आचार्य बालकृष्ण आयुर्वेद के महान योद्धा हैं

santosh-bhartiyaपत्रकारिता में अक्सर ऐसा होता है कि हम कुछ सुबूतों के आधार पर एक रिपोर्ट करते हैं, पर जब उसकी सच्चाई में जाते हैं, तो वहां कुछ ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जिनकी तुलना में पहले मिले सुबूत बहुत हल्के लगते हैं. और, हम जिसके बारे में रिपोर्ट करते हैं, देखते हैं कि वह इतना ज़्यादा काम कर रहा है और इतने कमाल का काम कर रहा है, तब लगता है कि अपनी ग़लती सुधारनी चाहिए.

मैं अभी-अभी पतंजलि योग पीठ से आया हूं. पतंजलि योग पीठ बाबा रामदेव का आश्रम है. बल्कि कहें कि यह बाबा रामदेव का केंद्रीय आश्रम है. बाबा रामदेव देश भर में लोकसभा चुनाव से तीन साल पहले शहर-शहर, कस्बे-कस्बे लोगों का संगठन बना रहे थे और उन्हें व्यवस्था परिवर्तन के लिए तैयार कर रहे थे, पर उनका सारा ज़ोर कांग्रेस द्वारा भ्रष्टाचार के सवाल पर अपनाए जाने वाले रुख़ के ख़िलाफ़ था. उन्होंने देश में जो जन-जागरण पैदा किया, वैसा ही जन-जागरण अन्ना हजारे ने भी पैदा किया और इस जन-जागरण ने भारतीय जनता पार्टी को अद्भुत मदद की.

उसी दौरान बाबा रामदेव के आश्रम में क्या हो रहा था, क्या नहीं हो रहा था, इसे लेकर बहुत सारी कथाएं बाहर आईं, पर आज हमारा विषय बाबा रामदेव नहीं, आचार्य बालकृष्ण हैं.

आचार्य बालकृष्ण बाबा रामदेव के बहुत क़रीबी अनुयायी हैं. बाबा रामदेव की संघर्ष यात्रा में आचार्य बालकृष्ण प्रारंभ से लक्ष्मण की तरह जुड़े रहे हैं. आचार्य बालकृष्ण का बाबा रामदेव से कोई खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन शायद खून से भी बड़ा रिश्ता है और पूरे देश में यह माना जाता है कि बाबा रामदेव के सारे क्रियाकलापों के पीछे, उनकी सारी कोशिशों के पीछे अगर कोई संगठनात्मक दिमाग है, तो वह आचार्य बालकृष्ण का है. लेकिन, सच्चाई यह भी नहीं है. सच्चाई कुछ और है.

आचार्य बालकृष्ण पतंजलि योग पीठ में जो काम कर रहे हैं, वह अद्भुत है. आयुर्वेद के क्षेत्र में आचार्य बालकृष्ण विश्‍व के अकेले व्यक्ति हैं, जो न केवल आधिकारिक जानकारी रखते हैं, बल्कि आधिकारिक सलाह भी दे सकते हैं. आयुर्वेद की दवाइयां पौधों से बनती हैं. आचार्य बालकृष्ण ने हज़ारों तरह की औषधियों की वनस्पतियां तलाशी हैं और उन्हें अपने आश्रम में उगाया भी है.

इन दिनों वनस्पतियों के ऊपर आचार्य बालकृष्ण काम कर रहे हैं और संस्कृत में स़िर्फ 1,000 वनस्पतियों के आधिकारिक नाम हैं. लगभग पांच से छह हज़ार वनस्पतियों के ऐसे नाम हैं, जो आधिकारिक नहीं हैं. आचार्य बालकृष्ण लगभग सवा लाख प्रजातियों को तलाशने और उनका नाम रखने का काम कर रहे हैं. टेलीविजन पर आने वाले आयुर्वेद को लेकर उनके कार्यक्रम विश्‍व में बहुत ही रुचि से देखे-सुने जाते हैं. आचार्य बालकृष्ण एलोपैथी के म़ुकाबले आयुर्वेद को स्थापित करने वाले महान योद्धा कहे जा सकते हैं.

आचार्य बालकृष्ण पुरानी पांडुलिपियां तलाश-तलाश कर, जिनके जीवनावशेष जहां भी मिलते हैं, वहां से वह मंगाते हैं और पुरानी पांडुलिपियों को नए कलेवर में सहेजने का काम कर रहे हैं. उन पांडुलिपियों को पढ़ने वाले लोग अब हिंदुस्तान में नहीं हैं, विश्‍व में होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता. कौन उन पांडुलिपियों को पढ़ सकता है, ऐसे लोगों को तलाशने का काम आचार्य बालकृष्ण ने किया है. उनकी टीम में ऐसे-ऐसे विद्वान हैं, जिनकी उम्र तो ज़्यादा है, लेकिन वे अद्भुत विद्वान हैं.

