बिहार विधानसभा चुनाव सर्वे का बाज़ार गर्म है

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनावी सर्वे का बाज़ार गर्म हो गया. कई टीवी चैनलों और अ़खबारों में चुनावी सर्वे पेश किए गए. लोग अपने-अपने तरीके से और अलग-अलग आकलन पेश कर रहे थे. चौथी दुनिया ने सबसे पहले मार्च 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एक सर्वेक्षण कराया था और उसकी विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

जब हमने सर्वे के नतीजे छापे थे, तब कई राजनीतिक दलों और मीडिया के लोगों ने उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे. अपने सर्वे में हमने बताया था कि मुख्यमंत्री के रूप में बिहार की जनता की पहली पसंद नीतीश कुमार हैं. हमारे सर्वे के मुताबिक वह मुख्यमंत्री पद की दौड़ में बाकी सभी दावेदारों से आगे थे. हाल- फिलहाल में जितने भी सर्वे आए, वे चौथी दुनिया के सर्वे के नतीजों की पुष्टि करते हैं.

मई 2015 में एबीपी न्यूज-नेल्सन द्वारा कराए गए चुनाव पूर्व सर्वे में कांग्रेस, राजद और जद-यू गठबंधन को राज्य की 243 सीटों में से 127 सीटों पर जीतते हुए दिखाया गया था. इस सर्वे में नीतीश के कार्यकाल को 20 प्रतिशत लोगों ने बहुत अच्छा कहा, 48 प्रतिशत लोगों ने अच्छा करार दिया, वहीं मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश 52 प्रतिशत लोगों की पहली पसंद थे.

सुशील कुमार मोदी 17 और लालू यादव 11 प्रतिशत लोगों की पहली पसंद थे. क्या जीतन राम मांझी को हटाना ठीक था, इस सवाल पर 59 प्रतिशत लोगों का जवाब था, हां. जुलाई 2015 में कराए गए एबीपी न्यूज-नेल्सन और हिंदुस्तान टाइम्स के सर्वे में भी जद-यू गठबंधन को 129, एनडीए को 112 और अन्य को दो सीटों पर जीतते हुए दिखाया गया है. इस सर्वे के मुताबिक, नीतीश कुमार बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अधिक लोकप्रिय हैं.

बिहार के 52 प्रतिशत लोगों की पसंद नीतीश हैं, जबकि 45 प्रतिशत लोग मोदी को पसंद करते हैं. इंडिया टीवी, सी-वोटर्स, हफिंगटन पोस्ट, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, राजस्थान पत्रिका के चुनाव पूर्व सर्वे में भी जद-यू गठबंधन को आगे दिखाया गया है. इस सर्वे के मुताबिक, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महा-गठबंधन को 116 से 132 सीटों पर जीतते दिखाया गया है, जबकि एनडीए को 94 से 110 सीटें मिलने की आशा व्यक्त की गई है और अन्य को 13 से 21 सीटें दी गई हैं.

महा-गठबंधन को 43 और एनडीए को 40 प्रतिशत वोट मिलने की उम्मीद जताई गई है. इस सभी सर्वेक्षणों में एक समानता यह है कि नीतीश कुमार मतदाताओं की पहली पसंद हैं. साथ जो वोट प्रतिशत दिखाया गया है, वह भी एक-दूसरे से मिलता-जुलता है.

इन सर्वेक्षणों में नीतीश के नेतृत्व वाले महा-गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाया गया है. अब एक नज़र चौथी दुनिया के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पर डालते हैं और देखने की कोशिश करते हैं कि चौथी दुनिया आज से छह महीने पहले अपने सर्वे की बुनियाद पर जिन नतीजों पर पहुंचा था, वे इन ताज़ा सर्वेक्षणों से कितना मेल खाते हैं.

जब चौथी दुनिया ने यह सर्वे किया था, तब बिहार का राजनीतिक माहौल कुछ और था. जीतन राम मांझी को उनके बागी तेवरों की वजह से जद-यू ने मुख्यमंत्री पद से हटाया था. उस समय यह आशंका ज़ाहिर की जा रही थी कि अपने इस क़दम से नीतीश कुमार को बहुत ऩुकसान होगा. लेकिन, हमारे सर्वे के जो नतीजे थे, वे इस आशंका के ठीक उलट थे.

