कृषि क्षेत्र के कायाकल्प की जरुरत

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page-7देश में कृषि नीति के संबंध में जो राजनीतिक नेतृत्व की जरूरत थी या फिर किरदार होना चाहिए था वह तो नहीं है. ऐसा लगता है कि उनमें या तो समझ की कमी है या उतना उत्साह नहीं है. सरकार सिर्फ इतना करती है कि जो कुछ पहले से चलता चला आ रहा है, उसी में कुछ बढ़ा देने का प्रयास कर देते हैं. कभी फर्टिलाइजर सब्सिडी बढ़ा दो, एमएसपी घटा दो या ब़ढा दो, नई क्रॉप एमएसपी में डाल दो, चलो थोड़ा सा ये करेंगे तो ये हो जाएगा, वही पुराना तरीका अपनाया जा रहा है. दूसरा ये है कि सरकार का प्रॉब्लम सॉल्विंग अप्रोच है कि अगर कोई प्रॉब्लम है तो सॉल्व कर दो. किसानों की प्रॉब्लम के्रडिट की है तो क्रेडिट दे दो, एमएसपी की प्रॉब्लम है तो एक रुपया ब़ढा दो. इस तरह की बातें ही अभी तक हो रही हैं. मुख्य बात है कि कोई बड़े बदलाव की कोशिश नहीं हो रही है. इसका कारण यह है कि राजनीतिक नेतृत्व और अफसरशाही को कृषि ग्लैमरस नहीं लगती है. उससे मीडिया की हेडलाइन नहीं बनती. इसी वजह से एग्रीकल्चर को लेकर कोई उत्साह नहीं है. जैसे इंडस्ट्री के लिए सीआईआई है, फिक्की है, ये कुछ न कुछ करते हैं. नई पॉलिसी, नये तौर-तरीकों की बात करेंगे. उसमें इन्वेस्टमेंट भी है. तो जो इन्वेस्टमेंट करते हैं वो भी उसमें कुछ न कुछ करते हैं. ये सब कृषि में नहीं है. कृषि क्षेत्र में महज टोकनिज्म है और यही कृषि का दुर्भाग्य है.
मोदी सरकार को अपने बजट में कृषि को प्राथमिकता देनी चाहिए. देश में कई नई योजनाओं की शुरुआत हुई लेकिन बीच रास्ते में ही खत्म हो गईं. मोदी सरकार को रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट यानि नदियों को जोड़ने की परियोजना को फिर से शुरू करना चाहिए. एक लाख करोड़ रुपये हर साल उस प्रोजेक्ट के लिए आवंटित कर देना चाहिए. पांच साल में हमारी खेती की दशा में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाएगा. ये एक लाख करोड़ रुपये हम कहीं से भी लाएं. टैक्स से इकट्ठा करें या सेस से इकट्ठा करें, लोगों से लोन लें, बॉन्ड निकालें, कुछ भी करे सरकार, लेकिन हमें एक लाख करोड़ रुपये हर साल इस पर लगाना चाहिए. हम नहरें और नदियों को जोड़ने में सफल हो गए तो देश में इतना बड़ा बदलाव आ सकता है, जिसकी हम कभी कल्पना नहीं कर सकते हैं.
