संकट में पाकिस्तानी लोकतंत्र

पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति ऐसी है कि पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ तारिक अली जैसे लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पाकिस्तान को बिखरने से सिर्फ दो चीज़ें बचा सकती हैं. पहली इसका परमाणु बम और दूसरी अमेरिका. तारिक अली यह भी कहते हैं कि अमेरिका जब चाहे पाकिस्तान में एक नर्म बालकानाइजेशन (बिखराव) की प्रक्रिया शुरू करवा सकता है. इस्लामाबाद में अस्थिरता का क्षेत्रीय राजनीति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा.

page-11पिछले साल 5 जून को जब नवाज़ शरीफ ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला था तो पाकिस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि एक चुनी हुई सरकार की जगह एक दूसरी चुनी हुई सरकार ने ली थी. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के नेतृत्व वाली पिछली सरकार इस देश की पहली निर्वाचित सरकार थी जिसने तमाम अ़डचनों के बावजूद अपना कार्यकाल पूरा किया था. यह ऐसी घटना थी जिससे पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे विश्‍व में लोकतंत्र की पैरवी करने वालों को थोड़ी राहत मिली कि आतंकवाद और पृथकतावादी गतिविधियों से जूझ रहे पाकिस्तान में कुछ तो अच्छा हुआ. लेकिन अभी नवाज़ सरकार ने बमुश्किल एक वर्ष पूरे किए थे कि तहरीक-ए-इंसाफ के इमरान खान और पाकिस्तान आवामी तहरीक के मौलाना ताहिर-उल-कादरी (जो पाकिस्तानी मूल के कनेडियन नागरिक और धर्मगुरु हैं) ने 2013 के आम चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप लगा कर राजधानी इस्लामाबाद में लॉन्ग मार्च और धरना प्रदर्शन का ऐलान कर दिया. ये धरना प्रदर्शन पिछले एक महीने से जारी हैं. उन्होंने सरकार के सामने अपनी छह मांगें रखीं हैं. जिनमे सबसे पहली प्रमुख मांग प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का इस्तीफा है. इसके इलावा मध्यावधि चुनाव, चुनाव सुधार, राजनीतिक सहमति बनाकर निष्पक्ष अंतरिम सरकार बनाना, पंजाब के चुनाव आयोग की बर्खास्तगी, चुनाव में धांधली करने वालों के खिलाफ संविधान की धारा 6 के तहत कार्रवाई करना उनकी अन्य मांगें हैं.

इमरान खान 2013 के चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली का आरोप तो नतीजों के ऐलान के बाद से ही लगाते आ रहे हैं. दरअसल उनकी चुनावी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ से (जिसे वह सुनामी की लहर कहते थे) और मीडिया में, खास तौर पर पश्‍चिमी देशों की मीडिया में, छपने वाली रिपोर्टों से उन्हें यह लग रहा था कि पाकिस्तान की जनता परम्परगत पार्टियों, मुस्लिम लीग और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी, के कुशासन से तंग आ चुकी है, लिहाज़ा इस बार जनता उनकी पार्टी को वोट दे कर सत्ता में लाएगी. लेकिन जब चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो खैबर पख्तूनख्वाह को छोड़ कर उनकी सुनामी कहीं दिखाई नहीं दी. पाकिस्तान के अंग्रेजी उपन्यासकार और पत्रकार मुहम्मद हनीफ अपने व्यंगात्मक अंदाज़ में कहते हैं कि विदेशी पत्रकारों ने इमरान खान की जितनी प्रोफाइलें तैयार कीं उतनी उन्होंने इस क्षेत्र की किसी भी जीवित व्यक्ति की नहीं की थी. अगर दुनियाभर में छपने वाली पत्रिकाओं के संपादकों को वोट देने का मौक़ा दिया गया होता तो इमरान खान आधी अंग्रेजीभाषी दुनिया के प्रधानमंत्री होते. यदि इमरान खान पश्‍चिमी लंदन सीट से चुनाव में खड़े हुए होते तो वह बिना कुछ किए ही जीत गए होते. लेकिन चूंकि यह पाकिस्तान है इसलिए उन्हें खैबर पख्तूनख्वाह पर ही सब्र करना पड़ा.
