सवर्ण आयोग ने खोला अगड़ी जातियों का जगीनी सच : रोटी और रोज़गार के लाले

बिहार की ऊंची जातियों में शिक्षा की सच्चाई यह है कि उनके बीच साक्षरता दर सबसे अधिक होने के बावजूद शिक्षा का स्तर नीचे है. दूसरी ओर ग्रामीण बिहार में ग़रीबी के चलते हिंदुओं की ऊंची जातियों के 49 फीसद और मुसलमानों के 61.8 फीसद बच्चे स्कूल या कॉलेज नहीं जा पाते. दोनों धर्मों में ऊंची जातियों के कुल 55.8 फीसद बच्चे स्कूल या कॉलेज नहीं जा पाते और उसकी वजह ग़रीबी है. शहरों में स्कूल-कॉलेज न जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद 55.6 फीसद है. ऊंची जातियों के बीच हायर सेकेंड्री और स्नातक से ज़्यादा शिक्षित लोगों की संख्या कम है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में ऊंची जातियों के बीच हायर सेकेंड्री करने वाली आबादी महज 31.2 फीसद है, जबकि शहरी इलाकों में 52.1 फीसद. इसका मतलब यह कि ऊंची जातियों के बीच उच्च शिक्षा की पहुंच नहीं बन पाई है. 

backkमोटे तौर पर अभी तक यह माना जाता है कि अगर आप अगड़ी जाति के हैं, तो कम से कम आपको खाने और पीने की दिक्कत नहीं होगी, रहन-सहन का स्तर ठीक होगा और परिवार के लोगों की पढ़ाई-लिखाई अच्छी होगी. सरकार की नीतियां भी इसी सोच से प्रभावित होती रही हैं और इसलिए कल्याणाकारी योजनाओं का जो लाभ दलितों एवं अति पिछड़ों को मिलता आया है, उससे अगड़ी जातियों को यह सोचकर वंचित रखा गया कि उन्हें उनकी ज़रूरत नहीं है. छात्रवृृत्ति से लेकर नौकरियों में आरक्षण तक में अगड़ी जातियों को हिस्सेदारी नहीं दी गई. लेकिन, अगड़ी जातियों की आर्थिक एवं शैक्षणिक हक़ीक़त से जब पर्दा धीरे-धीरे उठने लगा, तो सरकारी सोच पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया. इस सच को उजागर करने में एस-4 जैसे संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अब जब सवर्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, तो यह सा़फ हो गया कि अगड़े केवल नाम के ही अगड़े हैं, हक़ीक़त में उनकी बड़ी आबादी तो रोटी और रा़ेजगार के लिए तरस रही है. एस-4 के अगुवा राम बिहारी सिंह कहते हैं, वर्षों से जो बात मैं कह रहा था, आज वह सच साबित हुई. अगड़ी जातियों में जो पिछड़ापन है, उसे देखने की इच्छाशक्ति राजनेताओं को पैदा करनी होगी. दलितों और अति पिछड़ों की तरह अगड़ी जातियों के लोग भी बहुत सारी दिक्कतों से रोज़ाना रूबरू हो रहे हैं. एस-4 के माध्यम से मैंने इस ओर सरकार का ध्यान खींचने का प्रयास किया था, लेकिन उस समय उसका ग़लत अर्थ निकाल लिया गया. अब जब सवर्ण आयोग की रिपोर्ट आ गई है, तो सरकार को जल्द से जल्द उसकी सिफारिशें अमल में लानी चाहिए, ताकि यह तबका भी सम्मान के साथ जीने का हक़ हासिल कर सके.
