उधार के अरबपति, कर्जदार करोड़पति

rbiभारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर की सरकारी बैंकों के प्रमुखों के साथ हाल में हुई एक बैठक में एनपीए (नॉन परफार्मिंग एसेट्स) के खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने का मुद्दा फिर उठाया गया. इस समय इसका स्तर बहुत ज़्यादा बढ़ चुका है. गत दो वर्षों में बैंकों की एनपीए में 45 प्रतिशत तक की वृद्धि हो चुकी है. वर्तमान में लगभग 2,16,000 करोड़ रुपये की धनराशि सरकारी क्षेत्र के बैंक एनपीए के रूप में घोषित कर चुके हैं और यह धनराशि दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. एनपीए बैंकों की कर्ज देने की प्रक्रिया का एक स्वाभाविक परिणाम है, लेकिन चिंता का विषय इसकी मात्रा का बेहिसाब बढ़ते जाना है. बैंकों की कर्ज देने की प्रवृत्ति और पिछले दस वर्षों के एनपीए को देखें, तो पता चलता है कि वर्ष 2008 के बाद एनपीए में तेज गति से बढ़ोत्तरी हुई. साथ ही इतिहास में पहली बार कई भारतीय औद्योगिक घराने अपना कर्ज नहीं चुका पाए.

रिजर्व बैंक के हाल के पत्र के अनुसार, स़िर्फ 10 बड़ी कंपनियां ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की 28,000 करोड़ रुपये की डिफाल्टर हैं. स्वाभाविक तौर पर अगर कई औद्योगिक घरानों ने जनता के पैसों यानी बैंकों पर भरोसा करके जमा की गई धनराशि को कर्ज लेकर नहीं चुकाया है, तो उनकी जांच होनी चाहिए. लेकिन उन्होंने कर्ज क्यों नहीं चुकाया, यह समझने के लिए पहले देखना होगा कि वे करोड़पति कैसे बने? यह एक तथ्य है कि नब्बे के दशक में जब भारत में उदारीकरण की शुरुआत हुई, तो भारतीय कंपनियों में रातोंरात बड़ा बनने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई. ये रातोंरात खड़े होने वाले औद्योगिक घराने बाज़ार की पूंजी या संस्थागत अथवा रणनीतिक निवेशकों के पैसों के बजाय बैंकों से उधार लिए गए पैसों से खड़े हो गए. चाहे जो भी निहितार्थ हों, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि उधार की पूंजी के इस बीजारोपण की प्रक्रिया से शायद भारत में इतिहास के सबसे ज़्यादा करोड़पति हो गए.

हालांकि, इन उधार के करोड़पतियों के भी अपने ईमानदार कारण थे. शेयर बाज़ार से पूंजी उठाने में बहुत लंबी प्रक्रिया एवं बाधाएं पहले से हैं, अब भी हैं. आम निवेशकों को बचाने की मानसिकता के कारण नियामकों द्वारा बहुत लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है और सरकार में लालफीताशाही बहुत ज़्यादा है. इसलिए उद्योगपतियों ने अपने इन स्रोतों से पैसा लेने के बजाय पूंजी की ज़रूरतें पूरी करने के लिए अपेक्षाकृत सरल तरीके यानी उधार की पूंजी का प्रयोग किया. लेकिन, वर्तमान एनपीए संकट के लिए स़िर्फ संस्थाओं एवं सरकारी सिस्टम को सारा दोष देना सही नहीं होगा, बल्कि भारतीय उद्योगपतियों को भी इसकी ज़िम्मेदारी लेनी होगी.

भारतीय उद्योगपतियों के बारे में एक अप्रिय बात यह है कि वे कभी भी अपने शेयर (इक्विटी) वितरित करना नहीं चाहते. स्वामित्व का विचार एक बीमारी की तरह जीवन भर उनसे जुड़ा रहता है. जब आप छोटे कारोबारी होते हैं, तो यह विचार अच्छा है, लेकिन जब आपका कारोबार विकसित हो जाता है, तो यह एक कमजोरी हो जाती है. भारतीय उद्योगपतियों की दूसरी समस्या यह है कि उन्हें सोना और अचल संपत्तियां जमा करने का शौक है.

