चुनौती सबके लिए है…

aaaaaaaaaaaदिल्ली का चुनाव तीनों प्रमुख पार्टियों के लिए इम्तिहान की घड़ी है. आम आदमी पार्टी के लिए जहां यह चुनाव जीने-मरने का सवाल है, वहीं कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व में फिर से जान फूंकने का मौक़ा है. भाजपा के लिए यह चुनाव स़िर्फ इतना भर है कि उसे अपना प्रदर्शन बरकरार रखना है. हालांकि, दिल्ली देश की राजधानी है और इसका राजनीति में प्रतीकात्मक महत्व भी है. इस लिहाज से भाजपा दिल्ली चुनाव को हल्के में नहीं ले सकती.

बहरहाल, अब यह तय हो गया है कि दिल्ली विधानसभा का चुनाव होना है. संभवत: यह झारखंड एवं जम्मू-कश्मीर चुनाव के बाद हो, लेकिन चुनावी सरगर्मी अभी से तेज हो गई है. पोस्टर वार शुरू हो चुका है, जिसमें आम आदमी पार्टी सबसे आगे नज़र आ रही है. चूंकि आचार संहिता लागू होने के बाद इस तरह की पोस्टरबाजी संभव नहीं है, इसलिए आम आदमी पार्टी ने पूरी दिल्ली में पोस्टरों के जरिये चुनावी शंखनाद कर दिया है. कांग्रेस और भाजपा अभी कमर कस ही रही हैं.

आम आदमी पार्टी अगर इस चुनाव को लेकर अभी से इतनी मुखर दिख रही है, तो यह जायज भी है, क्योंकि दिल्ली में यही ऐसी पार्टी है, जिसका भविष्य इस चुनाव से जुड़ा हुआ है. दिसंबर 2013 में किसी ने यह सोचा भी नहीं था कि इसे 28 सीटें मिल सकती हैं, लेकिन ऐसा हुआ और फिर इसने कांग्रेस के समर्थन से सरकार भी बनाई.