चौथी दुनिया के इस सवाल के जवाब में कि क्या नीतीश कुमार ने मांझी को सत्ता सौंप कर ग़लती की थी, 71 प्रतिशत लोगों का जवाब था, हां. उसी तरह इस सवाल के जवाब में कि क्या मांझी नीतीश को चुनाव में ऩुकसान पहुंचा सकते हैं, 73 प्रतिशत लोगों का जवाब था, बिल्कुल नहीं. आज जितने भी सर्वे सामने आ रहे हैं, उन सबका आकलन भी यही है कि जीतन राम मांझी से नीतीश कुमार को कुछ खास ऩुकसान नहीं होने वाला. चौथी दुनिया ने अपने सर्वे में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल पूछे थे. हमने लोगों से पूछा था कि क्या नीतीश कुमार ने मांझी को हटाकर सही क़दम उठाया?

क्या भाजपा नीतीश कुमार से बेहतर सरकार दे सकती है? हालिया कुछ दिनों में प्रकाशित सभी चुनावी सर्वेक्षण चौथी दुनिया के नतीजों को सही साबित कर रहे हैं. जहां तक चुनाव में सीटों के आकलन का सवाल है, तो सभी सर्वेक्षण महा-गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता दिखा रहे हैं. चौथी दुनिया ने पूछा था कि क्या लालू और नीतीश एक साथ मिलकर भाजपा का विजय रथ रोक पाएंगे? इस सवाल के जवाब में 47 प्रतिशत लोगों का कहना था कि जिस तरह विधानसभा की 10 सीटों के उपचुनाव में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी थी, वैसा ही हश्र उसका आगामी विधानसभा चुनाव में होगा.

29 प्रतिशत लोगों ने भाजपा का विजय रथ न रुकने की बात कही थी. अब अगर इन हालिया सर्वेक्षणों पर नज़र डाली जाए, तो दोनों गठबंधनों को जो वोट प्रतिशत दिए गए हैं, वे हमारे नतीजों से मिलते-जुलते हैं.

पिछले कुछ दिनों में सिसरो, सी-वोटर्स, एसी नेल्सन, एबीपी न्यूज, इंडिया टीवी, आजतक, हिंदुस्तान टाइम्स, हफिंगटन पोस्ट, डेक्कन क्रोनिकल, राजस्थान पत्रिका, इंडिया टुडे समेत कई दूसरे टीवी चैनलों और अ़खबारों ने बिहार पर चुनावी सर्वे प्रकाशित किए हैं. आजतक को छोड़कर सभी सर्वे रिपोर्ट्स का अनुमान है कि बिहार चुनाव में लालू यादव, नीतीश कुमार और कांग्रेस के महा-गठबंधन को बहुमत मिल जाएगा.

भाजपा गठबंधन को सौ के क़रीब सीटें मिलते हुए दिखाया गया है. सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि इन सभी सर्वेक्षणों में महा-गठबंधन को भाजपा गठबंधन से ज़्यादा वोट मिलते दिखाया गया है और दूसरी बात यह कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे हैं. इनमें महा-गठबंधन को 42 से 43 प्रतिशत और भाजपा गठबंधन को 32 से 40 प्रतिशत वोट मिलते दिखाया गया है. इनमें महा-गठबंधन को 116-132 और भाजपा गठबंधन को 95-116 सीटें मिलते दिखाया गया है. बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और बहुमत के लिए 122 सीटें ज़रूरी हैं.

हाल में हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक, 40-52 प्रतिशत लोगों की पहली पसंद नीतीश कुमार हैं, जबकि दूसरे स्थान पर रहे सुशील मोदी को स़िर्फ 20 प्रतिशत लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. कहने का मतलब यह कि पिछले कुछ दिनों में जितने भी सर्वे हुए हैं, उनमें यह एकमत है कि महा-गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल सकता में हहै और नीतीश कुमार सबसे लोकप्रिय नेता हैं.

