मां के नाम रेहाना का खत : मेरी मौत के बाद मेरे अंग दान कर दिए जाएं

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rihanna-jabbariदुनिया भर की मानवाधिकार संस्थाओं की अपील के बावजूद ईरान में 26 वर्षीय रेहाना जब्बारी को देश के एक भूतपूर्व ख़ुफ़िया अधिकारी मुर्तजा अब्दुलअली सर्हिंदी के क़त्ल के जुर्म में 25 अक्टूबर की सुबह तेहरान स्थित जेल में सज़ा-ए-मौत दे दी गई. रेहाना की रिहाई की मुहिम में लगे लोगों का कहना था कि उससे क़त्ल का कुबूलनामा बहुत दबाव में लिया गया था और यह कि सर्हिंदी उसका बलात्कार करना चाहता था जिससे बचने के लिए उसने आत्मरक्षा में उसका क़त्ल किया था. वर्ष 2007 से सज़ा-ए-मौत के साये में जी रही रेहाना ने जेल की काल कोठरी से अपनी फांसी से कुछ माह पहले अपनी मां के नाम एक पत्र लिखा था. कहते हैं कि जब मौत सामने हो तो इंसान झूठ नहीं बोलता. यहां हम रेहाना का मार्मिक पत्र हू-ब-हू प्रकाशित कर रहे हैं जो न केवल ईरान के अधिकारियों को कटघरे में खड़ा करता है बल्कि पूरी दुनिया से सज़ा-ए-मौत को ख़त्म करने पर पुनर्विचार करने के लिए सवाल भी कर रहा है.
प्यारी शोलेह,
मुझे आज मालूम हुआ कि किसास (ईरानी दंड संहिता में प्रतिकार का क़ानून) का सामना करने की बारी मेरी है. मुझे दुःख है कि आपने मुझे यह बताने का मौक़ा क्यों नहीं दिया कि मैं अपने जीवन की किताब के आखिरी पन्ने पर पहुंच गई हूं. क्या आपको नहीं लगता कि यह मुझे जानना चाहिए था? आपको मालूम है कि मैं कितनी शर्मिंदा हूं कि आप उदास हैं? आप इस मौके पर मेरी तरफ से अपना और अब्बा का हाथ चूम क्यों नहीं लेतीं?
दुनिया ने मुझे 19 साल तक जिंदा रहने का मौक़ा दिया. दरअसल उस भयानक रात को मेरा क़त्ल होना चाहिए था. मेरी लाश को शहर के किसी कोने में फ़ेंक दिया जाना चाहिए था. जिसकी वजह से एक-दो दिन बाद किसी पुलिस अफसर ने मेरी शिनाख्त करने के लिए आपको अपने दफ्तर बुलाया होता, जहां आकर आपको यह भी पता चलता की मेरा बलात्कार हुआ है. कातिल का कभी सुराग नहीं लगता क्योंकि आपके पास न उतनी दौलत है और न ही ताक़त. उसके बाद आप दुःख और शर्मिंदगी के साथ अपनी ज़िन्दगी गुज़ारतीं और शायद कुछ साल बाद इस दुःख और पीड़ा की वजह से आप भी दुनिया से रुख़सत हो जातीं.
लेकिन बदकिस्मती से यह कहानी बदल गई. मेरी लाश को शहर किसी कोने में फेंकने के बजाय पहले एविन जेल के कैद-ए-तन्हाई की कब्र में डाल दिया गया, और अब शहर की क़ब्रनुमा जेल में. इसे आप अपनी किस्मत समझ कर सब्र कीजिये, क्योंकि आप तो ज़्यादा अच्छी तरह से जानतीं हैं कि मौत ज़िंदगी का खात्मा नहीं होती.
