रीब दस साल पहले वर्ष 2004 में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस पॉवर ने ग़ाजियाबाद के दादरी में गैस आधारित 7480 मेगावाट का प्लांट लगाने की योजना बनाई थी. उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 हज़ार करोड़ रुपये के इस पॉवर प्रोजेक्ट के लिए लगभग 2500 एकड़ ज़मीन अधिग्रहीत करके रिलायंस पॉवर को दे दी थी. उत्तर प्रदेश सरकार ने दादरी में इस ज़मीन का अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 का इमरजेंसी क्लॉज लगाकर किया था. इस प्रावधान के अंतर्गत स्कूल- कॉलेज, अस्पताल एवं सड़क आदि के निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाता है, लेकिन रिलायंस पॉवर जैसी निजी कंपनी के लिए सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के इमरजेंसी क्लॉज का इस्तेमाल किया. इसके तहत राज्य सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के लिए संबंधित किसानों की राय लेना ज़रूरी नहीं था.
22 फरवरी, 2004 को सरकार ने दादरी में पॉवर प्लांट लगाने की घोषणा की. दादरी के सात गांवों यानी बझेड़ा, कैराना, धौलाना, जादौपुर, नंदगांवपुर, बहरमपुर एवं छहरा की 2500 एकड़ ज़मीन अधिग्रहण के दायरे में आई. सरकार के इस क़दम से तक़रीबन 5,700 किसान प्रभावित हुए थे. सरकार के इस ़फैसले के विरोध में 5 अगस्त, 2004 को प्रभावित किसान गाजियाबाद कलेक्ट्रेट में धरने पर बैठ गए. किसानों का कहना था कि यह सब गलत हो रहा है, उनकी मर्जी के बगैर उनकी ज़मीन कैसे ली जा सकती है? लेकिन सरकार नहीं मानी. किसान 14 अक्टूबर, 2004 तक धरने पर बैठे रहे और पॉवर प्लांट का लगातार विरोध करते रहे. बावजूद इसके सरकार ने 28 जून, 2005 को भूमि अधिग्रहण के संबंध में अधिसूचना जारी कर दी. सरकार के इस क़दम के बाद किसानों ने महाराणा संग्राम सिंह किसान कल्याण समिति एवं भारतीय किसान मंच के तत्वावधान में 25 नवंबर, 2005 को बझेड़ा खुर्द में धरना शुरू किया. प्रशासन के प्रतिनिधि किसानों से बातचीत करने के लिए आते-जाते रहे, लेकिन किसान सरकार की बात मानने के लिए तैयार नहीं हुए. किसानों के पक्ष में जन-समर्थन लगातार बढ़ता गया.
8 जुलाई, 2006 को पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय वीपी सिंह किसानों के समर्थन में धरना देने बझेड़ा खुर्द पहुंचने वाले थे, लेकिन उसके ठीक पहले 7 जुलाई, 2006 को रात 11 बजे पुलिस ने अचानक किसानों पर लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें दोनों पक्षों के कई लोग घायल हुए. पुलिस ने अगले दिन सुबह छह बजे एक बार फिर किसानों पर हमला बोल दिया. पुलिस की गोली से एक किसान घायल हो गया. इसके बाद विरोध प्रदर्शन के लिए वीपी सिंह ने खेतों पर ट्रैक्टर चलाकर संकेत दिया था कि यह ज़मीन किसानों की है और किसानों की रहेगी. किसानों ने भी कहा था कि यह हमारी ज़मीन का सवाल है. हम अपना खेत छोड़कर क्यों जाएं. हमें तो कफ़न बांधकर चलना है. हम मरेंगे भी यहीं और मरने के बाद दफन भी यहीं होंगे.