लेकिन, स़िर्फ इंडिया टुडे-सिसरो का सर्वे ऐसा है, जो भाजपा गठबंधन को बहुमत हासिल करते हुए दिखा रहा है. हैरानी की बात यह है कि इस सर्वे में भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे हैं. सवाल यह है कि दो दिनों के अंदर ऐसा क्या राजनीतिक उठापटक हो गई कि इंडिया टुडे के सर्वे के नतीजे बाकी सभी सर्वेक्षणों से अलग इशारा कर रहे हैं.

इंडिया टुडे-सिसरो के सर्वे में महा-गठबंधन को 40 प्रतिशत और भाजपा गठबंधन को 42 प्रतिशत वोट मिलते दिखाया गया है. इस सर्वे में भाजपा गठबंधन को 126 सीटें और महा-गठबंधन को 106 सीटें दी गई हैं. मुख्यमंत्री पद की दौड़ में इस सर्वे में नीतीश कुमार को आगे तो दिखाया गया, लेकिन उन्हें स़िर्फ 29 प्रतिशत लोगों की पसंद बताया गया. इस सर्वे में यह भी बताया गया कि लोग विकास और सुशासन के नाम पर वोट देंगे. मजेदार बात यह है कि इसी सर्वे में यह भी बताया गया है कि 58 प्रतिशत लोग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासन से संतुष्ट हैं.

अब यह बात समझ के बाहर है कि जब 58 प्रतिशत लोग नीतीश कुमार से संतुष्ट हैं और वे जाति से ऊपर उठकर वोट कर रहे हैं, तो नीतीश कुमार की लोकप्रियता घट कैसे गई? इस सवाल का जवाब इंडिया टुडे-सिसरो के सर्वे से नहीं मिलता है. दूसरी चौंकाने वाली बात यह है कि इस सर्वे में ग्रामीण क्षेत्रों में दोनों गठबंधनों को 41 प्रतिशत वोट मिलते दिखाया गया है, जबकि शहरी क्षेत्र में भाजपा को 48 प्रतिशत और जद-यू गठबंधन को महज 33 प्रतिशत वोट मिलने की उम्मीद जताई गई है. बिहार में महज 11 प्रतिशत शहरी आबादी है. इस हिसाब से भारतीय जनता पार्टी को कुल 1.65 प्रतिशत वोटों का फायदा होगा.

जबकि सर्वे के मुताबिक, भाजपा गठबंधन को दो प्रतिशत वोट ज़्यादा मिलेंगे. इस सर्वे में यह एक बड़ी त्रुटि है. इससे एक और सवाल उठता है कि क्या 1.65 प्रतिशत वोटों के अंतर की वजह से यह ़फैसला होगा कि किसे बहुमत मिले और किसे न मिले? हर सर्वे के नतीजे में क़रीब तीन प्रतिशत का मार्जिन ऑफ एरर होता है. इसलिए इंडिया टुडे-सिसरो ने जो नतीजा निकाला है, वह भ्रामक है. इस सर्वे का सही नतीजा यह हो सकता है कि दोनों गठबंधनों के बीच कांटे की टक्कर है.

इस सर्वे में एक और रोचक बात है. इसमें राहुल गांधी की तुलना पप्पू यादव, लालू यादव के बेटों तेजस्वी एवं तेज प्रताप, बेटी मीसा भारती और राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान से कर दी गई. मजे की बात यह है कि इस सर्वे के मुताबिक, राहुल गांधी की लोकप्रियता चिराग पासवान, पप्पू यादव और तेजस्वी यादव से भी कम है. हास्यास्पद बात यह है कि इसे बिहार के युवा नेताओं की जनता में लोकप्रियता के रूप में दिखाया गया है.

अब यह तो इंडिया टुडे वाले ही बता सकते हैं कि पप्पू यादव, राहुल गांधी और शाहनवाज हुसैन किस हिसाब से युवा हैं? आ़खिर में, इस सर्वे में उठाए गए एक सवाल के औचित्य के बारे में पूछना ज़रूरी है. वह इसलिए, क्योंकि शायद पहली बार किसी चुनावी सर्वे में ऐसा सवाल पूछा गया हो. यह सवाल था कि नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार में कौन ज़्यादा अहंकारी है?