आज पानी की उपलब्धता की वजह से खेती में उत्पादन सीमित है. हम आज भी गेहूं-धान लगाने को ब़िढया काम कह रहे हैं. क्या ब़िढया काम कर रहे हैं. हम न तो जमीन का सदुपयोग कर रहे हैं और न हम इस प्रकृति द्वारा दी गई हवा और धूप का प्रयोग ठीक से कर रहे हैं. मेरे हिसाब से गेहूं और धान लगाना कोई अक्लमंदी नहीं है. राजस्थान को देखिए यह राज्य एक तरफ यमुना की पानी के लिए लड़ता है और दूसरी तरफ गेहूं का उत्पादन करता है और राजस्थान से एक्सपोर्ट कर देता है. फूड कॉर्पोरेशन को दे देता है कि हमने 10 लाख टन गेहूं का उत्पादन कर के दे दिया. एक किलो गेहूं पैदा करने में तो 1800 लीटर पानी लगता है तो आप जोड़ लें कि कितना पानी हम एक्सपोर्ट करते हैं. दूसरे ये दोनों क्रॉप लीस्ट एम्प्लॉयमेंट ओरिएंटेड हैं. एक तो पानी की मुसीबत, दूसरी एम्प्लॉयमेंट. अगर आप मैन डेज बेसिस पर कैलकुलेट करें तो आपको पता चलेगा कि मुश्किल से एक एकड़ जमीन में 50-55 मैन डेज का वर्क क्रिएट होता है. उसी तरह अगर उसी जमीन और उसी जगह में उतने उपलब्ध पानी में अगर हम सब्जियों की खेती करें, अगर हो सकती हैं तो, वो 500 मैन डेज का एम्प्लॉएमेंट क्रिएट करेगी. यदि हम, और भी पानी कम है, जमीन के नीचे से पानी निकाल रहे हैं 300, 500, 800, 1000 फुट पर डार्क जोन डिक्लियर करते जा रहे हैं. वहां पर हम वहां गेहूं और चावल की खेती करना बंद कर दें और उसकी जगह हम फलों के पेड़ लगायें तो वहां पर हम 700-800 मैन डेज एम्लॉयमेंट जेनरेट करेंगे. प्रति एकड़ हम कितना एम्लायमेंट क्रिएट कर रहे हैं, प्रति एकड़ हम कितना पानी कितना उपयोग कर रहे हैं, ये बेसिस होना चाहिए. प्रति एकड़ हम कितना खाद्य उत्पादन कर रहे हैं. वो तो हमारी जरूरत 70 के दशक में थी. दुनिया सारी स्थिर नहीं है. पहले हम फिएट में चलते थे अब फोर्ड में चलने लगे हैं.
दूसरा हमारी जो वन भूमि है उनमें जंगल तो होना चाहिए. बंजर जमीन नहीं होनी चाहिए. अभी तो हम इसकी दुर्दशा कर रहे हैं. कानून बना दिया कि जंगल में कुछ नहीं होगा. परिणाम क्या हो रहा है, जो है वो तो सब खत्म होता जा रहा है, हरियाली के नाम पर हम जंगली बबूल लगा रहे हैं. न वो धरती के काम आ रहा है, न गाय भैंस के काम आ रहा है न इंसान के काम आ रहा है. हमारे पास प्रकृति की विरासत में मिली हुई विविधता है, ट्रॉपिकल कंट्री होने की वजह से हमें बहुत बड़ी मात्रा में विविध फूड डायरेक्टली और इंडायरेक्टली तरीके से उपलब्ध हैं. हमेशा से ही हम कृष्ण की कहानियां सुनते हैं, कि साहब गाय पालते थे और सब गाय पे जिंदा रहते थे, कृष्ण की कहानियों में कहीं नहीं आता है कि ग्वाले खेती करके पेट भरते थे. यानि कि मुख्य फूड दूध था. एनीमल प्रोडक्ट, उनका सोर्स ऑफ फूड क्या था- जंगल. कोई खेती करके गेहूं का भूसा तो स्टोर करता नहीं था. इसका जिक्र स्टोरी में तो नहीं है आता है कहीं. यदि आप इतिहास देखें तो हमनें अपने टोटल क्रॉपिंग पैटर्न को बर्बाद कर लिया और जंगल विभाग को हमने अलग कर दिया और उनकी जिम्मेदारी हो सकती है इंडायरेकट्ली प्रोडक्शन ऑफ फूड. यदि हम उनको टारगेट करें तो बहुत बड़ा रिसोर्स प्रोडक्टिव यूज में आ जाएगा. यदि इस बजट में कोई ट्रॉन्सफॉर्मेशन आ सकता है तो उसके लिए फॉरेस्ट, एनिमल हस्बेंड्री और एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट को एक टेबल पर लाया जाए. उनके कंबाइन्ड प्रोग्राम बनाए जायें. तीनों को एक टेबल पर लाया जाये और कहा जाये कि आप कमरे से तभी निकलोगे जब आपके पास एक मिलियन हेक्टेयर को हरा करके10 मिलियन या 100 मिलियन फॉडर प्रोडक्शन करने का प्लान हाथ में होगा. उतने फॉडर से इतना दूध और इतना मीट और जाने क्या-क्या पैदा होगा. यह फॉडर हमारे पेट भरने से नहीं न्यूट्रीशन की जरूरतों को पूरा करेगा. जो भी हम मिस कर रहे हैं.