आप ने तो मुझे शिक्षा दी थी कि इंसान इस दुनिया में कुछ तजुर्बे हासिल करने और कुछ सीखने आता है, और हर जन्म के साथ उसको एक ज़िम्मेदारी दी जाती है. आपने मुझे यह भी सिखाया था कि कभी-कभी इंसान को अपनी लड़ाई लड़नी पड़ती है. मुझे याद है जब आपने मुझे यह बताया था कि मुझे ले जाते समय गाड़ीवान ने मुझ पर कोड़े बरसाने वाले का विरोध किया था, लेकिन कोड़े मारने वाले ने उसके चेहरे और सिर पर कोड़े का वार किया. जिसकी वजह से गाड़ीवान की मौत हो गई. आप ने मुझे सिखाया था कि मर कर भी इंसानी मूल्यों का निर्माण करना चाहिए.
जब हम स्कूल जाते थे तो आप ने हमें सिखाया था कि झग़डे और शिकायत के दौरान भी भद्र महिला की तरह पेश आना चाहिए. आपको मालूम है कि आपकी शिक्षा ने हमारे व्यवहार को कितना प्रभावित किया था? आपके अनुभव ग़लत थे क्योंकि जब यह घटना घटित हुई तो मेरे अनुभव ने मेरा साथ छोड़ दिया. अदालत में मेरे मुक़दमे की सुनवाई के दौरान मुझे निर्मम हत्यारे और क्रूर अपराधी के रूप में पेश किया गया. मैंने कोई आंसू नहीं बहाया. मैंने रहम की भीख नहीं मांगी. रो-रो कर आसमान-ज़मीन एक नहीं किया क्योंकि मुझे क़ानून पर भरोसा था.
मुझ पर यह इल्जाम लगाया गया मैं जुर्म के समय मैंने शोर नहीं मचाया. आप जानती हैं कि मैंने आज तक एक मच्छर नहीं मारा, और तिलचट्टों को पकड़ कर उन्हें बाहर फ़ेंक दिया करती थी. अब मैं एक सुनियोजित कातिल बन गई हूं. जानवरों के साथ मेरे सुलूक की व्याख्या मेरे लड़का होने की ख्वाहिश के तौर पर की गई. जज ने इस हकीक़त को जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि हादसे के वक़्त मेरे लम्बे नाख़ून पर पॉलिश लगी हुई थी.
वे कितने आशावादी थे जिन्हें ऐसे जजों से इंसाफ की उम्मीद थी! किसी जज ने इस इस बात पर सवाल नहीं उठाया कि बॉक्सिंग की महिला खिला़डी की तरह मेरे हाथ सख्त नहीं हैं. आपने मुझे इस देश से प्यार करना सिखाया, शायद इस देश को मेरी ज़रूरत ही नहीं थी. क्योंकि जब मुझ पर आरोपों के मुक्के बरसाए जा रहे थे और उन भद्दे और बेहूदा इल्जामों को सुन कर मैं रो रही थी तब मेरी मदद करने कोई नहीं आया. जब मैंने अपनी खूबसूरती की आखिरी निशानी अपने बालों को मुंडवा लिया तो मुझे 11 दिन कैद-ए-तन्हाई की सजा सुना दी गई.
प्यारी शोलेह, आप यह सुन कर रोइयेगा नहीं. हिरासत के पहले ही दिन पुलिस थाने में जब एक उम्रदराज़ अविवाहित एजेंट ने मेरे (लम्बे) नाखूनों के कारण मेरी पिटाई की थी तो मैं समझ गई थी दुनिया के इस क्षेत्र में खूबसूरती की कद्र नहीं है. यहां किसी को न चेहरे की खूबसूरती, न सोच की खूबसूरती, न लिखावट, न आंखों और नज़र की खूबसूरती और न ही मधुर आवाज़ की ज़रूरत है.
मेरी प्यारी मां, मेरी विचारधार बिलकुल बदल गई है और आप इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं. मेरी बातें कभी ख़त्म नहीं होंगी. मैं अपनी लिखी हुई चीज़ें एक शख्स को दे दूंगी ताकि जब मुझे आपकी गैर मौजूदगी में और जानकारी के बिना मुझे फांसी दे दी जायेगी तो वह चीज़ें आप तक पहुंच जाएं. मैंने विरासत के तौर पर अपनी बहुत सारी हस्तलिखित चीज़ें छोड़ जाओगी.