चुनाव प्रजातंत्र की एक गंभीर प्रक्रिया है, यह मज़ाक और छींटाकशी करने का अवसर नहीं होता. इससे करोड़ों लोगों का भविष्य जुड़ा होता है. सर्वे चुनावी प्रक्रिया समझने में लोगों की मदद करता है. लेकिन, दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि कुछ सर्वे भ्रम फैलाकर लोगों को गुमराह करने में लगे हैं.

बिहार की जनता देश की सबसे अभागी जनता है, जहां विकास की किरण तक नहीं पहुंची है. बिहार विधानसभा चुनाव का फैसला जनता के मतदान से होगा, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि इस चुनाव में ग़रीबों, ग्रामीणों, बेरोज़गारों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों एवं युवाओं की भागीदारी कितनी और कैसी होती है.

पांच चरण, 243 सीटें और छह करोड़ 68 लाख मतदाता

नाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव का ऐलान कर दिया है. 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के लिए पांच चरणों में मतदान होंगे. पहले चरण का मतदान 12 अक्टूबर को होगा और अंतिम चरण का मतदान पांच नवंबर को. चुनाव परिणाम आठ नवंबर को घोषित होंगे. यानी दीवाली से ठीक तीन दिनों पहले बिहार में कहीं जीत के दीप जलेंगे, तो कहीं हार का ग़म होगा. 38 में से 29 ज़िलों के नक्सल प्रभावित होने की वजह से चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं.

आयोग ने इसके लिए सरकार से केंद्रीय पुलिस बल की 50 कंपनियां मांगी हैं. बिहार की कुल 243 विधानसभा सीटों का ़फैसला छह करोड़ 68 लाख मतदाता करेंगे. इस बार ईवीएम में चुनाव-चिन्ह और उम्मीदवार के नाम के साथ-साथ उसकी फोटो भी होगी, ताकि मतदाता अपने उम्मीदवार को पहचान सकें. हर विधानसभा क्षेत्र में दो मॉडल मतदान केंद्र होंगे.

कुल 243 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए 38 और अनुसूचित जनजाति के लिए दो सीटें सुरक्षित हैं. इस बार मतदान केंद्रों पर पेयजल, शौचालय, शारीरिक रूप से विकलांग मतदाताओं के लिए रैंप और एक मानक वोटिंग कंपार्टमेंट जैसी मूलभूत न्यूनतम सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी. चुनाव आयोग द्वारा पांच चरणों में मतदान कराए जाने के निर्णय को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि बिहार में सीटें ज़्यादा हैं, तो यह स्वाभाविक है कि चुनाव में अधिक समय लगेगा. हम चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं. चुनाव की तारीखों और सुरक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय जनता दल ने भी संतुष्टि ज़ाहिर की है. वहीं जद-यू अध्यक्ष शरद यादव इससे नाखुश हैं. उन्होंने कहा कि यह आयोग की ग़लती नहीं है, लेकिन पांच चरण बहुत ज़्यादा होते हैं.

भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि यह बिहार विधानसभा चुनाव का नहीं, बल्कि नीतीश सरकार के आ़िखरी दिनों का ऐलान है. बिहार में चुनाव त्योहारों के दौरान हो रहा है, जिनमें नवरात्रि, दशहरा, दीपावली एवं मोहर्रम जैसे त्योहार शामिल हैं. लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व की सफलता के लिए सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना बेहद आवश्यक है.

चुनाव आयोग का कहना है कि उसने मौसम, शिक्षा सत्र, त्योहारों, राज्य में क़ानून व्यवस्था की वर्तमान स्थिति, केंद्रीय पुलिस बल की उपलब्धता एवं समय पर उसकी तैनाती और अन्य ज़मीनी हक़ीक़त का जायजा लेने के बाद विधानसभा चुनाव का कार्यक्रम तैयार किया है.

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