ग़ौरतलब है कि हिंदुओं एवं मुसलमानों में अगड़ी जातियों की शैक्षणिक व आर्थिक स्थितियों का पता लगाने के लिए नीतीश सरकार ने 27 जनवरी, 2011 को सवर्ण आयोग का गठन किया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश डीके त्रिवेदी इस आयोग के अध्यक्ष थे. जानकारी के अनुसार, आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऐतिहासिक कारणों से ऊंची जाति के लोगों के बीच जो प्रतिकूल हालात हैं, उस पर उचित ध्यान नहीं दिया गया है. इसलिए अब उस पर मन बदलने की ज़रूरत है. प्रतिकूल स्थितियों में रह रहे लोगों पर कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिये विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगड़ी जातियों की बड़ी आबादी को रा़ेजगार नहीं मिल पा रहा है और उसकी कमाई के रास्ते कम होते जा रहे हैं. हिंदू एवं मुसलमानों की अगड़ी जातियों में काम करने वाली कुल आबादी के एक चौथाई यानी 25 फीसद हिस्से के पास रोज़गार नहीं है. हिंदुओं में सबसे ज़्यादा बेरा़ेजगारी भूमिहारों में है. इस जाति के औसतन 11.8 फीसद लोगों के पास रोज़गार नहीं है. रा़ेजगार के मा़ैके न पैदा होने की वजह से अगड़ी जातियों के कई परिवारों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है.
राज्य सवर्ण आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगड़ी जातियों में काम करने वाली आबादी (रा़ेजगार एवं बेरा़ेजगारों को मिलाकर) हिंदुओं में 46.6 फीसद और मुसलमानों में 43 फीसद है. यह आंकड़ा वर्ष 2011 की जनगणना में काम करने वाली कुल आबादी 44.9 ़फीसद के क़रीब है. रिपोर्ट में शहरी और ग्रामीण इलाकों में ऊंची जातियों के बीच बेरोज़गारी का स्तर क़रीब-क़रीब एक समान बताया गया है. शहरी इलाकों में बसने वाली हिंदुओं की कायस्थ जाति में बेरोज़गारी का स्तर 14.1 ़फीसद है, जो अन्य अगड़ी जातियों की तुलना में सर्वाधिक है. मुसलमानों में सैयद सबसे ज़्यादा (11.3 फीसद) बेरा़ेजगार हैं. लेकिन, इन दोनों जातियों में शिक्षा का स्तर दूसरी जातियों की तुलना में कहीं ज़्यादा है. शहरी इलाके की ऊंची जातियों में शिक्षित
बेरोज़गारों की तादाद सबसे ज़्यादा बताई गई है, खासकर कायस्थ और सैयद में. भूमिहार ग्रामीण इलाकों में 13.2 ़फीसद और शहरी इलाकों में 10.4 ़फीसद बेरा़ेजगार हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में कामकाजी महिलाओं की आबादी 20.2 फीसद है. लेकिन, हिंदुओं और मुसलमानों की ऊंची जातियों में कामकाजी महिलाओं की आबादी महज 2.6 फीसद है. इसका मतलब है कि सामाजिक चलन के हिसाब से ऊंची जातियों की महिलाओं द्वारा काम करना अच्छा नहीं माना जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, बेरोज़गारी के चलते ऊंची जातियों को आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ रहा है. शहरी इलाकों में ऊंची जातियों में कामकाजी महिलाओं की आबादी हिंदुओं में 7.6 फीसद और मुसलमानों में 7.4 फीसद है.
