कांग्रेसी नहीं चाहते थे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र

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राम मंदिर विवाद के साथ भारतीय जनता पार्टी का नाता बहुत बाद में जुड़ा. 90 के दशक में अपने राजनीतिक रथ को गति देने के लिए भाजपा और तत्कालीन भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस मुद्दे को कांग्रेस से हथिया लिया. इससे पहले तक यानी 1948 में विवादित स्थान पर रामलला की मूर्ति रखवाने, राजीव गांधी द्वारा उसका ताला खुलवाने और अंत में नरसिम्हा राव सरकार के समय विवादित ढांचे को ढहाने के दौरान कांग्रेस ने हर वक्त इस मुद्दे से राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश की. यह अलग बात है, कांग्रेस का यही मुद्दा 1990 के बाद भाजपा के लिए संजीवनी का काम कर गया.

20060210000507304क्यों नहीं हटाई जा सकी मूर्ति

मूर्ति क्यों नहीं हटाई गई, जैसे सवाल का उत्तर ढूंढने के लिए बहुत माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी. इसके लिए हमें तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के चरित्र को समझना होगा. यह सही है कि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व स्वतंत्रता संग्राम की उपज था और काफी हद तक धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों में विश्‍वास करता था. महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसे नेतृत्व की वजह से ही यह संभव हुआ कि विभाजन की विभीषिका में निर्मित यह देश स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर सका. 1947 की कल्पना कीजिए, जब दो राष्ट्रों के सिद्धांत के आधार पर भारत का विभाजन हो रहा था, यह कहा जा रहा था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं, ये साथ नहीं रह सकते तथा चारों तरफ़ भयानक मार-काट मची हुई थी. उस समय गांधी और नेहरू जैसा नेतृत्व ही था, जिसने मजबूती के साथ खड़े होकर हिंदू और मुसलमानों के अलग राष्ट्र होने की धारणा का खंडन किया तथा भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने का प्रयास किया. लेकिन, यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि कांग्रेस में ही बहुत सारे लोग भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे. संयुक्त प्रांत की विधानसभा में 1947-48 में प्रांत के नए नाम को लेकर एक लंबी बहस चली थी, जिसके अंत में यह तय हुआ कि संयुक्त प्रांत का नाम आर्यावर्त रखा जाए.
विभूति नारायण राय, जो उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रहे हैं और मेरी जानकारी में अकेले आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्होंने सेवा में रहते हुए भी सांप्रदायिक शक्तियों के ख़िलाफ़ खुलकर लिखा-पढ़ा है, ने विस्तार से अक्षय ब्रह्मचारी से बातें की थीं. उन्होंने मुझसे अपने अनुभव साझा किए. अक्षय ब्रह्मचारी ने जो कुछ विभूति नारायण राय को बताया था, उसे वह
अलग-अलग जगहों पर लिख भी चुके हैं. राय के अनुसार 23 दिसंबर, 1949 की सुबह डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के. के. के. नैय्यर ने संदेश भेजकर अक्षय ब्रह्मचारी को अपने बंगले पर बुलवाया और मस्जिद में मूर्ति रख दिए जाने की जानकारी दी. नैय्यर उन्हें अपनी मोटर गाडी पर बैठाकर बाबरी मस्जिद ले गए. मस्जिद परिसर में पहुंचने पर उन्हें आंगन में मूर्ति रखी दिखाई दी और बहुत थोड़े-से लोग उसे घेर कर भजन-कीर्तन कर रहे थे. ब्रह्मचारी के अनुसार, मूर्ति के पास उस समय बहुत कम लोग थे और बहुत आसानी से, बिना अधिक बल प्रयोग किए मूर्ति हटाई जा सकती थी. उन्होंने यह सलाह नैय्यर को दी भी, किंतु नैय्यर ने यह कहकर कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर बिना सरकार की सलाह लिए कुछ करना उचित नहीं होगा, फौरन कुछ करने से इंकार कर दिया. नैय्यर ने बाद में ब्रह्मचारी को बताया कि उन्होंने चीफ सेक्रेटरी से बात की, तो उन्हें उत्तर मिला कि प्रीमियर बाहर हैं और उनके लौटने पर ही कोई निर्णय लिया जा सकेगा. प्रीमियर यानी गोविंद वल्लभ पंत जब तक लौटे, बहुत देर हो चुकी थी. अगले चौबीस घंटों में दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों तक यह प्रचार हो चुका था कि अयोध्या में रामलला प्रकट हुए हैं और दूसरे दिन जब अक्षय ब्रह्मचारी अयोध्या पहुंचे, तो उन्हें रास्ते भर बैलगाड़ियों, तांगों, इक्कों पर लदा-फंदा और पैदल अपार जनसमूह दिखाई दिया, जो भए प्रकट कृपाला दीनदयाला, कौशल्या हितकारी…गाता हुआ बाबरी मस्जिद परिसर की तरफ़ जाता दिखाई दिया. वह समझ गए कि अब मूर्ति हटाना कठिनतर हो गया है. वर्षों बाद जब वह विभूति नारायण राय को अपने अनुभव सुना रहे थे, तो उनके मन में कोई संशय नहीं था कि यदि इच्छाशक्ति होती, तो मूर्ति तब भी हटाई जा सकती थी. पर मूर्ति स़िर्फ इसलिए नहीं हटी, क्योंकि फैजाबाद का ज़िला प्रशासन और कांग्रेस नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा ऐसा नहीं चाहता था.