जब आचार्य बालकृष्ण को लगा कि अधिक उम्र के विद्वानों के बाद, जो कि मुश्किल से खोज के बाद उन्हें मिले, आगे यह काम कैसे होगा? तो उन्होंने अपने छात्रों को छांटकर उन्हें इसकी शिक्षा दी और अब वे छात्र आचार्य बालकृष्ण के लिए पांडुलिपियां पढ़ने, सहेजने और उन्हें सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाने की तैयारी कर रहे हैं. आचार्य बालकृष्ण ने इसके ऊपर काफी पुस्तकें छपवा ली हैं.

आचार्य बालकृष्ण ने बाबा रामदेव के साथ मिलकर सबसे बड़ा काम यह किया कि पूरे विश्‍व में योगा को योग बना दिया. पहले योगा के नाम से पूरी दुनिया में हिंदुस्तान से विद्वान जाते थे और इसे उन्होंने अभिजात्य वर्ग की चीज बना रखा था. लेकिन, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृण की जोड़ी ने इसे सामान्य जन की वस्तु बना दिया. आचार्य बालकृष्ण ने योग के ऊपर भी खोज जारी रखी और उसे शोध (रिसर्च) का विषय बना दिया. आज पतंजलि योग पीठ में आयुर्वेद का एक बहुत बड़ा

अस्पताल है, जो सारी दुनिया में बाबा रामदेव के अस्पताल के नाम से जाना जाता है. आचार्य बालकृष्ण असाध्य रोगों को ठीक करने के काम में आयुर्वेद और योग के सम्मिश्रण से बनी उपचार विधि का इस्तेमाल कर रहे हैं और इसके द्वारा लोगों को निरोग कर रहे हैं. ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो हताश-निराश हो चुके हैं, वे उस अस्पताल में जाते हैं. बहुुत सारे ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जब तक आचार्य बालकृष्ण उन्हें देख नहीं लेते, उनकी बीमारी नहीं समझ लेते, तब तक उनका रोग ठीक होने वाला नहीं है.

ऐसी कई घटनाओं का मैं भी गवाह हूं. ऐसे कई सारे लोग पत्रकार होने के नाते मेरे संपर्क में आते हैं. और, जब मैं उन्हें आचार्य बालकृष्ण के पास भेजता हूं, तो वे लौटकर बताते हैं कि अब उनका रोग ठीक हो जाएगा.

इसके अलावा आचार्य बालकृष्ण उन सारी चीजों को देखते हैं, जो बाबा रामदेव के आश्रम से देश के बाज़ारों में जा रही है. वे शुद्ध हैं, त्रुटिहीन हैं, फ़ायदा कर सकती हैं या नहीं, यह सारी ज़िम्मेदारी आचार्य बालकृष्ण के कंधों पर है. मैं जब उनसे मिला, तो मुझे पता चला कि वह एक-एक चीज को हाथ में लेते हैं और उसका सही विश्‍लेषण लोगों के सामने रखते हैं. इन दिनों वह मसालों के ऊपर काम कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात से चिंता हुई कि बाज़ार में बिकने वाले मसालों की पैकिंग पर लिखी गई अधिकांश सामग्रियां (इनग्रेडियंट) उनमें शामिल ही नहीं होंती. देखने में तो लगता है कि यह मसाला उन्हीं सामग्रियों से बना है, लेकिन जब उसका विश्‍लेषण करते हैं, तो उसमें साठ प्रतिशत चीजें ग़लत होती हैं. वह मिश्रण होता ही नहीं है, जो मसालों की पैकिंग पर इनग्रेडियंट के रूप में लिखा रहता है. बाबा रामदेव के उत्पादों पर लोगों का विश्‍वास इतना बढ़ गया है कि जो भी शख्स उनके उत्पाद लेना शुरू करता है, उसका मुरीद हो जाता है. यहीं पर आचार्य बालकृष्ण का रोल सामने आता है, जो इस बढ़ती हुई साख के पीछे का नाम है.

आचार्य बालकृष्ण बहुत बड़े पैमाने पर देश में जैविक (ऑर्गेनिक) खेती को बढ़ावा देने का काम भी कर रहे हैं. उनके अधिकांश उत्पाद (प्रोडक्ट)  जैविक यानी ऑर्गेनिक हैं. जो सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे दिखाई दी, वह यह कि आचार्य बालकृष्ण प्रचार से कोसों दूर रहना चाहते हैं. उनका कहना है, बाबा रामदेव देश के लिए काम कर रहे हैं और मैं देश की सेहत के लिए काम कर रहा हूं. इसलिए नाम उसका होना चाहिए, जो देश के लिए काम कर रहा हो. मैं तो उनका अनुयायी हूं.

भारत सरकार ने आयुष मंत्रालय खोला है. यह आयुष मंत्रालय सरकारी अधिकारियों के लिए एक नई चीज है. उन्हें नहीं पता कि आयुष मंत्रालय कैसे चलाना है, क्या शोध (रिसर्च)  करना है, किस चीज को प्राथमिकता देनी है और किसे नहीं देनी. बल्कि वास्तविकता में देखें, तो उन्हें बहुत-सी चीजों के नाम भी नहीं मालूम. वे सब इन दिनों आचार्य बालकृष्ण के संपर्क में हैं और उनसे बुनियादी जानकारी ले रहे हैं.

