सीतापुर ॠण घोटाला : चीनी मिल प्रबंधन और बैंक की मिलीभगत उजागर

Sitapur-2उत्तर प्रदेश सीतापुर के हरगांव स्थित बिड़ला समूह की दी अवध शुगर मिल्स लिमिटेड ने धोखाधड़ी करके किसानों की ज़मीनें खातों पर गिरवी रख दीं और यूको बैंक सीतापुर से 125 करोड़ रुपये का फसली ॠण निकाल लिया. संबंधित किसानों को इसका पता तक नहीं चला. मिल प्रबंधन ने इस घोटाले में किसानों के उन दस्तावेजों का आपराधिक फ़ायदा उठाया, जो गन्ना के लेन-देन के लिए किसान मिल के पास जमा करते हैं. किसानों के साथ धोखाधड़ी करके अंजाम दिए गए इस घोटाले की जानकारी अधिकारियों को थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. घोटाला करने वाले चीनी मिल प्रबंधन और यूको बैंक सीतापुर के अधिकारीगण बेखौफ घूम रहे हैं. यूको बैंक के उक्त अधिकारियों की साठगांठ के बारे में आसानी से कल्पना की जा सकती है, जिन्होंने बिना किसी छानबीन और पूछताछ के तक़रीबन डेढ़ सौ किसानों की ज़मीनें गिरवी रखकर चीनी मिल को 125 करोड़ रुपये का फसली ॠण दे दिया. यह बिड़ला समूह की सीतापुर स्थित वही चीनी मिल है, जिस पर किसानों का करोड़ों रुपये का गन्ना मूल्य बकाया है. इसने विगत कई वर्षों से किसानों का गन्ना मूल्य भुगतान नहीं किया.
देश-प्रदेश में बड़े से बड़े घोटाले आए दिन होते रहते हैं, जिनमें से कुछ समाचार-पत्रों की सुर्खियां बन जाते हैं, लेकिन कुछ घोटाले घुटकर रह जाते हैं. ऐसे घोटालों का खुलासा करने में सरकारी मशीनरी निहित स्वार्थों के चलते कोई रुचि नहीं दिखाती और घोटालेबाज बच निकलते हैं. सीतापुर में वर्षों पूर्व हुए खाद्यान्न घोटाले की जांच सीबीआई आज तक पूरी नहीं कर सकी. इसी तरह समाज कल्याण विभाग में हुए पेंशन घोटाले की जांच भी दबी पड़ी है. केंद्र सरकार द्वारा संचालित मनरेगा योजना के कार्यों में भी आर्थिक घोटाला किया गया, जिसकी सीबीआई जांच शुरू हो चुकी है. जांच में विलंब और विभागीय अधिकारियों के दांव-पेंच के चलते घोटालेबाज क़ानून के शिकंजे में फंसने से बच जाते हैं. करोड़ों रुपये का ॠण घोटाला करने वाली अवध शुगर मिल्स हरगांव और यूको बैंक सीतापुर के आपराधिक कृत्य के बारे में किसानों को भनक तक नहीं लगी कि उनकी ज़मीनें गिरवी रखकर मिल और बैंक के अधिकारियों का गिरोह गुलछर्रे उड़ा रहा है. 125 करोड़ रुपये के ॠण के दस्तावेजों पर यूको बैंक ने किन लोगों के हस्ताक्षर लिए, किन लोगों की जमानतें लीं और मिल प्रबंधन के किस शीर्ष अधिकारी से औपचारिक सहमति ली, यह सब अभी तक स्पष्ट नहीं है. किसान इस घोटाले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें प्रदेश सरकार के किसी भी तंत्र पर कोई भरोसा नहीं है.

किसान पूछ रहे हैं कि जब घोटाला उजागर हो गया कि शुगर मिल हरगांव ने किसानों के ज़मीन खातों पर यूको बैंक से फसली ॠण के नाम पर 125 करोड़ रुपये निकाल लिए और खुलासा होने पर उन तमाम खातों पर मिल द्वारा उन्हीं किसानों के नाम पर आपाधापी में पैसा भी जमा कराया जाने लगा, तो फिर घोटालेबाजों के ख़िलाफ़ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई और उनकी गिरफ्तारियां क्यों नहीं हुईं.

