जॉर्ज फर्नांडीज जैसी विभूतियां हमारी धरोहर हैं : समाजवाद और सादगी की प्रतिमूर्ति

उल्लेखनीय है कि बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने उन सभी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया, जिन्हें रक्षा मंत्री रहते हुए नेताजी मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था. इसमें चीन के साम्राज्यवादी रवैये का विरोध भी शामिल है. जॉर्ज साहब के बाद यदि चीन के मुक़ाबले कोई पार्टी और नेता आज की तिथि में दिख रहा है, तो वह समाजवादी पार्टी और स्वयं मुलायम सिंह यादव ही हैं.  यह दोनों नेताओं के वैचारिक साम्य को दर्शाता है. जब नेताजी ने 29 अगस्त, 2003 को तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, जॉर्ज साहब शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने आए. यह उनका मुलायम सिंह जी के प्रति स्नेह भाव का द्योतक है.

saadgi-ki-pratimurtiहम सभी के लिए हर्ष का विषय है कि समाजवाद के प्रतिबद्ध सेनानी एवं संघर्ष की प्रतिमूर्ति जॉर्ज फर्नांडीज 85वें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं. राजनीति, पत्रकारिता, समाजवादी विचारधारा और मज़दूर आंदोलन के दृष्टिकोण से जॉर्ज साहब का योगदान बहुआयामी, बहुस्तरीय और बहुमूल्य है. वह उन बड़े नेताओं में अग्रणी हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय राजनीति की प्रखरता एवं जनसंघर्षों की परंपरा को आगे बढ़ाया और स्तुत्य नायक बने. जहां तक मुझे याद है, साठ-सत्तर के दशक में उनका नाम रचनात्मक संघर्ष के पर्याय के रूप में जाना जाता था. वह मज़दूरों की सबसे बुलंद और किसी के भी आगे कभी मंद न पड़ने वाली आवाज़ बन चुके थे. हम लोगों के लिए जॉर्ज साहब प्रारंभ से प्रेरणा के केंद्र रहे हैं. मुझे उन्हें कई बार सुनने, तलैया एवं इटावा में उनकी सभा कराने का सौभाग्य मिला. वह अपने आप में सादगी और ज्ञान की आदमकद प्रतिमा हैं. मुझे आश्चर्य होता है कि लोक जीवन में इतना संघर्ष करने वाला यायावर व्यक्ति इतना विद्वान कैसे हो सकता है. नई पीढ़ी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विशेषकर समाजवादियों को जॉर्ज साहब से लोक जीवन जीने की प्रेरणा लेनी चाहिए. जॉर्ज फर्नांडीज का जन्म तीन जून, 1930 को मंगलूर में जॉन जोसफ फर्नांडीज एवं एलिस मार्था के पुत्र के रूप में हुआ. उनकी मां मार्था जॉर्ज पंचम से प्रभावित थीं, अत: उन्होंने अपने पुत्र का नाम जॉर्ज रख दिया. पिता जोसेफ उन्हें पादरी बनवाना चाहते थे. उन्होंने जॉर्ज को बंगलुरू में धार्मिक शिक्षा भी दिलवाई, किंतु जॉर्ज सेमिनरी छोड़कर 1949 में मुंबई आ गए. यहीं उनकी मुलाकात कालजयी एवं क्रांतिधर्मी चिंतक राम मनोहर लोहिया से हुई. जॉर्ज साहब ने समाजवादी मज़दूर संघ एवं निर्णायक श्रमिक आंदोलन का सिंहनाद किया और देखते ही देखते वह मुंबई के मज़दूर संघों और राजनीति की धुरी बन गए. वह 1961 से 1968 तक बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के निर्वाचित सदस्य रहे. संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 1967 में उन्हें कद्दावर नेता और मुंबई का बेताज बादशाह कहे जाने वाले केंद्रीय मंत्री सदाशिव कानोजी पाटिल के विरुद्ध चुनाव में लोकसभा का टिकट दिया. जॉर्ज साहब पाटिल को हराकर सांसद बने. फिर तो पूरे भारत में जॉर्ज फर्नांडीज का नाम गूंजने लगा.
जॉर्ज फर्नांडीज ने 1974 में आल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में हड़ताल की घोषणा की. भारत के इतिहास में उससे बड़ी हड़ताल कभी नहीं हुई. लगभग 30 हज़ार मज़दूर नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और 17 लाख कर्मचारियों ने उस हड़ताल में हिस्सा लिया था. आपातकाल के दौरान जॉर्ज साहब राम मनोहर लोहिया का अनुसरण करते हुए भूमिगत हो गए और लोकतंत्र के लिए अनवरत लड़ते रहे. उन्होंने वही तौर- तरीके अपनाए, जिन तौर-तरीकों का इस्तेमाल लोहिया जी ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान किया था. बड़ौदा डाइनामाइट प्रकरण में उन्हें पत्रकार किरीट भट्ट और के. विक्रम राव के साथ 10 जून को गिरफ्तार किया गया. हाथों में हथकड़ी पहने और ललकारते हुए उनकी तस्वीर उस दौर की सबसे चर्चित एवं प्रेरक चित्र थी. आपातकाल के पश्चात वह जेल से रिहा हुए और 10 जून, 1976 मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़े. लगभग तीन लाख मतों से जीतकर लोकसभा के सदस्य बने और फिर मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री बने. जॉर्ज साहब ने फेरा के तहत अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों कोको कोला और आईबीएम पर कार्यवाही की. वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में रेल मंत्री भी रहे. उन्होंने 1994 में समता पार्टी बनाई. इसके अलावा वह 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2009 तक देश के रक्षा मंत्री रहे. पोखरण परमाणु परीक्षण और करगिल में जीत जैसी उपलब्धियां उन्हीं के कार्यकाल के दौरान हासिल हुईं. उल्लेखनीय है कि बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने उन सभी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया, जिन्हें रक्षा मंत्री रहते हुए नेताजी मुलायम सिंह यादव ने शुरू किया था. इसमें चीन के साम्राज्यवादी रवैये का विरोध भी शामिल है. जॉर्ज साहब के बाद यदि चीन के मुक़ाबले कोई पार्टी और नेता आज की तिथि में दिख रहा है, तो वह समाजवादी पार्टी और स्वयं मुलायम सिंह यादव ही हैं. यह दोनों नेताओं के वैचारिक साम्य को दर्शाता है.
जब नेताजी ने 29 अगस्त, 2003 को तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, जॉर्ज साहब शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने आए. यह उनका मुलायम सिंह जी के प्रति स्नेह भाव का द्योतक है. वह समाजवादियों को एकत्र करके देश में समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना के लिए सदैव प्रयासरत रहे. उनकी सादगी बेमिसाल रही है. वह जब रक्षा मंत्री थे, तब भी अपने कपड़े स्वयं धोते थे. उनके किरदार में कभी बनावट नहीं आई. सत्ता हो या विपक्ष, वह सदैव एक जैसे रहे. आज वह भले ही पूर्णतया स्वस्थ न हों, लेकिन उनके विचार एवं उनका दर्शन स्वस्थ और प्रासंगिक हैं. जॉर्ज साहब जैसी विभूतियां हमारी धरोहर हैं, हम उनके लंबे एवं नि:रोग जीवन की कामना करते हैं.

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