मैं बड़े दिनों से ऑब्जर्व करता हूं और ये जमीन के अधिग्रहण और जमीन से संबंधित समस्या भी है. ये हमारी नहीं पूरी दुनिया की संस्कृति के उद्भव का मूल कारण भी रहा है. हम सब नदी या पानी के रिसोर्स पर बसे हैं. परिणाम यह है कि हमारे आज भी अधिकतर शहरों की बसावट अच्छे पानी के प्राकृतिक स्त्रोत पर निर्भर है, आप किसी भी शहर का नाम लेंगे वहां पर या तो कोई नदी होगी या कोई बड़ी झील या तालाब होगा. या जमीन में बहुत आसानी से उपलब्ध पानी होगा. अभी तकरीबन 100-150 सालों में कृषि छोड़ कर दूसरे इकोनॉमिक्स सेक्टर में जो तरक्की हुई है, उससे आप देखेंगे कि लोग शहरी किसान बन गए. उदाहरण के लिए किसी ने शहर में कपड़ों का शोरूम खोला और निवेेश के लिए 10 बीघा जमीन खरीदी है, अब वह कोई पहाड़ी ज़मीन तो नहीं खरीदेगा, वो सबसे प्रोडक्टिव लैंड खरीदता है. प्रोडक्टिव लैंड ऐसे नॉन प्रोडक्टिव काम में डाइवर्ट हो गई है. आप यकीन नहीं करेंगे. ऐसी भी मिलियन हेक्टेयर लैंड है. और शहरी तो ऐसे ही छोड़ देते हैं. बंटाई के नियम ठीक नहीं हैं. वहां ताला बंद करके चौकीदार रखते हैं. उसी चौकीदार से कहते हैं कि उगा कुछ. वो उगाए तो ठीक न उगाए तो ठीक. उसका तो केवल इन्वेस्टमेंट का ऑब्जेक्टिव है, अभी क्या कर सकते हैं.