चार माह पहले से चल रही थी मंदिर निर्माण की योजना
स्वाभाविक तौर पर यह सवाल उठता है कि मस्जिद में मूर्ति रखे जाने के चार माह पूर्व से ही मंदिर निर्माण का प्रकरण कैसे चल रहा था? ज़िला मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट में सिटी मजिस्ट्रेट का मौक़ा मुआइना करने के बाद यह मानना कि जहां रामचंद्र जी पैदा हुए थे, वहां मंदिर बनाने की अनुमति देने में कोई हर्ज नहीं है. इन पत्रों से यह स्पष्ट है कि रामलला के प्रकट होने के पहले से ही ज़िला प्रशासन, जिसके मुखिया के. के. के. नायर थे, में पहले से ही कुछ खिचड़ी पक रही थी और राम जन्म स्थान चबूतरे के पास नजूल भूमि पर राम मंदिर बनाने की योजना पर गुपचुप काम चल रहा था. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस योजना की जानकारी यूनाइटेड प्रोविंसेस के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत को भी थी. ऐसा कहा जाता है कि चुनाव जीतने के बाद बाबा राघव दास कुछ साधुओं का प्रतिनिधि मंडल लेकर गोविंद वल्लभ पंत से मिले और उन्हें एक प्रतिवेदन मंदिर निर्माण के संबंध में दिया. उस प्रतिवेदन को प्रीमियर के आदेश पर सामान्य प्रशासन विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी केहर सिंह ने ज़िलाधिकारी फैजाबाद को आख्या के लिए भेजा. ऊपर उल्लिखित सिटी मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट इसी संदर्भ में भेजी गई प्रतीत होती है. उपलब्ध पत्रों/टिप्पणियों के अवलोकन से यह भी स्पष्ट होता है कि फैजाबाद के ज़िलाधिकारी के. के. के. नायर ने अपने तत्कालीन बॉस (कमिश्‍नर) को भी इस योजना से अनभिज्ञ रखा था. उस समय यह भी कहा जाता था कि बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को सौंपने की दिशा में आवश्यक कार्रवाई करने का सुझाव बाबू प्रियादत्त राम ने प्रीमियर पंत को चुनाव के दौरान ही जीत सुनिश्‍चित बनाने के लिए दिया था. इन्हीं प्रियादत्त राम को तीन गुंबददार इमारत मय सहन व चहरदीवारी मय मूर्तियों व पूजा के सामानों सहित कुर्क संपत्ति का पहला रिसीवर बनाया गया था और उन्होंने भोग, राग, आरती के लिए स्कीम तैयार की थी तथा उसी के अनुसार आज भी वहां पूजा होती है. एक बार यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि मूर्ति रखे जाने के पहले से ही राम मंदिर निर्माण की योजना पर गुपचुप काम चल रहा था और उसमें कांग्रेस का प्रांतीय नेतृत्व एवं फैजाबाद का ज़िला प्रशासन भी सक्रिय रूप से शामिल था, यह समझना आसान हो जाएगा कि जवाहर लाल नेहरू द्वारा इस आशय का तार देने और सरदार पटेल के लंबे एवं स्पष्ट पत्र के बावजूद पंत ने मूर्ति हटाने की कार्यवाही क्यों नहीं की? शाहजहांपुर, बरेली, पीलीभीत, मुरादाबाद, अलीगढ़, अयोध्या एवं फैजाबाद आदि में जो खुलेआम सांप्रदायिक हिंसा हुई, अख़बारों में उसका बहुत ही नगण्य अंश आया.