शासन-प्रशासन के अधिकारियों ने घोटाले की जानकारी होते हुए भी उस पर पर्दा डाल दिया. घोटाले का भेद एक किसान को उसकी जानकारी मिलने के बाद खुला. राम गुलाम नामक किसान ने इलाहाबाद बैंक की सिविल लाइन शाखा में फसली ॠण लेने के लिए आवेदन किया था. बैंक ने अपनी कार्रवाई पूरी करने के बाद उक्त किसान को सूचना भेजी कि उसके नाम से यूको बैंक से पहले ही ॠण लिया जा चुका है. यह सूचना पाकर राम गुलाम के होश उड़ गए. किसी की सलाह पर उक्त किसान ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत इसकी पूरी जानकारी मांगी और इस तरह इतने बड़े घोटाले की परतें उधड़नी शुरू हुईं. इस घोटाले को स्थानीय मीडिया ने भी तवज्जो नहीं दी. ज़िले में सार्वजनिक चर्चा है कि बैंक और चीनी मिल प्रबंधन ने पत्रकारों और प्रशासन, दोनों को मैनेज कर रखा है. चर्चा यह भी है कि प्रकरण के जानकार एक इलेक्ट्रॉनिक मीडियाकर्मी को चीनी मिल में नौकरी दिलाने का भी लालच दिया गया था.
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि इस प्रकरण की पूरी जानकारी ज़िला गन्ना अधिकारी, ज़िला प्रशासन और लखनऊ स्थित गन्ना आयुक्त कार्यालय तक को थी.
सीतापुर के ग्राम-गडौसा, पोस्ट-मतुआ निवासी किसान राम गुलाम पुत्र रघुनंदन प्रसाद ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत ज़िला गन्ना अधिकारी, गन्ना आयुक्त कार्यालय उत्तर प्रदेश, यूको बैंक सीतापुर, चीनी मिल हरगांव और सहकारी गन्ना विकास समिति लिमिटेड हरगांव से जब जानकारी मांगी, तब यह खुलासा हुआ कि अवध शुगर मिल हरगांव ने यूको बैंक सीतापुर से किसानों के भूमि खातों पर फसली ॠण के नाम पर 125 करोड़ रुपये का ॠण लिया है. ज़िला गन्ना अधिकारी ऊषा पाल और यूको बैंक के प्रबंधक के पत्रों से उक्त खुलासे की पुष्टि होती है कि फसली ॠण के रूप में किसानों के 125 करोड़ रुपये यूको बैंक सीतापुर से निकाले गए हैं. इतने बड़े पैमाने पर किए गए घोटाले के ज़िम्मेदार चीनी मिल मालिक, मिल प्रबंधन एवं यूको बैंक के अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई और अब मामले की लीपापोती करने की कवायद चल रही है. इससे गन्ना किसानों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है.
किसान पूछ रहे हैं कि जब घोटाला उजागर हो गया कि शुगर मिल हरगांव ने किसानों के ज़मीन खातों पर यूको बैंक से फसली ॠण के नाम पर 125 करोड़ रुपये निकाल लिए और खुलासा होने पर उन तमाम खातों पर मिल द्वारा उन्हीं किसानों के नाम पर आपाधापी में पैसा भी जमा कराया जाने लगा, तो फिर घोटालेबाजों के ख़िलाफ़ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई और उनकी गिरफ्तारियां क्यों नहीं हुईं. ॠण देने के खेल में यूको बैंक के अधिकारियों ने निजी लाभ के लिए सारे नियम-क़ानून ताक पर रख दिए. लिहाजा, चीनी मिल प्रबंधन के अधिकारियों के
साथ-साथ यूको बैंक के अधिकारी भी उतने ही दोषी हैं. बैंक से जुड़े लोगों का कहना है कि ॠण स्वीकृत करने से पहले बैंक संबंधित आवेदक से ॠण अदायगी हेतु गारंटी मांगता है, फिर बैंक अधिकारी उसकी विधिवत जांच करते हैं. आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही ॠण स्वीकृत होता है, जिसे संबंधित आवेदक के खाते में भेजा जाता है. तो फिर संबंधित किसान इस पूरे प्रकरण से अलग क्यों रहे? उन्हें अंधेरे में क्यों रखा गया? ऐसे कई सवाल मुंह बाए खड़े हैं, लेकिन जवाब नदारद है. चीनी मिल से जुड़े किसानों के लिए चीनी मिल प्रबंधन संबंधित बैंक को गारंटी दे सकता है, लेकिन किसानों को ॠण स्वीकृत करने से पहले बैंक प्रबंधन उसकी पूरी तरह पुष्टि करता है. उसके बाद ही ॠण की धनराशि सीधे किसानों के खातों में भेजी जाती है. इस मामले में बैंक प्रबंधन ने इस सामान्य नियम का पालन क्यों नहीं किया? उधर, ज़िला गन्ना अधिकारी ऊषा पाल ने किसान राम गुलाम के शिकायती पत्र का उल्लेख करते हुए एक पत्र (संख्या-1973/79/क्रय/शिकायत/सीतापुर, 09 सितंबर, 2013) सचिव-गन्ना समिति हरगांव को प्रेषित किया. ज़िला गन्ना अधिकारी ने अपने पत्र में चीनी मिल हरगांव द्वारा यूको बैंक स्टेशन रोड सीतापुर से गन्ना किसानों के नाम पर 125 करोड़ रुपये का फसली ॠण लेने का हवाला देते हुए उक्त प्रकरण की जांच करके तीन दिनों के अंदर संबंधित किसानों के बयान लेने और नियमानुसार चीनी मिल के ख़िलाफ़ आवश्यक कार्रवाई करने की बात कही थी. ऊषा पाल ने यूको बैंक के शाखा प्रबंधक को भी पत्र भेजकर कहा था कि अवशेष गन्ना मूल्य के आधार पर सीधे किसानों को ॠण दिए जाने की विभागीय व्यवस्था नहीं है. यदि बैंक के स्तर से संबंधित किसानों की जानकारी और सहमति के बगैर ऐसा किया जा रहा है, तो यह नियम विरुद्ध है. इस ॠण की अदायगी के लिए संबंधित किसान ज़िम्मेदार नहीं होंगे.
सहकारी गन्ना विकास समिति लिमिटेड हरगांव द्वारा की गई जांच पर अपनी सफाई पेश करते हुए यूको बैंक सीतापुर के शाखा प्रबंधक ने अपने पत्र (संख्या-यूको बैंक/सीतापुर/2013-14/30 दिनांक, 24-09-2013) में पहले तो कहा कि राम गुलाम पुत्र रघुनंदन प्रसाद, ग्राम-गडौसा, पोस्ट-मतुआ, ज़िला सीतापुर के नाम पर बैंक में किसी भी प्रकार का ॠण नहीं है. फिर यह भी कहा कि बैंक के प्रधान कार्यालय द्वारा 125 करोड़ रुपये दी अवध शुगर मिल्स लिमिटेड हरगांव के साथ समझौता अरेजमेंट के तहत स्वीकृत किए गए हैं, जिसकी अदायगी की समस्त ज़िम्मेदारी कंपनी की है. चीनी मिल और यूको बैंक द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर ज़िला गन्ना अधिकारी ने किसान राम गुलाम को भी आधिकारिक तौर पर बताया कि चीनी मिल हरगांव द्वारा यूको बैंक सीतापुर से 125 करोड़ रुपये का ॠण तो लिया गया, लेकिन ॠण की अदायगी की समस्त ज़िम्मेदारी चीनी मिल हरगांव की है. किसानों पर उसके भुगतान की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है. दी अवध शुगर मिल्स लिमिटेड के अधिशाषी उपाध्यक्ष (वित्त) ने भी अपने पत्र के ज़रिये यह माना है कि यूको बैंक से लिए गए 125 करोड़ रुपये के ॠण की अदायगी की समस्त ज़िम्मेदारी चीनी मिल की है. उसकी अदायगी की ज़िम्मेदारी किसी भी किसान की नहीं होगी. लेकिन, विडंबना यह है कि शासन, प्रशासन, चीनी मिल प्रबंधन या यूको बैंक प्रबंधन के किसी भी अधिकारी ने इस घोटाले को लेकर की गई कार्रवाई के बारे में एक शब्द नहीं कहा.


