कोयला महाघोटाला : चौथी दुनिया का अनुमान सच साबित हुआ

4141वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 और 2010 के दौरान आवंटित किए गए कुल 218 कोल ब्लॉक्स को अवैध करार देते हुए उनमें से 214 निरस्त करने का आदेश दिया था. ये सभी कोल ब्लॉक्स झारखंड, छतीसगढ़, महाराष्ट्र, पश्‍चिम बंगाल, ओडिशा और मध्य प्रदेश में स्थित हैं. सरकार ने 26 दिसंबर, 2014 को कोल माइंस (स्पेशल प्रोविज़न) सेकंड ऑर्डिनेंस, 2014 लागू करके 204 कोल ब्लॉक्स की नीलामी के लिए इंटर-मिनिस्ट्रीयल समिति गठित की थी. इस समिति ने 100 ब्लॉक्स की नीलामी पर विचार करने के बाद 65 ब्लॉक्स की नीलामी का रास्ता साफ़ किया है. इन 65 ब्लॉक्स में से इस्तेमाल (एंड-यूजर) के आधार पर 45 ब्लॉक्स की ऑनलाइन नीलामी की प्रक्रिया जारी है. अब तक कुल 18 ब्लॉक्स की नीलामी को अंतिम रूप दिया जा चुका है. अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? 1993 से 2010 तक यह गोरखधंधा कैसे चलता रहा और किसी ने इसका संज्ञान क्यों नहीं लिया?