दरअसल पाकिस्तान को उसकी समस्याओं से निजात दिलाने का दावा करने वाले क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान को अपनी पार्टी तहरीक-ए-इन्साफ की स्थापना के बाद किसी भी चुनाव में ऐसा नहीं लगा कि वह पाकिस्तान की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका निभा पाएंगे. लेकिन विगत कुछ वर्षों में उनकी रैलियों में जमा होने वाली भीड़ से उन्हें 2013 के चुनाव में किसी चमत्कार की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. ज़ाहिर है पाकिस्तान या तीसरी दुनिया के अन्य देशों में चुनावों में घपलों और धांधली के आरोप कोई अनोखी बात नहीं है. इमरान खान के आरोपों में कितनी सच्चाई है इस बात का पता जांच के बाद ही चलेगा, लेकिन उनके धरना प्रदर्शन से पाकिस्तान की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पर व्यापक प्रभाव पड़ा है. जहां तक सवाल है आर्थिक स्थिति का सवाल है तो देश में आई बाढ़ और मौजूदा राजनीतिक संकट की वजह से 10 अरब डॉलर के नुकसान का अंदाज़ा लगाया गया है. सितंबर महीने के मध्य में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पाकिस्तान का दौरा करने वाले थे लेकिन उन्हें अपना दौर स्थगित करना पड़ा. इस दौरे में ये उम्मीद की जाहिर की जा रही थी कि दोनों देशों के बीच 34 अरब डॉलर के करार होंगे. पाकिस्तानी रुपये की कीमत पहले ही से कमज़ोर थी इस आन्दोलन की वजह से और कमज़ोर हो गई है. (देखें चौथी दुनिया कापिछला अंक).
जहां तक इन धरनों और लॉन्ग मार्च से उत्पन्न होने वाली राजनीतिक स्थिति का सवाल है तो इसमें प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ चारों तरफ से घिरते नज़र आ रहे हैं. हालांकि, शुरू-शुरू में उन्होंने अपने पब्लिक पोस्चारिंग में इस रैली को कोई खास अहमियत नहीं दी, लेकिन प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज या गोली न चलाए जाने का हुक्म दे कर उन्होंने न स़िर्फ आम जनता का दिल जीत की कोशिश की बल्कि वह सेना को भी हिंसा की आड़ में सत्ता पर काबिज़ होने का मौक़ा नहीं देना चाहते थे. इससे पहले भी नवाज़ शरीफ़ एक बार सेना द्वारा तख्ता पलट देख चुके हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने कई वर्षों तक राजनीतिक अज्ञातवास भी झेला है. इसलिए वह पूरी तरह वाकिफ हैं कि सेना को एक मौक़ा देने का अर्थ क्या है?
कालांकि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ ने सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह सरकार के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे, लेकिन हालिया घटनाक्रम से यह ज़ाहिर होता है कि कहीं न कहीं ताहिर-उल-कादरी और इमरान खान को फ़ौज का समर्थन हासिल है. क्योंकि 16 सितंबर को छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक सेना प्रमुख ने इमरान खान को उनकी पांच मांगें पूरी कराने का भरोसा दिलाया है, हालांकि इसमें प्रधानमंत्री का इस्तीफा शामिल नहीं है. वहीं सेना प्रमुख प्रधानमंत्री से भी मुलाक़ात कर चुके हैं. दरअसल इस लॉन्ग मार्च ने पाकिस्तान में पहले ही से कमज़ोर लोकतंत्र को और कमज़ोर करने का काम किया है. पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की कमजोरी का सबसे ज्यादा फायदा फ़ौज उठाएगी, और देश की राजनीती में एक सक्रिय भूमिका निभाने लगेगी.
उधर पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल परवेज़ मुशर्रफ की पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने यह बयान जारी करके कि जनरल मुशर्रफ के खिलाफ चल रहे देशद्रोह के मुक़दमे मौजूदा संकट का कारण हैं, इस मामले को और दिलचस्प बना दिया है. मुशर्रफ के राजनीतिक सलाहकार सरफ़राज़ अंजुम कहलोन ने मांग की है कि राजनीति से प्रेरित सभी मामलों को वापस लिया जाए और जनरल मुशर्रफ के खिलाफ चले रहे राष्ट्रद्रोह के मुक़दमे मौजूदा संकट का कारण हैं. और यह कि ये मांग अलिखित रूप से उठाई जाएगी. मुशर्रफ का इस तरह इस घटनाक्रम में आना भी सेना की तरफ इशारा करता है. क्योंकि जस्टिस इफ़्तेख़ार चौधरी और मुशर्रफ प्रकरण ने ज़ाहिर तौर पर सेना को हाशिए पर रख दिया दिया था. जनरल मुशर्रफ की तरफ से जारी इस बयान और सेना के पांच कमांडरों द्वारा यह मांग कि सेना को इस संकट से निकलने के लिए सक्रीय भूमिका निभानी चाहिए, स्थितियां और भी क्लिष्ट हो गई हैं. ऐसे में इमरान खान पर लग रहे आरोप, कि वह मिलिट्री के हाथों की कठपुतली हैं, में भी सच्चाई नज़र आती है. हालांकि वह नवाज़ शरीफ को मिलिट्री डिक्टेटरशिप की पैदावार करार देते हैं. बहरहाल, नवाज़ शरीफ के
आमने-सामने कोई मिलिट्री जनरल नहीं, बल्कि एक राजनेता और एक धर्मगुरु हैं. लेकिन विडंबना यह भी है कि एक बार फ़ौज के हाथों अपनी सत्ता गवां चुके नवाज़ शरीफ मौजूदा संकट से निकलने के लिए फ़ौज की मदद लेने को मजबूर हैं.