चीनी मिल और बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई ज़रूरी
गन्ना किसानों की सहमति के बगैर चीनी मिल हरगांव द्वारा कूट रचना करके उनके भूमि खातों पर 125 करोड़ रुपये यूको बैंक से निकाल लेना आपराधिक कृत्य है. क़ानून के जानकारों का कहना है कि चीनी मिल प्रबंधन एवं यूको बैंक के अधिकारियों के विरुद्ध धारा 467, 468, 471, 420 व 120-बी के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेजने की कार्रवाई होनी चाहिए. जो चीनी मिल प्रबंधन बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से किसानों की सहमति के बगैर उनके ज़मीन खातों पर फसली ॠण लेने की हिम्मत कर सकता है, तो वह साजिशन किसानों की ज़मीनों का दूसरे से सौदा भी कर सकता था. जब इस पूरे प्रकरण का खुलासा हो गया कि चीनी मिल प्रबंधन ने यूको बैंक से साठगांठ करके किसानों के फर्जी हस्ताक्षर एवं अंगूठे के निशान बनाए और करोड़ों रुपये का घोटाला किया, तो फिर भी ज़िला प्रशासन ने संबंधित लोगों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? लोगों का कहना है कि अगर यह मामला चीनी मिल से संबंधित न होकर किसी अन्य का होता, तो अब तक उसकी संपत्ति कुर्क हो गई होती और वह जेल में बंद होता. सीतापुर के जनप्रतिनिधि एवं विभिन्न पार्टियों के नेता भी इस मसले पर जानकारी के बावजूद चुप्पी साधे बैठे हैं. ज़िले के किसान संगठनों की भी आवाज़ इस प्रकरण को लेकर काफी कमजोर है.