बिहार की ऊंची जातियों में शिक्षा की सच्चाई यह है कि उनके बीच साक्षरता दर सबसे अधिक होने के बावजूद शिक्षा का स्तर नीचे है. दूसरी ओर ग्रामीण बिहार में ग़रीबी के चलते हिंदुओं की ऊंची जातियों के 49 फीसद और मुसलमानों के 61.8 फीसद बच्चे स्कूल या कॉलेज नहीं जा पाते. दोनों धर्मों में ऊंची जातियों के कुल 55.8 \फीसद बच्चे स्कूल या कॉलेज नहीं जा पाते और उसकी वजह ग़रीबी है. शहरों में
स्कूल-कॉलेज न जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद 55.6 फीसद है. ऊंची जातियों के बीच हायर सेकेंड्री और स्नातक से ज़्यादा शिक्षित लोगों की संख्या कम है. रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में ऊंची जातियों के बीच हायर सेकेंड्री करने वाली आबादी महज 31.2 फीसद है, जबकि शहरी इलाकों में 52.1 फीसद. इसका मतलब यह कि ऊंची जातियों के बीच उच्च शिक्षा की पहुंच नहीं बन पाई है. ऊंची जातियों के हिंदुओं और मुसलमानों के पास ज़मीन तो है, लेकिन इतनी नहीं कि उन्हें पूर्ण रूप से रा़ेजगार मुहैया करा सके. उन्हें जीवनयापन के लिए अन्य कार्यों पर निर्भर रहना पड़ता है. यह हक़ीक़त ग्रामीण के साथ-साथ शहरी इलाकों की भी है. राज्य सवर्ण आयोग की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों में ऊंची जातियों के पास ज़मीन तो है, लेकिन वह इतनी ज़्यादा नहीं है कि सभी को काम मिल सके.

ग्रामीण इलाकों में रहने वाले ऊंची जाति के परिवारों के पास औसतन कृषि योग्य भूमि का रकबा 1.91 एकड़ (हिंदू) और 0.45 एकड़ (मुस्लिम) है. अगर हिंदुओं की ऊंची जातियों के बीच देखें, तो भूमिहार ऐसी बिरादरी है, जिसके पास कृषि योग्य भूमि औसतन प्रति परिवार 2.96 एकड़ है. राजपूतों में 1.99 एकड़, ब्राह्मणों में 1.40 एकड़ और कायस्थों में 1.01 एकड़ प्रति परिवार का औसत है. दूसरी ओर मुसलमानों की ऊंची जातियों में पठान के पास प्रति परिवार औसतन कृषि योग्य ज़मीन 0.48 एकड़ है, जबकि शेख के पास 0.46 और सैयद के पास 0.37 एकड़ ज़मीन प्रति परिवार है.

ग्रामीण इलाकों में 18.1 फीसद ऊंची जाति के हिंदुओं को पूर्ण रा़ेजगार की श्रेणी में रखने के लिए खेती के इतर दूसरे सहायक काम करने की ज़रूरत है. ऊंची जाति के मुसलमानों में ऐसे लोग 11.8 ़फीसद हैं. शहरी इलाकों की दास्तां इससे भिन्न नहीं है. शहरों में भी ऊंची जाति के लोग अपने पुश्तैनी या परंपरागत रा़ेजगार से इतर अन्य कार्यों से संबद्ध हैं. आम धारणा है कि बिहार की ऊंची जातियों के पास ही ज़मीन का रकबा ज़्यादा है, लेकिन सवर्ण आयोग की रिपोर्ट इस धारणा को खंडित करती है. हिंदुओं की ऊंची जाति के 55.1 फीसद और मुसलमानों की ऊंची जाति के 86.1 ़फीसद परिवारों के पास ज़मीन का मामूली टुकड़ा है. ये ऐसे परिवार हैं, जिनके पास एक एकड़ से भी कम ज़मीन है. इसका अर्थ है कि हिंदुओं और मुसलमानों की अत्यंत छोटी आबादी का ज़मीन के बड़े भाग पर एकाधिकार है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पांच एकड़ तक कृषि योग्य भूमि रखने वाले ऊंची जाति के हिंदू परिवार मात्र 8.6 ़फीसद और मुसलमान परिवार 1.1 ़फीसद हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले 50 ़फीसद परिवारों के पास ज़मीन नहीं है यानी यह आबादी भूमिहीन है. ऐसे परिवारों में अगड़े-पिछड़े सभी शामिल हैं.