हालांकि मुख्य विपक्षी दल पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली ज़रदारी ने नवाज़ शरीफ को आश्‍वासन दिया है कि वह उनकी मदद करेंगे और इस संकट से उन्हें बहार निकाल लेंगे. इस सिलसिले में उन्होंने इमरान खान से बातचीत भी की लेकिन इमरान खान के तेवरों से लगता है कि वह अपनी मांगे पूरी हुए बगैर अपना आंदोलन समाप्त नहीं करेंगे. ज़रदारी ने नवाज़ शरीफ को इस्तीफा न देने की सलाह दी है. लेकिन पीपुल्स पार्टी की पंजाब इकाई ने आसिफ अली ज़रदारी को इस मामले में तटस्थ रहने की सलाह दी है. लेकिन आसिफ अली ज़रदारी फ़िलहाल नवाज़ शरीफ के साथ खड़े दिख रहे हैं. ज़रदारी के नवाज़ के साथ होने से ये मतलब निकला जा सकता है कि वह सेना को एक बार फिर सत्ता पर काबिज़ होने देने का मौक़ा नहीं देना चाहते या उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों में छूट चाहते हैं.
पाकिस्तान में जब भी सेना और सिविलियन सरकारें आमने-सामने रहीं हैं वहां न्यायपालिका ने हमेशा सेना का साथ दिया है. जनरल मुशर्रफ और जस्टिस इफ़्तेख़ार चौधरी प्रकरण के बाद सेना ने एक सक्रिय भूमिका निभाना शुरू कर दिया. पाकिस्तानी राजनीति के विशेषज्ञ यह मानने लगे थे कि सिविलियन गवर्नमेंट और सेना की रस्साकशी में न्यायपलिका भी शामिल हो गई है. मौजूदा संकट में आदालत में इस्लामाबाद में रेड जोन की तरफ मार्च कर रहे प्रदशनकारियों पर फायरिंग और लाठीचार्ज के मामले में, जिसमें तीन लोग मारे गए थे और सौ के करीब लोग ज़क्मी हुए थे, नवाज़ शरीफ के खिलाफ मुक़दमा दर्ज करने का हुक्म देकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. और इस विचार को और पुख्ता किया है की सिविलियन गवर्नमेंट और फ़ौज के साथ-साथ न्यायपालिका भी एक सत्ता का केंद्र है. अब ऐसे में जहां एक तरफ पाकिस्तानी सेना का उत्तरी वजीरिस्तान में आतंकवादियों के खिलाफ फौजी कार्रवाई जारी रखे हुए है वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जो अशांत नहीं है. पाकिस्तानी सेना यह दावा कर रही है कि उसने छह हज़ार आतंकवादियों को मार गिराया है, और तकरीबन इतने ही तालिबान लड़ाकों को अफ़ग़ानिस्तान की तरफ भगा दिया है. तालिबान के पिछले कारनामों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि मौक़ा मिलते ही और राजनीतिक अस्थिरता का फ़ायदा उठा कर ये एक बार फिर कराची हवाई अड्डे की तरह का कोई बड़ा आतंकवादी हमला कर सकते हैं. देशी की अर्थव्यवस्था वैसे ही चरमराई हुई है इस तरह के आंदोलनों का प्रतिकूल प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ना लाज़मी है. उधर बाढ़ ने अलग तबाही मचाई हुई है. पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति ऐसी है कि पाकिस्तानी मामलों के विशेषज्ञ तारिक अली जैसे लोग इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पाकिस्तान को बिखरने से सिर्फ दो चीज़ें बचा सकती हैं. पहली इसका परमाणु बम और दूसरी अमेरिका. तारिक अली यह भी कहते हैं कि अमेरिका जब चाहे पाकिस्तान में एक बिखराव की प्रक्रिया शुरू करवा सकता है. इस्लामाबाद में अस्थिरता का क्षेत्रीय राजनीति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. भारत के साथ संबंधों में चल रहे खटास को ख़त्म करने की भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा की गई पहल की प्रक्रिया में एक बार फिर गतिरोध आ जाएगा. उधर अफ़ग़ानिस्तान अमेरिकी सेना की वापसी के बाद नई शुरुआत के लिए तैयार है, और पाकिस्तान इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण देश है. इसलिए मौजूदा राजनीतक संकट को जितनी जल्दी सुलझा लिया जाए वह पाकिस्तान के लिए उतना ही अच्छा होगा.

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