ऑनलाइन बुक स्टोर के ख़तरे और चुनौतियां

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Untitled-1दो हज़ार चौदह को किताबों की दुनिया या कहें कि प्रकाशन के कारोबार के लिहाज से भी अहम वर्ष के तौर पर देखा जाएगा. किताबों की दुनिया में दो ऐसी घटनाएं घटीं, जिन्होंने भारत में कम होती जा रही किताबों की दुकानों के लिए ख़तरे की घंटी बजा दी है. पहले मशहूर लेखक चेतन भगत के उपन्यास हाफ गर्लफ्रेंड के लिए उसके प्रकाशक ने ऑनलाइन वेबसाइट फ्लिपकार्ट से समझौता किया. उस करार के मुताबिक प्रकाशक ने फ्लिपकार्ट को यह अधिकार दिया था कि पहले कुछ दिनों तक चेतन भगत की किताब स़िर्फ फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन बुक स्टोर पर ही मौजूद रहेगी. बदले में फ्लिपकार्ट ने भी प्रकाशक को एकमुश्त साढ़े सात लाख प्रतियों का ऑर्डर दिया. चेतन भगत के उपन्यास की प्री-बुकिंग ही जमकर हुई. इस एक्सक्लूसिव करार की वजह से भारत में चेतन के लाखों प्रशंसकों ने फ्लिपकार्ट के ऑनलाइन स्टोर से जाकर किताब खरीदी. जब तक उनका उपन्यास किताबों की दुकान तक पहुंचता, तब तक उसके पाठक उसे खरीद चुके थे. चेतन भगत के ज़्यादातर पाठक इंटरनेट की दुनिया से जुड़े हैं, लिहाजा उनके लिए फ्लिपकार्ट से खरीद करना सुविधाजनक भी रहा था.
उस वक्त भारत के प्रकाशन जगत के लिए यह बिल्कुल नई घटना थी, लिहाजा देश के किताब विक्रेता खामोश रहे. अब इसी तरह का करार भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नई किताब-द ड्रामेटिक डिकेड, द इंदिरा गांधी ईयर्स का भी सामने आया है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब के प्रकाशक ने एक बार फिर एक दूसरी बड़ी ऑनलाइन कंपनी अमेजन से करार किया. इस करार के मुताबिक किताब के जारी होने के इक्कीस दिनों तक यह स़िर्फ अमेजन पर उपलब्ध होगी. मतलब यह है कि इक्कीस दिनों तक कोई पाठक प्रणब मुखर्जी की यह किताब एक्सक्लूसिव तौर पर इसी वेबसाइट से खरीद सकता था. उसके बाद यह देश भर के पुस्तक विक्रेताओं के पास पहुंचेगी. इसका नतीजा यह हुआ कि प्री-बुकिंग के दौर में ही महामहिम की यह किताब लोकप्रियता के लिहाज से चेतन भगत और सचिन तेंदुलकर की किताब के बाद तीसरे पायदान पर पहुंच गई.

प्री-बुकिंग के आंकड़ों को देखकर तो यही लग रहा था कि इससे पुस्तक विक्रेताओं को खासा ऩुकसान हुआ होगा. यहां भी एक अलग तरह का तंत्र है. वेबसाइट ने प्रणब मुखर्जी की इस किताब की प्री-बुकिंग शुरू की. जैसे-जैसे किताब रिलीज होने की तारीख नज़दीक आने लगी, तो ऑनलाइन स्टोर ने इसके मूल्य में भी कमी करनी शुरू की.