ग्रामीण इलाकों में रहने वाले ऊंची जाति के परिवारों के पास औसतन कृषि योग्य भूमि का रकबा 1.91 एकड़ (हिंदू) और 0.45 एकड़ (मुस्लिम) है. अगर हिंदुओं की ऊंची जातियों के बीच देखें, तो भूमिहार ऐसी बिरादरी है, जिसके पास कृषि योग्य भूमि औसतन प्रति परिवार 2.96 एकड़ है. राजपूतों में 1.99 एकड़, ब्राह्मणों में 1.40 एकड़ और कायस्थों में 1.01 एकड़ प्रति परिवार का औसत है. दूसरी ओर मुसलमानों की ऊंची जातियों में पठान के पास प्रति परिवार औसतन कृषि योग्य ज़मीन 0.48 एकड़ है, जबकि शेख के पास 0.46 और सैयद के पास 0.37 एकड़ ज़मीन प्रति परिवार है. दिलचस्प तथ्य यह है कि ग्रामीण इलाकों में हिंदुओं और मुसलमानों की ऊंची जातियों के हाथ से ज़मीन का टुकड़ा निकल रहा है. ज़मीन खरीद-बिक्री के रुझानों पर ग़ौर करें, तो पिछले तीन वर्षों के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों की ऊंची जातियों के 6.5 फीसद परिवारों ने ज़मीन का टुकड़ा बेच दिया, जबकि ज़मीन खरीदने वाले परिवार महज 1.1 फीसद रहे. इसमें भी देखें, तो हिंदुओं की ऊंची जाति के 7.5 फीसद परिवारों को अपनी ज़मीन का एक हिस्सा बेचना पड़ा, जबकि मुसलमानों की ऊंची जाति के 3.4 फीसद परिवारों के हाथ से ज़मीन का टुकड़ा निकल गया. दोबारा ज़मीन खरीदने वाले लोगों में हिंदू 1.2 फीसद और मुसलमान 1.0 फीसद रहे.
बिहार में कमाने के लिए परदेस जाने का इतिहास बहुत पुराना है. इसकी झलक यहां के लोक गीतों में भी मिल जाती है. पहले अपना गांव-शहर छोड़कर बाहर कमाने जाने वालों में समाज के पिछड़े वर्ग के लोग ज़्यादा थे. लेकिन, सवर्ण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले कुछ दशकों में हिंदुओं और मुसलमानों की अगड़ी जातियों में कमाने के लिए बाहर जाने का चलन बढ़ा है. ग्रामीण इलाकों में रा़ेजगार या रोज़गार के बेहतर अवसर के लिए 85.8 फीसद हिंदू और 90.5 फीसद मुसलमान बाहर जाते हैं. शहरों की कहानी में बहुत ज़्यादा ़फर्क़ नहीं है, संख्या कुछ कम ज़रूर है. शहरों में अगड़ी जाति के 68.0 ़फीसद हिंदू और 78.2 फीसद मुसलमान रा़ेजगार या रोज़गार के बेहतर अवसर के लिए बाहर जाते हैं. लेकिन, रा़ेजगार पाने वालों की तुलना में रा़ेजगार के बेहतर अवसर पाने वाले अगड़ी जातियों (हिंदू-मुस्लिम दोनों में) के लोगों की तादाद कम है. इसका सीधा अर्थ यह है कि ज़्यादातर लोग उस श्रेणी में शामिल हैं, जो बाहर जाकर किसी प्रकार जीवन का निर्वाह कर पाते हैं. जाति के लिहाज से देखा जाए, तो ग्रामीण इलाकों से पलायन करने वाले कायस्थों को सबसे ज़्यादा 24.8 फीसद बेहतर मा़ैके मिले. जबकि ब्राह्मण, भूमिहार एवं राजपूत जाति के लोगों को कायस्थों की तुलना में रा़ेजगार के बेहतर मा़ैके कम मिले. मुसलमानों में बेहतर अवसर पाने वालों में सैयद 23.1 फीसद हैं, जो शेख और पठान की तुलना में कहीं ज़्यादा है. प

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