जब तोप मुकाबिल हो

असहमति की जगह बचनी चाहिए

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humanityकामनाएं की गई थीं कि पिछली शताब्दी में जितने ख़ून-ख़राबे हुए, जितनी असहिष्णुता हुई, वह अगली शताब्दी में नहीं होगी. नई शताब्दी आई, लेकिन लोगों की शुभकामनायें काम नहीं आईं. विश्‍व के लगभग हर देश में किसी न किसी प्रकार के सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं. असहमति के लिए कोई जगह बचेगी या नहीं, इस पर संशय पैदा हो गया है. ताजा घटना पेरिस की है जहां कार्टून छापने वाली एक पत्रिका के दफ्तर में तीन लोगों ने घुसकर अंधाधुंध गोली-बारी की और संपादक सहित कुल 10 पत्रकारों की हत्या कर दी. घटना में दो पुलिस वाले भी मारे गए.
यह असहमति का दौर इतना जबरदस्त है कि आप कहीं पर भी अपनी राय अगर निश्चिंततापूर्वक रखना चाहें तो उसके विरोध में तर्क नहीं आते, बल्कि गोली आने की संभावना बढ़ जाती है. हालांकि, इसमें कोई दो राय नहीं कि वो गोली सांसे तो बंद करती है पर विचार नहीं, और यही पेरिस में भी हुआ. दुनिया के करोड़ों लोग इस पत्रिका की मुहिम से जुड़ गए. हो सकता है जिन लोगों ने पत्रकारों को मारने के लिए हत्यारों को भेजा हो वो अपने छिपने के स्थान पर मुस्करा रहे हों कि खूब सबक सिखाया, अब कोई असहमति की बात नहीं करेगा. लेकिन सारी दुनिया ने असहमति के पक्ष में अपने हाथ खड़े किये हैं.
भारत में सबसे पहले जी न्यूज ने यह हिम्मत दिखाई और उसने उन कार्टूनों को प्रमुखता के साथ पूरे दिन और शाम को प्राइम टाइम प्रोगाम डीएनए टेस्ट में दिखाया. जिन कार्टूनों की वजह से इन पत्रकारों की हत्या की गई. इतना ही नहीं जी न्यूज के सुधीर चौधरी और रोहित सरदाना ने बार-बार यह कहा कि हम इसे पत्रकारों की हत्या के विरोध स्वरूप दिखा भी रहे हैं और सबसे अपील कर रहे हैं कि वे भी इन कार्टूनों को दिखाएं और असहमति एवं अभिव्यक्ति को समर्थन देने वाली मुहिम में शामिल हों.
मुझे जी न्यूज के मालिक डॉ सुभाष चंद्रा गोयल की प्रशंसा करने में कोई हिचक नहीं हो रही है. क्योंकि बिना मालिक की हिम्मत दिखाए आज के जमाने में इस स्टैंड को लेना मुश्किल है. दौर होते हैं, जिस दौर में सवाल खड़े होते हैं, आलोचनाएं भी होती हैं. लेकिन जब वैचारिक संकट का समय आए उस समय स्टैंड लेना बहादुरी की बात मानी जाती है. जिसके लिए जी न्यूज के मालिक डॉ सुभाष चंद्रा गोयल को और उनकी पूरी टीम को, विशेषकर पत्रकारों सुधीर चौधरी और रोहित सरदाना को (जिन्होंने स्क्रीन पर आकर हिम्मत दिखाई) बधाई देनी चाहिए.
हिन्दुस्तान दुनिया के उन मुल्कों में है, जहां बड़े पैमाने पर आतंकवादी गतिविधियां नहीं चल रही हैं. लेकिन हमारे यहां एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिनके वैचारिक खोखलेपन की वजह से हमारे देश में भी वैमनस्य अपनी पराकाष्ठा पर जाकर हथियार उठा सकता है. हमारे पड़ोस में जो देश हैं, उन देशों में धर्म को लेकर, ईश्‍वर को लेकर, पूजा की पद्धति को लेकर बहस की कोई गुंजाइश नहीं है. वहां के समाज में यह माना जाता है कि अगर आप ईश्‍वर, धर्म या धर्म-ग्रंथ के ऊपर कोई सवाल उठाते हैं या किसी शंका का समाधान चाहते हैं तो आप मृत्यु को आमंत्रित करते हैं. लेकिन हिन्दुस्तान में धर्म और ईश्‍वर न केवल सहिष्णु है, व्यापक है और सबको समाहित करने वाला भी है. भारत में हिन्दू कट्टर धर्म नहीं है. एक जीवन शैली है. हमारे यहां 33 करोड़ देवी-देवता हैं, जिसमें जानवर, पक्षी, पेड़, पौधे, नदी, वायु, जल, अग्नि इन सबकी पूजा का प्रावधान है. हमारे यहां साकार ब्रह्म भी हैं और निराकार ब्रह्म भी हैं. हमारे यहां हम चाहें तो सबकी पूजा करें, चाहें तो किसी की पूजा न करें.
हमारे यहां यह माना जाता है और खासकर ईश्‍वर को मानने वाले भी यह कहते हैं कि हम ईश्‍वर को इसलिए मानते हैं क्योंकि ईश्‍वर हमें यह अधिकार देता है कि हम अगर उसको नहीं मानें तो भी वह हमें सजा नहीं देगा. इसीलिए हमारे यहां नास्तिक लोगों की बड़ी संख्या है. पूजा पद्धत्तियां भिन्न-भिन्न हैं. एक ही धर्म को मानने वाले लोगों में सैकड़ों प्रकार की पूजा पद्धत्तियां हैं. कोई किसी के ऊपर दबाव नहीं डालता.