किसान मंगू सिंह एवं बाबू सिंह ने सरकार के भूमि अधिग्रहण के ़फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी. अदालत ने भूमि अधिग्रहण पर रोक लगा दी. मामले की सुनवाई के बाद 4 दिसंबर, 2009 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज़मीन अधिग्रहण को ग़ैर-क़ानूनी ठहराते हुए अधिग्रहण के लिए जारी अधिसूचना अंशत: रद्द कर दी. अदालत ने कहा कि सरकार ने रिलायंस पॉवर जैसी निजी कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 के इमरजेंसी प्रावधानों का इस्तेमाल किया, जो ग़ैर-क़ानूनी था. अदालत ने कहा कि जिन किसानों को अधिग्रहण पर आपत्ति है, वे मुआवजा वापस करें. हाईकोर्ट के ़फैसले के बाद 145 किसानों ने मुआवजे में मिले 32 करोड़ रुपये सरकार को वापस कर दिए. हाईकोर्ट ने अपने ़फैसले में कहा था कि सरकार नए सिरे से किसानों की आपत्तियां सुनकर दोबारा अधिसूचना जारी कर सकती है. उसके बाद सरकार और रिलायंस पॉवर ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. उधर प्रशासन ने यह कहकर मुआवजा वापस लेना बंद कर दिया कि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. अब वह जो ़फैसला करेगा, वही मान्य होगा.
इस मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना ़फैसला सुरक्षित रख लिया था. ़फैसला आने से पहले 22 अगस्त, 2014 को रिलायंस ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल करके मुकदमा वापस लेने और ज़मीन पर दावा छोड़ने की बात कही. उसने इसके लिए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल द्वारा लोकसभा में दिए गए बयान को आधार बनाते हुए कहा कि सरकार नई परियोजनाओं के लिए गैस की उपलब्धता की गारंटी नहीं दे सकती. रिलायंस पॉवर लिमिटेड ने अपनी अर्जी में कहा कि वह अपील वापस लेना चाहती है, क्योंकि दस साल की लंबी अवधि के दौरान परिस्थितियां बदल गई हैं. घरेलू प्राकृतिक गैस की देश में भारी कमी है. प्लांट चलाने के लिए प्राकृतिक गैस का कोटा हासिल करना होगा, जो इस समय बेहद मुश्किल काम है. मौजूदा परिस्थितियों में गैस की अनुपलब्धता के कारण वह पॉवर प्रोजेक्ट पर काम नहीं करना चाहती. रिलायंस के ख़िलाफ़ लड़ने वाली महाराणा संग्राम सिंह किसान कल्याण समिति के महासचिव युधिष्ठिर सिंह सिसोदिया का कहना है कि रिलायंस को यह पहले ही मालूम हो गया था कि सुप्रीम कोर्ट का ़फैसला उसके ख़िलाफ़ जाने वाला है, इसलिए उसने अपनी इज्जत बचाने के लिए अंतिम समय में याचिका वापस ले ली.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कंपनी द्वारा अपील वापस लेने का आवेदन स्वीकार करते हुए कहा कि याचिका वापस लिए जाने की स्थिति में यह मामला सुनवाई योग्य नहीं रह गया. लिहाजा इसे खारिज किया जाता है. इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला बहाल हो गया. अब किसानों को उनकी ज़मीनें वापस मिल जाएंगी, क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक, क़ानून में दिए गए निश्‍चित समय के भीतर राज्य सरकार ने धारा छह के तहत अधिग्रहण की कार्रवाई पूरी नहीं की. किसानों के घर में एक बार फिर उत्साह का माहौल है. लोगों के चेहरों पर खुशी साफ़ देखी जा सकती है. बात केवल मुआवजे की रकम वापसी पर अटकी हुई है.


मुआवजे की रकम कैसे वापस होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस की ओर से दिए गए मुआवजे की रकम वापसी के मुद्दे को खुला रखा है. अदालत ने कहा है कि कंपनी ने निजी निवेश किया है. सरकार ने ज़मीन का अधिग्रहण किया था और मुआवजा भी सरकार की ओर से दिया गया था. इसलिए पैसा वापस लेने की हक़दार सरकार है. अगर आपको लगता है कि आपको पैसा वापस मिलना चाहिए, तो आप अलग तरीके से अदालत आएं. किसानों ने गलत अधिग्रहण के मामले में मुआवजे की रकम न लौटाने का पक्ष रखा है, जबकि कंपनी इस मामले में पहले राज्य सरकार से संपर्क करेगी और उसके बाद क़ानूनी रास्ते पर आगे बढ़ेगी. रिलांयस पॉवर के वकील ने कहा कि कंपनी मुआवजे के तौर पर दी गई 85 करोड़ रुपये की रकम वापस लेने के लिए राज्य सरकार से संपर्क करेगी, जो किसानों को ज़मीन के एवज में दी गई थी.

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