पतंजलि योग पीठ में देश भर के किसानों की भी ट्रेनिंग होती है. पतंजलि योग पीठ में जैविक खेती कैसे करें, इसके बारे में भी जानकारी दी जाती है. देश भर से लोगों को आमंत्रित किया जाता है कि वे आएं और देखें कि आयुर्वेद एवं योग पर आधारित जीवनशैली स्वस्थ जीवन और स्वस्थ विचार के लिए कितनी आवश्यक है.

आचार्य बालकृष्ण पर म़ुकदमे भी चल रहे हैं. वह सीबीआई जांच के दायरे में भी हैं. एक समय में बहुत सारे अख़बारों ने उनके ख़िलाफ़ रिपोर्टें भी छापीं, पर वे मुद्दे ऐसे हैं, जिनमें किसी ने आचार्य बालकृष्ण का पक्ष जानने की कोशिश ही नहीं की, उनसे कोई मिला ही नहीं कि सच्चाई क्या है. यह हमारी पत्रकारिता का एक नया दुर्गुण है. अगर हम सौ प्रतिशत किसी रिपोर्ट को लेकर संतुष्ट हैं, तो हम बिना किसी का पक्ष जाने भी रिपोर्ट कर सकते हैं.

लेकिन, जब यह पता चले कि हमने जिसे सौ प्रतिशत सच माना था, वह स़िर्फ बीस प्रतिशत सच है और 80 प्रतिशत झूठ, तो भी हम उस व्यक्ति का पक्ष न छापें, यह पत्रकारिता का धर्म नहीं है. आचार्य बालकृष्ण इस राय के हैं कि देश में, विशेषकर पत्रकारिता के क्षेत्र में नकारात्मक रिपोर्टों की भरमार है. कहीं पर भी सकारात्मक चीजें देखने में नहीं आतीं. वह खुद से मिलने आने वाले लिखने-पढ़ने वाले लोगों से आग्रह करते हैं कि सकारात्मक चीजों और सकारात्मक रिपोर्टों के लिए भी अख़बार या टेलीविजन चैनल में जगह होनी चाहिए.

आचार्य बालकृष्ण देश में घूमना पसंद नहीं करते. जहां बहुत ज़रूरी होता है, वह जाते हैं. वह पतंजलि योग पीठ में ही रहना चाहते हैं और वे सारे काम करना चाहते हैं, जिनसे पुरानी पांडुलिपियां, वनस्पतियां, योग और आयुर्वेद हमारे देश में सामान्य जन की पहुंच में आ जाएं तथा उनके जीवन को सुधारें.

मेरा मानना है कि बाबा रामदेव की ताकत के पीछे आचार्य बालकृष्ण का योगदान देश के सामने कम आया है. आचार्य बालकृष्ण बहुत से लोगों की ईर्ष्या के भी पात्र हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई परेशानियों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन, उन्होंने मुझसे हंसकर कहा, हर अच्छे काम में विघ्न आता ही है. यह प्राचीन काल से चला आया है और गोस्वामी तुलसी दास ने तो इसे रामायण में ही लिख दिया है. तुलसी दास जी कहते हैं कि किसी भी काम से पहले, जो खल-दुष्ट होते हैं, उनकी पूजा ज़रूर करनी चाहिए.

और, जो पहले दुष्टों की पूजा नहीं करता, उसके काम में विघ्न या खलल आता ही है. मैं आचार्य बालकृष्ण द्वारा किए जा रहे कामों को देखकर अचंभित हूं और मैं उन सभी से अनुरोध करता हूं कि वे पतंजलि जाएं, जिन्हें योग, आयुर्वेद, प्राचीन पांडुलिपियों एवं वनस्पतियों में रुचि है. विश्‍वकोश बनाने का काम आचार्य बालकृष्ण कर रहे हैं. जिस दिन सवा लाख वनस्पतियों के नामकरण का काम पूरा हो जाएगा, वह शब्दकोश विश्‍व के लिए अद्भुत धरोहर हो जाएगा. हालांकि, आचार्य बालकृष्ण इतना काम कर चुके हैं, जिसके परिणामस्वरूप वह ऐसे व्यक्तियों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं कि उन्हें पतंजलि योग पीठ के साथ-साथ देश की संपत्ति भी माना जा सकता है.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.

संतोष भारतीय

संतोष भारतीय चौथी दुनिया (हिंदी का पहला साप्ताहिक अख़बार) के प्रमुख संपादक हैं. संतोष भारतीय भारत के शीर्ष दस पत्रकारों में गिने जाते हैं. वह एक चिंतनशील संपादक हैं, जो बदलाव में यक़ीन रखते हैं. 1986 में जब उन्होंने चौथी दुनिया की शुरुआत की थी, तब उन्होंने खोजी पत्रकारिता को पूरी तरह से नए मायने दिए थे.