दरअसल, आज से तक़रीबन चार साल पहले 25 अप्रैल-01 मई 2011 के अंक में चौथी दुनिया ने इस गोरखधंधे का पर्दाफाश किया था. यह ऐसा घोटाला था, जो 1993 से बिना रोक-टोक जारी था. इस दौरान कई पार्टियां सत्ता में आईं और चली गईं. लेकिन जो चीज़ नहीं बदली, वह थी कोयला मंत्रालय के ज़रिये चलाई जा रही यह लूट. इस घोटाले में इतनी बड़ी राशि शामिल थी, जिसे ध्यान में रखते हुए उस समय इस घोटाले को घोटालों के पितामह का ख़िताब दिया गया था. चौथी दुनिया ने अपनी उस रिपोर्ट में भारत के सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले पर संज्ञान लेने के लिए इन शब्दों में गुहार लगाई थी: क्या सर्वोच्च न्यायालय इस महाघोटाले को अनदेखा कर देगा? संसद से हमें बहुत ज़्यादा आशा नहीं है, क्योंकि उसकी समझ में जब तक आएगा, तब तक उसके 5 साल पूरे हो जाएंगे. जनता बेबस है, उसे हमेशा एक महानायक की तलाश रहती है और अब महानायक पैदा होने बंद हो चुके हैं. अब एक ही महानायक है और वह है देश का सुप्रीम कोर्ट, उसी के चेतने का इंतज़ार है. बहरहाल, न्यायालय ने इस मुद्दे पर नोटिस लिया और 1993 से 2010 तक के सभी कोल ब्लॉक आवंटन रद्द करके सरकार के लिए प्रतिस्पर्धात्मक बोली के आधार पर कोल ब्लॉक आवंटित करने का रास्ता साफ़ किया.
108 रुपये में भी बिका कोयला
बहरहाल, जिन 45 कोल ब्लॉक्स की नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई है, उनमें से अब तक के 18 कोल ब्लॉक्स का आवंटन पूरा किया जा चुका है. अब तक की बोली में छत्तीसगढ़ की गारे पाल्मा-खत/5 खदान को हिंडालको इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 3502 रुपये प्रति मीट्रिक टन बोली पर ख़रीदा है, जबकि छत्तीसगढ़ के गारे पाल्मा की ही खत/2 और 3 खदान को जिंदल पॉवर लिमिटेड (जेपीएल) ने 108 रुपये प्रति मीट्रिक टन की सबसे कम बोली पर ख़रीदा है. अब तक की नीलामी प्रक्रिया पर नज़र डाली जाए, तो 18 में से केवल 6 खदानें हैं, जिनकी बोली तीन अंकों में है. 5 खदानें बिजली क्षेत्र को गई हैं. बिजली क्षेत्र के लिए सुरक्षित खदानों की बोली कम इसलिए है, क्योंकि सरकार ने इसकी अंतिम विक्रय सीमा निर्धारित कर दी थी, जिसके लिए सरकार ने यह दलील दी थी कि अगर बिजली के लिए सुरक्षित कोल ब्लॉक्स की अंतिम विक्रय सीमा निर्धारित नहीं की गई, तो बिजली उत्पादन का खर्च बढ़ जाएगा और बिजली महंगी हो जाएगी. लेकिन जिंदल पॉवर लिमिटेड (जेपीएल) को आवंटित की गईं खदानें सरकार के इस दावे को संदेह के घेरे में ला खड़ा करती हैं और कई सवालों को भी जन्म देती हैं. पहला यह कि क्या बिजली के नाम पर राष्ट्रीय संसाधनों को औने-पौने दामों में बांटने के बावजूद जनता को सस्ती बिजली मिल रही है? दूसरा यह कि गारे पाल्मा-खत/2 और 3 ब्लॉक केवल 108 रुपये प्रति मीट्रिक टन की बोली पर क्यों बिके, जबकि इनसे कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित गारे पाल्मा-खत/5 खदान अब तक की सबसे महंगी बोली पर बिकी है और बिजली के लिए सुरक्षित दूसरी खदानों पर भी इससे काफी ऊंची बोली लगी है?
जेपीएल की दो खदानों की कुल क्षमता 155 मिलियन टन है, जो नीलामी के लिए रखी गई किसी भी खदान से अधिक है. वहीं गारे पाल्मा खदानों का कोयला सबसे उत्तम गुणवत्ता का है, तो उसे पॉवर सेक्टर के इस्तेमाल के लिए ही क्यों सुरक्षित रखा गया? क्या पॉवर सेक्टर के लिए कम गुणवत्ता वाली खदानों को नहीं रखा जा सकता था. साथ ही इन खदानों के दो अन्य दावेदारों अडानी पॉवर और जीएमआर का बोली से हट जाना भी संदेह पैदा करता है. हालांकि, इन दो कंपनियों ने नीलामी से हटने की वजह इन खदानों की अपने पॉवर प्लांट से दूरी और ढुलाई की अधिक लागत बताई है.
26 लाख करो़ड का ही था वह घोटाला
अब 2011 की चौथी दुनिया की रिपोर्ट पर एक नज़र डालते हैं, जिसमें कहा गया था कि अगर बाज़ार मूल्यों या प्रतिस्पर्धा के आधार पर इन कोल ब्लॉक्स का आवंटन हुआ होता या नीलामी हुई होती, तो भारत के राजकीय कोष को 26 लाख करोड़ रुपये का ऩुकसान न होता. दरअसल, निजी क्षेत्र में कैप्टिव (संशोधित) ब्लॉक देने का काम 1993 से शुरू किया गया. उस समय यह कहा गया था कि कुछ कोयला खदानें खनन की दृष्टि से सरकार के लिए आर्थिक रूप से कठिन कार्य सिद्ध होंगी, इसलिए उन्हें निजी क्षेत्र की कंपनियों को दे दिया जाए. उस स्टोरी में कहा गया था कि 1993 से लेकर 2010 तक 208 कोयले के ब्लॉक बांटे गए, जो कि 49.07 बिलियन टन कोयला था. इनमें से 113 ब्लॉक निजी क्षेत्र में 184 निजी कंपनियों को दिए गए, जो कि 21.69 बिलियन टन कोयला था. अगर बाज़ार मूल्य पर इसका आकलन किया जाए तो 2,500 रुपये प्रति टन के हिसाब से इस कोयले का मूल्य 5,382,830.50 करोड़ रुपये निकलता है. अगर इसमें से 1250 रुपये प्रति टन काट दिया जाए, यह मानकर कि 850 रुपये उत्पादन की क़ीमत है और 400 रुपये मुनाफ़ा, तो भी देश को लगभग 26 लाख करोड़ रुपये का राजस्व घाटा हुआ. जब चौथी दुनिया में पहली बार यह रिपोर्ट प्रकाशित हुई, तो किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था कि 26 लाख करोड़ रुपये का कोयला घोटाला भी संभव हो सकता है. बाद में मीडिया में इसे 10 लाख करोड़ रुपये का घोटाला कहकर पेश किया गया, जबकि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने 1,86,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा पेश किया था.
बहरहाल, अब तक नीलाम हो चुकी 18 कोयला खदानों की बोली का औसत निकाला जाए, तो वह तक़रीबन 1,800 रुपये प्रति मीट्रिक टन आता है. यह रक़म शायद और अधिक हो सकती थी, क्योंकि जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि बिजली क्षेत्र के लिए सुरक्षित खदानों की अंतिम सीमा तय कर दी गई थी, ताकि बिजली उत्पादन की लागत न बढ़ जाए. आगे होने वाली नीलामियों में यह औसत बढ़ भी सकता है. ज़ाहिर है, इन नीलामी नतीजों के आधार पर यह निश्‍चित रूप से कहा जा सकता है कि चौथी दुनिया ने अपनी 2011 की रिपोर्ट में जो निष्कर्ष निकाला था, वह बिल्कुल सही साबित हुआ है.
सरकार और कोयला मंत्रालय ने कोल ब्लॉक का ई-ऑक्शन (इलेक्ट्रॉनिक नीलामी) करके इस प्रक्रिया में जो पारदर्शिता लाने का प्रयास किया है, वह सराहनीय है. ज़ाहिर है, इस क़दम से 1993 से राष्ट्रीय संसाधनों की जो लूट मची थी, उस पर लगाम लगेगी. ग़रीबों और किसानों के लिए स्वास्थ्य, कृषि और दूसरे क्षेत्रों में सरकार द्वारा सब्सिडी दिए जाने पर सीना पीट-पीटकर कोसने वाले अर्थशास्त्रियों, राजनीतिक टिप्पणीकारों और नव-उदारवाद के पैरोकारों से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या बिजली के नाम पर सस्ता कोयला दिए जाने के बाद सस्ती बिजली की मांग तर्कसंगत नहीं है? और, नव-उदारवाद के नाम पर जो इतने बड़े पैमाने पर देश के संसाधन की लूट मची, उसकी भरपाई कौन करेगा?

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