मेरा मानना है कि हम दो आब्जेक्टिव को लिंक कर सकते हैं. एक तो रोजगार और दूसरा हाई वैल्यू हाई रिस्क फूड प्रोडक्शन. हमारे यहां जमीन अच्छी है, पानी उपलब्ध है. सब सुविधायें हैं और हमारे यहां बेरोज़गारों की फौज है. हम कृषि के लिए आईटीआई खोल सकते हैं. युवाओं को बाजार से जु़डी चीजों के उत्पादन की ट्रेनिंग दी जा सकती है. साथ ही अगर हम लैंड ऑनर की वनरेबिलीटी का सिस्टम क्रिएट कर दें. जो उसे ये सुरक्षा देता हो कि यदि मैंने कोई ऐसी लेबर इंगेज की जो वहां फूलों की, फलों की, सब्जियों की खेती कर सकती है, वो मेरी जमीन नहीं दाबेगा. और वहां जो उपज होगी उसका फेयर शेयर उसे मिलेगा. और उसमें चोरी नहीं होगी. कानूून तो बना सकते हैं. सरकार को न तो पैसा देना पड़ेगा न बजट एलोकेशन करना पड़ेगा. लेकिन नियम में ऐसे प्रावधान करने पड़ेंगे जिससे ये संभव हो. जब हम महिलाओं के लिए इतने बड़े कानून बना सकते हैं तो हम कह सकते हैं कि दूसरे की जमीन तुमने हड़पी तो तुम्हें बीस साल की सजा होगी. सोचेगा आदमी कि मुझे ऐसा नहीं करना है. कानून बना दें कि आपने इस जमीन पर होने वाली उपज में से चोरी की तो तुम्हें कम से कम पांच साल की सजा होगी. तो वह नहीं करेगा. ऐसे हम यदि कुछ न कुछ इनेबलिंग प्रोवीजन क्रिएट करें. और बजट में अलोकशन करें इस तरह के लोगों को ट्रेनिंग देने की. पांच, दस, बीस लाख लोगों को ट्रेनिंग दें. ऐसे दो बीघा में एक आदमी खप जाएगा. यदि ऐसी पांच, दस मिलियन हेक्टेयर जमीन है तो आप नंबर निकाल सकते हैं कि कितने लोग इस इंडस्ट्री में लग जायेंगे. फिर इसके बाद जो वैल्यू एडीशन होगा उसमें रोजगार मिलेगा. न तो बैंक के ऊपर प्रेशर आएगा. न सरकार को कोई लोन सब्सिडी देनी पडेगी. यहां ट्रांस्फॉर्मेशनल बदलाव करने की जरूरत है.
1920 के बाद में 1970 तक 50 साल तक खेती में उत्पादन बढ़ाने के लिए एक बहुत बड़ा इंडस्ट्रियल रिवाल्यूशवन जो हुआ वो हुआ डेवलपमेंट ऑफ केमिकल इन पुट्स, बोथ एज फर्टीलाइजर एंड पेस्टीसाइड. जो उस समय उचित समझा गया वो किया गया. लेकिन आज जो परिणाम है उसे देखकर ये विचार किए जाने की जरूरत है कि हमें इसका कोई कोई न कोई अलटरनेटिव तो ढूंढना पड़ेगा. केमिकल्स के दाम बढ़ते जायेंगे. खेती में आमदनी कम होती जाएगी. केमिकल पेस्टेसाइड वाले ज्यादा पैसे मांगेंगे. तो सरकार कहेगी कि और सब्सिडी देते हैं और आवाज उठेगी. एमएलए और एमपी उससे ज्यादा अपने लेवल पर और उससे कुछ कर नहीं सकते हैं. उतना उनका एक्सपोजर भी नहीं है. उन्हें इस तरह समझने का मौका भी नहीं मिलता है. रीसेंटली ऑर्गेनिक एग्रीकल्टर के आने के बाद में एक बात स्टेब्लिश्ड हो गई कि बिना केमिकल के खेती तो होती है. और देश में कश्मीर में केशर से लेकर अंडमान में नारियल तक जैविक तरीके से हो रहा है. क्यों न देश में एक राट्रीय मुहिम चलाई जाये जो कहे कि देश में ये मुहिम चले कि हमारे टारगेट है कि कुल होने वाले वाले फर्टीलाइजर का हम दस प्रतिशत सब्सटीट्यूशन करेंगे. पहले तो ये फैसला