प्री-बुकिंग के आंकड़ों को देखकर तो यही लग रहा था कि इससे पुस्तक विक्रेताओं को खासा ऩुकसान हुआ होगा. यहां भी एक अलग तरह का तंत्र है. वेबसाइट ने प्रणब मुखर्जी की इस किताब की प्री-बुकिंग शुरू की. जैसे-जैसे किताब रिलीज होने की तारीख नज़दीक आने लगी, तो ऑनलाइन स्टोर ने इसके मूल्य में भी कमी करनी शुरू की. किताब पर छपे मूल्य 595 रुपये की बजाय प्री-बुकिंग में इसका मूल्य 446 रुपये रखा गया था. रिलीज वाले दिन इस किताब का मूल्य घटाकर 399 रुपये कर दिया गया. यह बिक्री का अपना गणित भी है और मुना़फे का अर्थशास्त्र भी. इस खेल का एक और पक्ष भी है, वह यह कि अमेजन पर एक ग्राहक प्रणब मुखर्जी की किताब की स़िर्फ एक ही प्रति खरीद सकता था. अगर किसी को दो या उससे अधिक प्रतियां चाहिए, तो उसे उतने ही ग्राहक प्रोफाइल या एकाउंट बनाने होंगे. यह बाज़ार में थोक बिक्री के आसन्न ख़तरे के मद्देनज़र किया गया है. इसी तरह से मार्केटिंग के दांव चेतन की किताब की बिक्री के वक्त भी खेले गए. चेतन की किताब ने बिक्री के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. प्रकाशन जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रणब मुखर्जी की किताब भी खूब बिक रही है. एक तो प्रणब मुखर्जी का लेखन, दूसरे किताब के केंद्र में इंदिरा गांधी. इन दोनों को मजबूती प्रदान करने के लिए जबरदस्त मार्केटिंग के तौर-तरीके.
अंगे्रजी में किताब बिक्री के इस नए चलन से एक सवाल भी उठा है. क्या दुकान पर जाकर किताब खरीदने वालों को अब कुछ खास किताबों के लिए इंतज़ार करना होगा या फिर उन्हें भी किताबों की दुकान से मुंह मोड़कर ऑनलाइन स्टोर की ओर जाना पड़ेगा. भारत में कम हो रही किताबों की दुकान के लिए बिक्री का यह नया अर्थशास्त्र एक गंभीर चुनौती है. वक्त बदला है, वक्त के साथ प्रकाशन जगत के कायदे-क़ानून भी बदल रहे हैं, लेकिन बदलाव की इस बयार में ऑनलाइन स्टोर्स की एक्सक्लूसिविटी किताबों की दुकान में पूंजी लगाने वालों को हतोत्साहित करने वाली है. इसे रोकने के लिए दिल्ली के मशहूर खान मार्केट में मौजूद एक बुक स्टोर और दिल्ली एवं अन्य महानगरों में बुक स्टोर की शृंखला के मालिकों ने कड़ा रुख अख्तियार किया है. इन दोनों ने तो चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों के प्रकाशकों की अन्य किताबें उन्हें वापस भेजने का ़फैसला लिया है. उनका कहना है कि यह पाठकों के साथ धोखधड़ी है. उनका एक तर्क यह भी है कि इस तरह से किताबों का कारोबार नहीं चलता है. अगर किसी भी प्रकाशक को ऑनलाइन बुक स्टोर पर जाना है, तो फिर उसे सारी किताबें वहीं बेचनी होंगी. यह नहीं हो सकता है कि चर्चित शख्सियतों एवं लेखकों की किताबें ऑनलाइन बेची जाएं और कम चर्चित एवं गंभीर किताबें दुकानों के माध्यम से बेची जाएं.