क्यों नहीं हुई उपद्रवियों पर कार्रवाई?
अयोध्या में संप्रदायवादी फासिस्टों ने दंगे कराए, कत्ल कराए, स्त्रियों-बच्चों के ऊपर पाशविक अत्याचार कराए, पर एक भी आदमी गिरफ्तार नहीं किया गया. चार सौ सालों से जो स्थान मस्जिद था, उसे मंदिर कहकर उस पर अधिकार कर लिया गया, लेकिन हुकूमत ने षड्यंत्रकारियों के ख़िलाफ़ उंगली तक नहीं उठाई. मुझे इस बात का गर्व है कि फैजाबाद की कांग्रेस और वहां के कांग्रेसजनों ने एक स्वर से इन कार्रवाइयों का विरोध किया, पर इन सबके बावजूद सरकार चुप रही. सैकड़ों कब्रें तोड़कर नष्ट कर दी गईं और यह आंदोलन जोरदार हो गया कि अयोध्या की पवित्र भूमि में किसी मुसलमान की लाश दफनाई नहीं जा सकती. ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं, जिसमें लाश 20-22 घंटे तक पड़ी रही और मृतकों के संबंधी एक से दूसरे और फिर तीसरे कब्रिस्तान भगाए जाते रहे और वे बड़ी कठिनाई से लाश दफना सके. ऐसा भी हुआ कि लाश दफनाने के बाद खोदकर फेंक दी गई या फिर अन्यत्र दफनाई गई, लेकिन सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की. इससे उपद्रवकारियों के हौसले बढ़ गए और वे सरकार को निष्क्रिय एवं नपुंसक समझने लगे. कुछ बड़े नेताओं का इशारा पाकर थोड़े-से कांग्रेस कार्यकर्ता भी वही राग अलापने लगे. नासिक अधिवेशन के लिए प्रतिनिधि के चुनाव में उन्होंने संप्रदायवादी उपद्रवकारियों से मिलकर नगर कांग्रेस के अध्यक्ष सिद्धेश्‍वरी प्रसाद को खुलेआम गालियां दीं और उनके चुनाव में गुंडागर्दी की. अधिकारी कान में तेल डाले पड़े रहे. कांग्रेस के चुनाव में यह प्रचार किया गया कि अक्षय, सिद्धेश्वरी आदि को जो वोट देगा, वह मस्जिद के लिए वोट देगा. इसकी शिकायत प्रांतीय और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी से भी की गई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. इसलिए अक्षय, सिद्धेश्‍वरी और अन्य साथियों को, जो कांग्रेस के पदाधिकारी थे, मजबूरी में चुनाव से अलग होना पड़ा.
आस्तिक, नास्तिक और नागरिक अधिकार
मैं इन घटनाओं को धर्म और मंदिर-मस्जिद विवाद के रूप में न देखकर नागरिकता के अधिकार के रूप में देखता हूं. एक नागरिक यदि आस्तिक है, तो उसे पूजा का स्थान भी चाहिए. यदि उसे देश में जीने का अधिकार है, तो मरने पर उसे जलाने या दफनाए जाने के लिए दो बालिस्त ज़मीन चाहिए ही. इन साधारण नागरिक अधिकारों की उपेक्षा अथवा इनके ख़िलाफ़ कुठाराघात करके कोई भी हुकूमत जनतांत्रिक नहीं कहला सकती. ऐतिहासिक आधार पर किसी पूजा स्थान को मंदिर से मस्जिद या मस्जिद से मंदिर बनाना ही है, तो सरकार पहले यह सिद्धांत स्वीकार कर ले और इतिहास के विद्वानों की एक समिति बनाए, जो इस बात की छानबीन करके तय कर सके कि कौन स्थान पहले मंदिर था, जिसे मस्जिद बना दिया गया. हमें यह भी सोचना होगा कि इतिहास के पन्ने कहां तक उलटे जाएं. यदि यह प्रक्रिया शुरू हो गई, तो मुसलमान विरोधी अपनी फासिस्ट राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए कल दलितों के साथ, तो परसों सिखों के साथ खड़े दिखेंगे और चार दिन बाद वैष्णव स्थान-शैव स्थान आदि को विभिन्न भागों में विभाजित कर देंगे. इससे अराजकतावाद, अव्यवस्था और हिटलरी आतंकवाद का दौर चलेगा, जिसमें जनतंत्र का नाश हो जाएगा.

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