होगा. उसके पीछे मेरिट होगी. इस पर चर्चा करें तो मेरिट समझ में आएगी, अब कैसे होगा, तो बॉयलॉजिकल है. कैसे फर्टीलिटी मैनेजमेंट के नए टूल डेवलप कर सकते हैं. जिसमें अधिक ऑर्गेनिक मैन्योर, उसका बेटर कन्वर्शन और उसका सॉइल में एप्लीकेशन हो तो हम शायद ये लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं. मोटे तौर पर ये नंबर फेवरेवल हैं. इसे एचीव करने के लिए. यानि, यदि मैं तय कर लूं कि मुझे 1 मिलियन हेक्टेयर के अंदर कोई भी केमिकल इनपुट नहीं डालना है, एज ए फर्टीलाइजर. अब पेड़ तो नहीं पहचानता है, कुछ लोग बोलते हैं कि साहब केमिकल नहीं तो खेती नहीं, ये तो मूर्खता भरी बात है कि पेड़ तो नहीं पहचानता है कि उसे नाइट्रोजन गोबर की खाद से आ रही है या केमिकल फर्टीलाइजर या यूरिया से आ रही है. उसे नाइट्रोजन मिला तो पेड़ की ग्रोथ होगी ही. तो हम ये प्लानिंग करें जो पहले मैंने फॉरेस्ट वाला बोला कि दोनों को लिंक करने से मिलियन्स ऑप हेक्टेयर लैंड, विच इज करेंटली अंडर स्ट्रेस ऑफ प्रोडक्टिवीटी कैन बी ब्रॉट टू ए बेटर मैनेजमेंट सिस्टम, ये एक फिलॉसफी की बात है. बजट क्या करेगा? इसमें बजट कैन एलॉकेट सम मेजर इनिशिएटिव 25-25 लाख रुपये एक-एक केवीके को दे दिया.इस तरह का टोकनिज्म नहीं. सीधे 10 हजार हजार करोड़ का एलोकेशन इसलिए इसको सपोर्ट करने के लिए, किसानों को एक फॉलबैक मैकेनिज्म प्रोवाइड करने के लिए, इसके ऊपर रिसर्च करने के लिए और लोकल लेवल के ऊपर इसकी प्रेक्टिसेज डेवलप करने के लिए. ऑर्गेनिक मैन्योर फॉर्मर लेवल पर भी बनाई जाए ऑर्गेनिक मैन्योर कमर्शियल लेवल पर भी बनाई जाए.इंटरप्रोन्योर को प्रमोट किया जाए. उनको सपोर्ट की जरूरत पड़ेगी कुछ समय तक, तो यह भी एक राष्ट्रीय लक्ष्य का काम हो सकता है, ट्रांसफॉर्मेशनल बदलाव लाएगा. पांच-दस सालों में बहुत बड़े पैमाने पर इसका आपको बज़ट में इंपैक्ट दिखाई देगा. यदि केमिकल फर्टीलाइजर की सब्सिडी सरकार अगर हम कहें एक डेढ़ लाख करोड़ रुपये साल की है, वो धीरे-धीरे कम होती दिखाई देगी. जमीनों का स्ट्रेस खत्म हो जाएगा. और हम तो बहुत लकी हैं हमारे पास में तो बहुत सारे मिनरल्स हैं. रॉक फॉस्फेट हमार देश का अपना है, जिप्सम हमारे देश अपना है, और भी दूसरे न्यूट्रेंट्स हैं. केवल सल्फर की मारा-मारी है. सल्फर हमें इंपोर्ट करना पड़ता है वो भी जिंक सल्फेट वगैरह कुछ हैं इनसे पूर्ति हो सकती है. अगर इंसानों ने अक्ल लगा के यूरिया और डीएपी का विकास किया तो विकास करके बॉयोलाजिकल सोर्स ऑफ न्यूट्रिएंट भी बना लेंगे. कोई ये बोले कि यह संभव नहीं है तो ये अज्ञानता की वजह से या और किसी कारण की वजह से कहता होगा. तो ये भी एक ऐसा बदलाव बजट में ला सकता है.
(लेखक भारत में जैविक खेती की शुरुआत करने वाले कृषि वैज्ञानिक हैं. वे वर्तमान में मोरारका फाउंडेशन के साथ जु़डे हुए हैं और देश में सबसे ब़डे जैविक कृषि फॉर्म को मैनेज कर रहे हैं.)

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