…और किसानों की खुदकुशी का रास्ता खोल दिया गया
किसान राम गुलाम द्वारा सूचना का अधिकार क़ानून का सहारा लेने से उजागर हुए घोटाले से मिल और बैंक में हड़कंप मच गया. किसान खाताधारकों की जांच कराए बगैर यूको बैंक ने इतना बड़ा फसली ॠण चीनी मिल को सीधे तौर पर कैसे थमा दिया, इसे लेकर तमाम सवाल खड़े होने लगे. चीनी मिल द्वारा उक्त बैंक को किसानों के नाम, पते, ॠण के एकाउंट नंबर और धनराशि की बाकायदा सूची सौंपी गई थी. उस सूची के अनुसार, किसान कन्हैया लाल मिश्रा पुत्र रेउती राम मिश्रा निवासी पिपरझला सीतापुर के एकाउंट नंबर-10170515100200 और कन्हैया लाल पुत्र सूर्यबली निवासी बैरागढ़ लखीमपुर खीरी के एकाउंट नंबर-10170515100226 पर तीन-तीन लाख रुपये का फसली ॠण दिखाया गया है. जबकि प्रभात कुमार पुत्र कमलेश कुमार निवासी उदरहा जनपद सीतापुर के एकाउंट नंबर- 10170515107023 पर 62 हज़ार रुपये का फसली ॠण दिखाया गया है. इसी तरह सैकड़ों किसानों के भूमि खातों पर चीनी मिल ने यूको बैंक
सीतापुर से मिलीभगत करके 125 करोड़ रुपये निकाल लिए. जानकार लोगों का मानना है कि अगर इस पूरे प्रकरण का खुलासा न होता, तो यूको बैंक किसानों को अपना कर्जदार मानकर उनसे ही ॠण की अदायगी कराता. ॠण अदा न करने की स्थिति में किसानों की ज़मीनें वह नीलामी पर चढ़ा देता. नतीजा यह होता कि बहुत से किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते.


चीनी मिलों के अभिलेखों की नियमित जांच हो
जिस प्रकार अवध चीनी मिल्स लिमिटेड हरगांव ने साजिशन 125 करोड़ रुपये किसानों के नाम पर निकाल लिए, कहीं ऐसा ही घोटाला प्रदेश की अन्य चीनी मिलें तो नहीं कर रही हैं? अब यह सवाल सामने खड़ा हो गया है. किसानों का कहना है कि शासन को आर्थिक अनुसंधान शाखा के ज़रिये चीनी मिलों के रिकॉर्ड की नियमित जांच करानी चाहिए. ऐसे घोटाले पाए जाने पर चीनी मिल समेत सभी दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्‍चित की जानी चाहिए.

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