सामूहिक संपत्तियों में निवेश करने के पीछे औद्योगिक घरानों का तर्क यह रहता है कि उनका इस्तेमाल भविष्य में ज़्यादा से ज़्यादा कर्ज लेने में किया जा सकता है. ज़मीन, सोना और शेयर की लालसा का त्रिकोण एक ऐसा दलदल बन गया है, जहां भारतीय उद्योगपति ब्याज के पैसों से अपना उद्योग चला रहे हैं. इसी वजह से हम ब्याज/ कर्ज न चुका पाने वाली कंपनियां, टूटे हुए व्यापार चक्र और कंपनियों की क़ीमती संपदा बैंकों द्वारा औने-पौने दामों पर बेचने के विज्ञापन आएदिन समाचार-पत्रों में देखते हैं. यह देखकर याद आता है कि जब उधार की रकम से हनीमून मनाया जाता है, तो एक दिन यही होता है.

उधार की पूंजी के साथ-साथ एक समस्या और है, उधार के विचार, जिन पर ये रातोंरात खड़ी होने वाली भारतीय कंपनियां टिकी होती हैं. उधार के विचारों का मतलब यह कि भारतीय कंपनियां अपनी सामर्थ्य पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएनडी) नहीं करतीं, न कोई नया उत्पाद बाज़ार में लाने का प्रयास करती हैं, बल्कि दूसरों की सफलता देखकर उसी क्षेत्र में व्यापार करने लगती हैं.

समाधान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भारत की महत्वाकांक्षा रखते हैं और पूरी युवा पीढ़ी जिसका सपना देख रही है, वह उधार की पूंजी और उधार के विचारों से हासिल नहीं किया जा सकता. बैंक और रिजर्व बैंक अकेले कोई रास्ता नहीं सुझा सकते. मेरे विचार में उनके द्वारा इस मामले को जिस तरह से देखा गया है, वह निष्पक्ष और अच्छा है, लेकिन हमें अन्य स्टॉक होल्डर्स के साथ समन्वय स्थापित करने की ज़रूरत है, जिनमें भारत सरकार और सबसे बड़े स्टॉक होल्डर शामिल हैं यानी लाखों उद्योगपति. सरकार को उद्योगपतियों को कर प्रोत्साहन देकर बाज़ार से पूंजी से उठाने के लिए प्रेरित करना चाहिए.

बैंक अधिकारियों को नौकरशाही के तौर-तरीकों में फंसने के बजाय कर्ज प्रस्ताव का मूल्यांकन और ज़्यादा व्यवसायिक तरीके से करना चाहिए. जब एक अत्यधिक विविधतापूर्ण क्षेत्र के मूल्यांकन की बात आती है, तो बैंक जानकारी और विशेषज्ञता के मामले में बहुत पीछे रह जाते हैं. कैसे एक ऋण अधिकारी इस योग्य हो सकता है कि वह एक तऱफ इस्पात संयंत्र के प्रस्ताव का मूल्यांकन करे और दूसरी तऱफ गन्ना शोधन संयंत्र का!

भारतीय उद्योगपतियों को मौलिक विचारों, cऔर नवीन उत्पाद की दिशा में निवेश करना चाहिए, अन्यथा अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसी धमाकेदार शुरुआतों से वे स्वयं को एक तऱफ धकेल दिया पाएंगे. औद्योगिक घरानों को अपनी शुरुआती अवस्था में प्रवर्तकों को पोषित करना चाहिए. हर औद्योगिक घराने को अपने सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) कार्यक्रम के तहत पांच छात्रवृत्तियां देनी चाहिए. हमें जुगाड़ की प्रवृत्ति के लिए अपनी पीठ नहीं ठोकनी चाहिए. सरकार को इस तरह काम करना चाहिए कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र शोध एवं विकास बने, न कि जुगाड़. और, सबसे बड़ी बात यह कि उद्योगपतियों को अपनी तीनों प्रेयसियां छोड़नी होंगी, शेयर, सोना और अचल संपत्ति. स़िर्फ व्यापार से संबंध रखना होगा.

(लेखक इंवेस्टमेंट बैंकर एवं जेन एडवाइजर्स के सीईओ हैं.)

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