केंद्र की नीतियों से उत्तराखंड बेहाल

जेएनएनयूआरएम के तहत प्रदेश के तीन शहरों में 14 परियोजनाओं के लिए 425 करोड़ 54 लाख रुपये मंजूर किए गए थे, जिनमें से केवल चार परियोजनाओं का काम शत-प्रतिशत पूरा हो सका है. चार परियोजनाओं में 90 फीसद, दो परियोजनाओं में 75 फीसद और चार परियोजनाओं में 30 से 40 फीसद काम हो चुका है. प्रदेश सरकार को इन परियोजनाओं के लिए केंद्र से क़रीब 70 करोड़ की तीसरी एवं चौथी किस्त अभी तक नहीं मिली है.

rawat-modi_650x400_81423484दिल्ली में मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा होने का जश्न मनाने की तैयारी चल रही है, लेकिन पिछले क़रीब 11 महीने से मोदी सरकार ने उत्तराखंड के शहरी विकास की रफ्तार थाम दी है. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की शहरी विकास संबंधी महत्वाकांक्षी योजनाएं बंद करने और उनके बदले नई योजनाएं शुरू करने की घोषणा के बावजूद पुरानी योजनाओं को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है. केंद्र सरकार न तो नई योजनाओं की गाइड लाइन के बारे में बताने को तैयार है और न पुरानी योजनाओं के लिए धन जारी कर रही है, जिससे सूबे में शहरी विकास की योजनाओं की रफ्तार थम-सी गई है. जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्यूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) और राजीव आवास योजना के बदले नई योजनाएं शुरू करने में हो रही देरी ने शहरी विकास की कई योजनाओं में अडंगा लगा दिया है. मोदी सरकार ने इन योजनाओं को लेकर जारी अनिश्चितता को लेकर कोई भरोसा नहीं दिया है और न इनके लिए कोई धनराशि जारी की. पिछले 11 महीने से शहरी विकास विभाग केंद्र से धनराशि मिलने का इंतज़ार कर रहा है. केंद्र के इस अनिर्णय वाले रवैये से राजधानी देहरादून की ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना एवं सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, हरिद्वार की प्रस्तावित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना और विभिन्न शहरों में ग़रीबों के लिए आवास एवं बुनियादी सुविधाओं की योजनाएं प्रभावित हो रही हैं. शहरी विकास सचिव डीएस गर्ब्याल का कहना है कि पैसा न मिल पाना तो दिक्कत है ही, सबसे बड़ी परेशानी यह है कि केंद्र सरकार ने जेएनएनयूआरएम एवं आरएवाई को लेकर अब तक कोई दिशा निर्देश नहीं दिए हैं, जबकि इन योजनाओं को वह दूसरी योजनाओं से स्थानापन्न करना चाहती है.
जेएनएनयूआरएम के तहत प्रदेश के तीन शहरों में 14 परियोजनाओं के लिए 425 करोड़ 54 लाख रुपये मंजूर किए गए थे, जिनमें से केवल चार परियोजनाओं का काम शत-प्रतिशत पूरा हो सका है. चार परियोजनाओं में 90 फीसद, दो परियोजनाओं में 75 फीसद और चार परियोजनाओं में 30 से 40 फीसद काम हो चुका है. प्रदेश सरकार को इन परियोजनाओं के लिए केंद्र से क़रीब 70 करोड़ की तीसरी एवं चौथी किस्त अभी तक नहीं मिली है. यही नहीं, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल-एनजीटी) में इंदिरा नगर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का मसला उठने के बाद से उसका काम रोक दिया गया है. राजीव आवास योजना भी नई परिस्थितियों में दिशा निर्देश की अस्पष्टता के चलते ठप्प पड़ी है. गर्ब्याल का कहना है कि प्रदेश सरकार ने देहरादून, हरिद्वार, पौड़ी एवं अल्मोड़ा को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने की पहल की है, लेकिन बिना गाइड लाइन की इस केंद्रीय योजना को लेकर अब तक कुछ भी ठोस नहीं हो सका है. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने केंद्र पोषित योजनाओं के फंडिंग पैटर्न में बदलाव से प्रदेश को हो रहे नुक़सान की रिपोर्ट नियोजन विभाग से तलब की है. नियोजन विभाग की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि केंद्र पोषित योजनाओं के लिए केंद्रीय सहायता में किया जा रहा बदलाव चिंता का विषय है. इसके लिए सभी प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को केंद्र के समक्ष अपना पक्ष रखना चाहिए. उन्होंने कहा कि पांच वर्षों के लिए स्वीकृत योजनाओं की सहायता राशि में अचानक बदलाव करना राज्यों के प्रति नाइंसाफी है, इसके लिए सभी राज्यों को एक होकर अपनी बात रखनी चाहिए. उन्होंने प्रमुख सचिव नियोजन को इस संबंध में पूरा विवरण तथ्यों सहित प्रस्तुत करने को कहा. बीजापुर अतिथि गृह में मुख्य सचिव सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शिक्षा, नियोजन एवं कृषि से संबंधित योजनाओं पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि उत्तर-पूर्व के राज्य हों या मध्य हिमालयी राज्य, सभी की अपनी-अपनी ज़रूरतें हैं. उन्होंने इस असमानता के लिए प्रधानमंत्री एवं वित्त मंत्री को भी फिर से पत्र भेजने की बात कही. उन्होंने कहा कि फंडिंग पैटर्न बदलने से अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की छात्रवृत्ति, पेयजल सहित अन्य सामाजिक योजनाओं पर काफी प्रभाव पड़ेगा. ग़ौरतलब है कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिशें मानते हुए केंद्र ने आठ केंद्रीय योजनाओं की फंडिंग में केंद्रीय मदद बंद कर दी है और 24 योजनाओं का फंडिंग अनुपात बदल दिया है. केंद्र से मिलने वाली ब्लॉक ग्रांट (एकमुश्त अनुदान) यानी एनसीए, एसपीए एवं एससीए खत्म करने की वजह से राज्य को हर साल 2,589 करोड़ रुपये का ऩुकसान हो रहा है. 14वें वित्त आयोग से मिली अतिरिक्त धनराशि जोड़ने के बावजूद उत्तराखंड को हर साल 800 से 1,000 करोड़ रुपये का नुक़सान होने की आशंका है. केंद्र पोषित योजनाएं खत्म किए जाने से प्रदेश को हर साल 450 करोड़ रुपये के ऩुकसान की आशंका है. इसी के साथ कृषि एवं अन्य विभागों की महत्वपूर्ण योजनाओं के फंडिंग पैटर्न में केंद्र के अंशदान को 90 और 100 ़फीसद से घटाकर 50 फीसद कर दिया गया है, जिससे उत्तराखंड को काफी नुक़सान होने की आशंका है. मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि फसलों को हुए ऩुकसान को देखते हुए किसानों को वित्तीय सहायता देने के लिए 30 करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि स्वीकृत की गई है.