आम आदमी पार्टी अगर इस चुनाव को लेकर अभी से इतनी मुखर दिख रही है, तो यह जायज भी है, क्योंकि दिल्ली में यही ऐसी पार्टी है, जिसका भविष्य इस चुनाव से जुड़ा हुआ है. दिसंबर 2013 में किसी ने यह सोचा भी नहीं था कि इसे 28 सीटें मिल सकती हैं, लेकिन ऐसा हुआ और फिर इसने कांग्रेस के समर्थन से सरकार भी बनाई. अचानक इस पार्टी का राजनीतिक ग्राफ तेजी से बढ़ने लगा. समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं की संख्या में तेजी से इजाफ़ा हुआ. लेकिन, 49 दिनों के बाद जैसे ही अरविंद केजरीवल ने इस्तीफ़ा दिया, उसके बाद से और खासकर लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद इस पार्टी के अच्छे दिन ख़त्म होने लगे. समर्थकों एवं कार्यकर्ताओं की संख्या में भी कमी आने लगी.
आम आदमी पार्टी ने अपना आधार बढ़ाने के लिए मिशन विस्तार जैसे कार्यक्रम भी चलाए. जेजे क्लस्टर, निम्न-मध्य वर्ग, रेहड़ी-पटरी, छोटे दुकानदार, ऑटो वालों ने दिसंबर 2013 के चुनाव में इस पार्टी को भरपूर समर्थन दिया था और यह तबका अभी भी आम आदमी पार्टी के साथ है. लेेकिन, पार्टी की सबसे बड़ी चिंता है दिल्ली का मध्य वर्ग. दिसंबर 2013 में इस वर्ग की एक बड़ी संख्या ने आम आदमी पार्टी को खुलकर समर्थन दिया था, लेकिन लोकसभा चुनाव में यह वर्ग इसके हाथ से खिसक कर भाजपा की ओर चला गया. नतीजतन, दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से एक भी सीट आम आदमी पार्टी को नहीं मिली. लोकसभा चुनाव के बाद से ही दिल्ली का मध्य वर्ग इस पार्टी से अलग है. आम आदमी पार्टी अगर दिल्ली में फिर से सत्ता पाना चाहती है, तो इसे इस वर्ग विशेष को अपने साथ लाना ही होगा. आम आदमी पार्टी की ताकत की बात करें, तो इसकी सबसे बड़ी ताकत इसके शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल की स्वच्छ छवि ही है. 49 दिनों की सरकार के दौरान किए गए इनके कामों से भी दिल्ली का एक तबका खुश दिखता है, लेकिन सामान्य तौर पर लोगों की सबसे बड़ी शिकायत सरकार द्वारा इस्तीफ़ा देने को लेकर है. अब अरविंद केजरीवाल कैसे यह शिकायत दूर कर पाते हैं, कैसे मध्य वर्ग को अपनी ओर खींच पाते हैं, कैसे अपने मतदाताओं को एकजुट रख पाते हैं और कैसे भाजपा को कड़ी चुनौती पेश कर पाते हैं, इन्हीं सबके आधार पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की किस्मत का फैसला होगा.
दूसरी तरफ़ भाजपा है, जो लोकसभा चुनाव के बाद लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही है. उसकी चुनौती स़िर्फ इतनी है कि वह दिल्ली में सत्ता हासिल कर ले. पिछले विधानसभा चुनाव में भी 32 सीटों के साथ वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. लोकसभा चुनाव के दौरान उसे दिल्ली में 41 फ़ीसद मत मिले थे और क़रीब 60 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई थी. ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश है और जीतने का भरोसा भी. फिलहाल, दिल्ली में उसके पास एक भी ऐसा चेहरा नहीं है, जिसे आगे करके वह चुनाव लड़े. हर्षवर्धन के केंद्र में मंत्री बनने के बाद दिल्ली भाजपा में कोई सर्वमान्य चेहरा अभी नज़र नहीं आता.
कभी-कभार जगदीश मुखी का नाम ज़रूर सामने आता है, जो अपेक्षाकृत एक स्वच्छ छवि के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन फिर भी भाजपा ने अपने किसी नेता की घोषणा नहीं की है. यह तय है कि भाजपा दिल्ली विधानसभा चुनाव भी नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व के सहारे और केंद्र सरकार के पिछले 6 महीनों के कामकाज को आधार बनाते हुए लड़ेगी. हालांकि, इसी मुद्दे को अरविंद केजरीवाल उछालेंगे और कहेंगे कि दिल्ली भाजपा के पास कोई नेता तक नहीं है, इसलिए प्रधानमंत्री को विधानसभा चुनाव में आगे किया जा रहा है. लेकिन यह राजनीति है, जहां आदर्श वाक्यों से ज़्यादा महत्व हार और जीत का है. यह बात भाजपा अच्छी तरह जानती है. महाराष्ट्र एवं हरियाणा में नरेंद्र मोदी के सहारे जीत हासिल करने वाली भाजपा दिल्ली में भी जीतना चाहती है.
बात अगर कांग्रेस की करें, तो उसके पास दिल्ली में खुद को स्थापित करने के लिए शायद यह अंतिम मौक़ा है. इस बार अगर कांग्रेस अपनी स्थिति ठीक नहीं कर पाती है, तो शायद अगले
दो-तीन दशकों तक दिल्ली से वह उसी तरह गायब रहेगी, जैसे अभी बिहार और उत्तर प्रदेश से गायब है. दरअसल, कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती है, अपना वह मतदाता वर्ग आम आदमी पार्टी से खींच कर अपनी तरफ़ वापस लाना, जो पिछले विधानसभा चुनाव में उससे अलग हो गया था. लोकसभा चुनाव से मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से अलग हुआ है. बदली परिस्थितियों में कांग्रेस को सत्ता मिलना नामुमकिन है, लेकिन उसके लिए अपनी मौजूदा सीटें बचाते हुए उन्हें और बढ़ाना ही सबसे बड़ी सफलता होगी. कांग्रेस की दिक्कत है नेता का अभाव. अभी तक शीला दीक्षित ने यह साफ़ नहीं किया है कि वह इस विधानसभा चुनाव में भाग लेंगी या नहीं. अरविंदर सिंह लवली लोकप्रिय नेता तो हैं, लेकिन वह ऐसा चेहरा नहीं हैं, जो अकेले दम पर दिल्ली विधानसभा चुनाव की नैय्या पार लगवा सके.

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