इस विशाल, सहिष्णु, सबको समाहित करने वाले, सबको विकसित होने का मौका देने वाले, धर्म को मानने वालों में से ही कुछ ने एक नई प्रक्रिया शुरू कर दी है. उनका यह कहना है कि हम अपने घर से बाहर जाने वालों की वापसी कर रहे हैं. उनका यह कहना है कि सबको एक तरह की पूजा करनी चाहिए. उनका यह भी कहना है कि जो हमारी बात नहीं मानता उसका विरोध करना हमारा धर्म है और इतना ही नहीं, वो धर्म के द्वारा देश को गरीबी के दलदल में ले जाना चाहते हैं. बजाय इसके कि हिन्दू धर्म के नाम पर शामिल विभिन्न वर्गों को गरीबी के दलदल से बाहर निकालें, वो उसे उसी दलदल में फंसा देना चाहते हैं. अब यह बयान हिन्दू धर्म का नेतृत्व करने वाले एक संगठन की तरफ से आया है कि हिन्दुओं को बहुत सारे बच्चे पैदा करने चाहिए. बच्चे पैदा करने का अर्थ क्या होता है, यह वह खुद जानते हैं. लेकिन वह देश में गरीबों की एक बड़ी संख्या और पैदा करना चाहते हैं.
ये मुद्दे हैं, जिन मुद्दों के ऊपर भारत में रहने वाले सभी विचारधाराओं को मानने वाले, सोचने समझने वाले लोगों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है. सवाल यह है कि क्या हम अपने देश को उन देशों की तरह बनाना चाहते हैं जहां धर्म पर, धर्मग्रंथों पर, ईश्‍वर के ऊपर कोई भी सफाई नहीं मांगी जा सकती है? क्या हम इस देश में एक धार्मिक कठमुल्लापन पैदा कर एक धर्म संसद जैसी संस्था बनाकर सब लोगों को जबरदस्ती उसका अनुयायी बनाना चाहते हैं. अगर ऐसा होगा तो इसका परिणाम क्या होगा?
क्या इसका परिणाम वैसा ही नहीं होगा, जैसा हमारे पड़ोसी मुल्कों में है या दुनिया के बहुत सारे देशों में है. जहां पर एक ही ईश्‍वर, एक ही धर्म, एक ही धर्मग्रंथ को मानने वाले हाथों में बंदूकें लेकर एक दूसरे की हत्या कर रहे हैं. क्योंकि उनका मानना है कि हमारे धर्म की परिभाषा सही है, हमारे धर्मग्रंथ की परिभाषा सही है, और हमारे ही मुल्क में रहने वाले बाकी लोगों की धर्मग्रंथों की परिभाषा या बाकी लोगों द्वारा की गई ईश्‍वर की परिभाषा गलत है और ऐसे लोग मौत की सजा के हकदार हैं.
अगर हमारे देश में भी यही परंपरा डालने की कोशिश उन लोगों के द्वारा हुई, जो धर्म को नहीं समझते हैं, जो ईश्‍वर को नहीं समझते हैं, जो 33 करोड़ देवी-देवताओं के अभ्युदय का मतलब नहीं जानते हैं. ऐसे लोग इस देश को, इस देश की संस्कृति को, इस देश के मानस को तबाह करने की योजना बनाने की शुरूआत कर चुके हैं.
जरूरत इस बात की है कि इस संपूर्ण कोशिश के ऊपर विराम लगे और यह विराम उस तरीके से नहीं लग सकता जिस तरीके से हमारे पड़ोसी मुल्कों में लगता है. इस देश में उन लोगों को खड़ा होना पड़ेगा जो लोग इस देश की पांच हजार साल पुरानी संस्कृति को या सैकड़ो साल पुराने भाईचारे को बरकरार रखना चाहते हैं. पर इसमें यह सावधानी रखने की जरूरत है कि हम अपनी कथाओं में खासकर पौराणिक कथाओं में वर्णित बातों को इतिहास का सत्य न बना दें. इतिहास और पौराणिक कथाओं में भेद होता है. बहुत सारे देशों में ऐसा होता है. लेकिन हिन्दुस्तान में आज तक ऐसा नहीं हुआ. अब एक नई कोशिश हुई है कि हम उन किवदंतियों को, पौराणिक कथाओं को, उनमें वर्णित बातों को इतिहास का सत्य बनाने और विज्ञान का सत्य बनाने पर तुले हुए हैं.
यह शताब्दी सपनों की शताब्दी हो, यह शताब्दी भाइचारे की शताब्दी हो, यह शताब्दी विकास की शताब्दी हो और यह शताब्दी गरीबी से लड़ने की शताब्दी हो, यह शताब्दी जाहिलियत से मुक्तिपाने की शताब्दी हो, यह कामना करनी चाहिए. इस कामना को याद करते हुए अपने पड़ोसी से उस कामना में शामिल होने का आग्रह करना चाहिए. मुस्कराहट बहुत अमूल्य चीज है. मुस्कराहट को बनाए रखना बहुत बड़ा धर्म है. इसी धर्म की पूजा हमें करनी चाहिए.

संतोष भारतीय Contributor|User role
संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.
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संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

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