बहरहाल, अपनी मौत से पहले मैं आप से कुछ मांगना चाहती हूं, जिसे आप को अपनी पूरी शक्ति लगा कर मेरे लिए किसी तरह करना होगा. हकीक़त में मैं आप से, इस देश से और पूरी दुनिया से केवल यही एक मांग है. मुझे मालूम है आपको इसे पूरा करने के लिए समय चाहिए. इसलिए अपनी वसीयत का एक हिस्सा पहले दे रही हूं. कृपया आप अपने आंसू पोंछ लें और मेरी बात सुनें. मैं चाहती हूं कि आप अदालत जाएं और मेरी ख्वाहिश उन्हें बताएं. मैं इस तरह का ख़त जेल से नहीं लिख सकती क्योंकि जेल प्रमुख इसकी इजाज़त नहीं देगा. इसलिए एक बार फिर आपको मेरी वजह से दुःख सहना पड़ेगा. इस काम के लिए अगर आप किसी के सामने हाथ भी फैलाएंगी तो मैं बुरा नहीं मानूंगी, हालांकि मैंने अपनी जान बचाने के लिए किसी के सामने हाथ फ़ैलाने से आपको कई बार मना किया था.
मेरी मेहरबान मां, प्यारी शोलेह, आप मुझे मेरी जान से भी ज्यादा अज़ीज़ हैं, मैं ज़मीन के अंदर स़डना नहीं चाहती. मैं नहीं चाहती कि मेरी आंखें और मेरा जवान दिल यूं ही मिट्टी में मिल जाये. लिहाज़ा आप मेरी तरफ से गुज़ारिश कीजिये कि फांसी पर लटकाए जाने के तुरंत बाद मेरा दिल, गुर्दा, आंखें, हड्डियां और मेरे शरीर का हर वह अंग जो किसी के जिस्म में ट्रांसप्लांट किया जा सकता है निकल लिया जाए और किसी ज़रूरत मंद को तोहफे में दे दिया जाए. मैं यह नहीं चाहती कि जिसे यह अंग दिए जाएं उसको मेरा या मेरी पहचान बताई जाए ताकि वह मेरे लिए फूलों का गुलदस्ता खरीदे या मेरे लिए दुआ करे.
मैं अपने दिल की गहराईयों से यह बात कह रही हूं कि मैं अपने लिय कोई कब्र नहीं चाहती जहां आप आयें, मातम करें और दुःख उठाएं. मैं यह भी नहीं चाहती कि आप मेरे लिए काला (मातमी) लिबास पहने. आप कोशिश करके मेरे मुश्किल दिनों को भूल जाइये. मुझे हवाओं के हवाले कर दीजिये ताकि वह अपने साथ मुझे उड़ा ले जाए.
दुनिया को मुझसे प्यार नहीं है, क्योंकि दुनिया यह नहीं चाहती कि उसका भी वही हश्र हो जो मेरा हुआ था. अब मैं इसे छोड़ कर मौत को गले लगाने जा रही हूं. मैं अल्लाह की अदालत में इंस्पेक्टर शमलौ को कटघरे में खड़ा करूंगी, जज के ऊपर मुक़दमा दायर करूंगी और सुप्रीम कोर्ट के उन जजों का दामन पकडूंगी जिन्होंने मुझे जीते-जी मार डाला और मुझे तकलीफ पहुंचाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा.
मैं खालिके काएनात की अदालत में डॉ फरवंदी का दामन भी पकडूंगी, मैं कासिम शाबानी पर मुक़दमा चलाउंगी और उन सबसे सवाल पुछूंगी जिन्होंने जानबुझ कर या अनजाने में मुझे कसूरवार साबित किया और मेरे अधिकारों को कुचल दिया, और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कभी-कभी जो नज़र आता है वह हक़ीकत नहीं होता, बल्कि आंखों का धोखा होता है.
मेरी प्यारी रहमदिल शोलेह, आने वाली दुनिया में हम और आप अभियोक्ता होंगे और दूसरे अभियुक्त. देखते हैं अल्लाह क्या चाहता है. मैं आपको तब तक गले लगाए रखना चाहती हूं जब तक मेरा दम न निकल जाए. मैं आप से बहुत प्यार करती हूं.
रेहाना
01, अप्रैल, 2014 

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