कुछ अन्य बुक स्टोर्स ने भी प्रकाशकों को पत्र लिखकर विरोध जताया है और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी है. चेतन भगत और प्रणब मुखर्जी की किताबों की मार्केटिंग के बरक्स अगर हम हिंदी प्रकाशन की दुनिया को देखें, तो हमारे हिंदी के प्रकाशक मित्र अभी इस स्तर पर बाज़ार का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. बाज़ार के इस खेल को समझने और लागू करने की दिशा में अगर सोच भी रहे हों, तो मैदान में उतरने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं. हिंदी के प्रकाशकों का अभी इन ऑनलाइन बुक स्टोर से राफ्ता कायम नहीं हो सका है. हिंदी की कुछ गिनी-चुनी किताबें ही इन वेबसाइट्स के ऑनलाइन बुक स्टोर पर मौजूद हैं. उसमें भी कई बार लिंक क्लिक करने पर एरर ही आ जाता है, जिससे पाठकों को कोफ्त होती है. हिंदी के प्रकाशकों को बाज़ार के इस खेल में शामिल होना पड़ेगा. इसका एक फ़ायदा यह होगा कि हिंदी में लिखने वाले लेखकों की पहुंच ज़्यादा होगी और हिंदी की किताबों के संस्करणों की जो संख्या लगातार कम होती जा रही है, उसमें बढ़ोत्तरी होगी. बाज़ार के अपने ख़तरे भी हैं, लेकिन पाठकों तक पहुंचने के लिए इन ख़तरों का उठा लेना चाहिए.
हमारे देश में पुस्तक विक्रेताओं का अभाव है. इस कमी को पूरा करने के लिए भी क़दम उठाने होंगे. विशाल हिंदी पाठक वर्ग को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक है कि ऑनलाइन स्टोर के साथ-साथ हिंदी के प्रकाशक इस तरह की कोई योजना बनाएं, जिससे वे पाठकों तक पहुंच सकें. छोटे शहरों में तो फिर भी किताबें मिल जाती हैं, लेकिन बड़े शहरों और मेट्रो में किताबों की अनुपलब्धता पाठकों को खिन्न करती है. अभी हाल में साहित्य अकादमी ने दिल्ली मेट्रो के साथ स्टेशनों पर किताबों की दुकानें खोलने के लिए करार किया है, लेकिन दो मेट्रो स्टेशनों पर किताबों की दुकानों से काम नहीं चलने वाला है. साहित्य अकादमी को इस दिशा में और पहल करनी होगी, साथ ही भारत सरकार को इसमें सहयोग करना होगा. साहित्य अकादमी के माध्यम से अगर किताबों की दुकानें शुरू करने का प्रयोग सफल होता है, तो भारत सरकार को अकादमी को इस मद में बजट देना होगा. इसके लिए आवश्यक है कि भारत सरकार एक नई पुस्तक नीति बनाए. पुस्तकों को लेकर सरकार का रुख नरम है. अभी जिस तरह से पुस्तकों के कारोबार को जीएसटी के दायरे से बाहर कर दिया गया है, वह संकेत उत्साहजनक है.
सरकार को राष्ट्रीय पुस्तक नीति बनाने से पहले इस पर राष्ट्रव्यापी बहस कराने की ज़रूरत है. इस व्यवसाय से जुड़े और इसे जानने वाले सारे पक्षों की बातें सुनकर, समझ कर नीति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए, लेकिन प्राथमिकता किताबों की उपलब्धता को ध्यान में रखकर तय होनी चाहिए. हमारे देश में हर तरह की नीति बनती है, लेकिन किताबों को लेकर एक समग्र नीति के अभाव में आज़ादी के इतने सालों बाद भी पुस्तक संस्कृति का विकास नहीं हो पाया है. सरकार के अलावा ग़ैर-सरकारी संस्थाओं को भी पुस्तक संस्कृति विकसित करने की दिशा में कोशिश करनी होगी. सबकी सामूहिक कोशिशों से ही किताबों को लेकर नई पीढ़ी में ललक पैदा करनी होगी. अगर यह हो सकता है, तो फिर ऑनलाइन स्टोर पर एक्सक्लूसिव किताबें बेचने की मार्केटिंग के तरीकों पर रोक भी लग सकती है और मुना़फे का समावेशी वितरण हो सकेगा. दूसरा फ़ायदा हिंदी के लेखकों को भी होगा और उनकी आय में बढ़ोत्तरी होगी. अब तक बाज़ार से भागने वाले लेखकों को बाज़ार के तौर-तरीके अपनाने ही होंगे. अगर ऐसा हो पाता है, तो यह पुस्तक प्रकाशन कारोबार के लिए अच्छे दिन लेकर आएगा.

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