बाबा की आकर्षण शक्ति

sai-babaश्री साई सच्चरित्र में बार-बार   आत्म-साक्षात्कार शब्द का उल्लेख हुआ है. आत्म-साक्षात्कार किसे कहते हैं?

ईश्‍वर जगत-व्यापी है और जगत से परे भी है. यही चेतना शक्ति समस्त प्राणियों में सक्रिय है. इसीलिए हर प्राणी की आत्मा उस परमात्मा का अंश होने के कारण परमेश्‍वर से जुड़ी है. हर व्यक्ति ईश्‍वरता से जुड़ा तो है ही, पर वह अपने अंदर उस ईश्‍वरीय सत्ता को पूर्ण रूप से अनुभव नहीं कर पाता. वह मन के कारण ईश्‍वर के माया रूप का, जो कि जगत के रूप में दिखलाई देता है, अनुभव करता है और उसी में लिप्त रहता है. जब वह अपने को मन से निकाल कर अपनी आत्मा में अवस्थान करेगा, तभी वह अपनी ईश्‍वरता को समझ पाएगा. इसको ही आत्म-साक्षात्कार कहते हैं.

बाबा द्वारा उपदेश क्यों नहीं?

बाबा अपने भक्तों को प्राय: उपदेश क्यों नहीं देते?

बाबा भक्ति की अवस्था के अनुसार उपदेश दिया करते थे. बाबा बहुत ही सरल उपाय से सब कहते और समझाते थे, इतने सरल रूप में कि लोग उन बातों को सहजता से ग्रहण कर सकें. वे भली-भांति जानते थे कि लोग अभी समझने के लिए तैयार नहीं हैं. इसलिए जो जिस स्तर का था, उसको उन्होंने उसी के अनुरूप समझाने का प्रयत्न किया. बाबा जानते थे कि जिसको करना या पाना है, वह उनके कुछ कहे बिना भी गुरु-शरण में रहकर बहुत कुछ स्वत: समझ लेगा. जैसे म्हालसापति, काका साहेब दीक्षित सदा चुपचाप रहकर बाबा जो कुछ भी सांकेतिक रूप से समझना चाहते थे, उस पर अमल करते थे.

बाबा की आकर्षण-शक्ति 

बाबा ने श्री साई सच्चरित्र में कहा है कि वे अपने भक्तों को कहीं से भी धागे में बंधी चिड़िया की तरह खींच लाते हैं. क्या सद्गुरु किसी भी व्यक्ति को खींचकर अपने पास ला सकते हैं? यह कैसे होता है?

श्री साई सच्चरित्र में देखने को मिलता है कि बाबा अपने भक्तों को प्रमाणिक रूप से काका साहेब दीक्षित, नाना चांदोरकर, श्री उपासनी लाए. सद्गुरु जो कि प्रत्येक जीव के पिछले सभी जन्मों का इतिहास जानते हैं, अपनी महत् ईश्‍वरीय इच्छा शक्ति द्वारा सबको आकर्षित कर लेते हैं. आदमी माया या अज्ञान से भ्रमित होकर अपनी सीमित इच्छा शक्ति द्वारा इस महान इच्छा शक्ति को रोकने का प्रयास करता है, अंततोगत्वा उसको खिंचकर सद्गुरु के पास आना ही पड़ता है. चाहे इसमें कुछ समय क्यों न लग जाए. सद्गुरु भी उस समय उसको पास खींचते हैं, जब उपयुक्त समय आता है.

साथी-आखिरकार

बाबा ने कहा था कि मैं अपने भक्तों की मृत्यु के समय उनकी आत्मा को दूर से खींच लाता हूं. क्या यह सत्य है?

सद्गुरु के संस्पर्श, संसर्ग या संपर्क में चाहे किसी भी रूप से आने वाली प्रत्येक आत्मा को वे अपनी आकर्षण शक्ति से खींच सकते हैं. सद्गुरु लोगों को, जीवों को पिछले जीवन के ॠण-बंधन या उनके आध्यात्मिक स्तर के अनुसार अपने पास खींचते हैं. उस समय वह जीव समझता है कि वह अपनी भक्ति से गुरु के पास आ रहा है. पर वास्तव में सद्गुरु के उसके भीतर अपने प्रेम-भाव को जगाते हैं, जिसको भक्त अपनी भक्ति समझता है. वह कहीं भी हो सद्गुरु उसके बारे में समस्त खबर एक सूक्ष्म प्रक्रिया से जान लेते हैं.

मृत्यु के समय जब वह जीव मृत्यु-मूर्च्छा की स्थिति में आ जाता है, अर्थात अचेतन अवस्था आ जाता है, तो उसका स्थूल शरीर से संबंधित समस्त परिवार जनों से या जान-पहचान के लोगों से संपर्क कट जाता है. उसकी आत्मा मृत्यु के संधि-क्षण में एक महा-अंधकार की स्थिति में व्याकुल होकर इधर-उधर भटकती है. उस समय सद्गुरु अपने ज्योतिर्मय रूप में उसकी आत्मा के समक्ष आकर उसको शरीर के दशम द्वार से यानि ब्रह्म-द्वारा से अकर्षित करके अपने पास ले आते हैं.

चूंकि उस समय और कोई साथी मृत्यु की उस आखिरी अवस्था में नहीं होता और केवल सद्गुरु ही साथ चलते हैं, इसीलिए उन्हें साथी-आखिरकार कहते हैं.