स्वच्छता का पंच सितारा प्रपंच

akilesh-yadavअंधा बांटे रेवड़ी, चीन्ह-चीन्ह के देय… यह कहावत केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान को लेकर उत्तर प्रदेश में बखूबी चरितार्थ हो रही है. रेवड़ी बांटने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार निभा रही है और चीन्हा कौन गया है, इसे यह स्टोरी बयां कर रही है… 

सरकार की जो भी योजनाएं सामने आती हैं, वह ज़मीनी स्तर पर सही तरीके से लागू हों, उसके पहले ही उन्हें लेकर धंधा शुरू हो जाता है. योजनाओं की धंधेबाजी में उत्तर प्रदेश सबसे अव्वल है. केंद्र सरकार विदेशों से फर्जी तरीके से फंड हासिल करने वाली ग़ैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) पर ध्यान दे रही है और उन पर पाबंदियां भी लगा रही है, लेकिन उन एनजीओ की ओर किसी का ध्यान नहीं है, जो सरकार से ही फंड वसूल रही हैं और सरकार की योजनाएं बेच-बेचकर खा रही हैं.

ज़मीनी स्तर पर काम केवल पंच सितारा होटलों के आलीशान और सुस्वादु सेमिनारों के ज़रिये संपादित हो रहा है. सरकारी योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए दिया जाने वाला भारी-भरकम सरकारी फंड हड़पाय नम: हो रहा है. केंद्र सरकार की स्वास्थ्य को लेकर कोई योजना हो या पर्यावरण संरक्षण की या श्रमिक कल्याण की या फिर महिला एवं बाल कल्याण की, सारी सरकारी योजनाएं ग़ैर सरकारी संस्थाओं की कमाई के गोरखधंधे का ज़रिया बन गई हैं.

इस धंधेबाजी में बड़े-बड़े पूंजी घरानों और कई मीडिया घरानों के अपने एनजीओ शामिल हैं. इन ऊंचे घराने वाले एनजीओ के साथ कई बड़े व्यापारिक संस्थान और बहुराष्ट्रीय कंपनियां तक लिप्त हैं. सरकारी फंड की इस लूट पर अंकुश लगाने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें ऐसा करके बड़े मीडिया घरानों को नाराज़ नहीं करना चाहतीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में शुरू किए गए स्वच्छता अभियान में भी एनजीओ के दीमक उसी तरह लगने लगे हैं, जैसे अन्य योजनाओं को वे चाट रहे हैं. उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य है और यहां स्वच्छता अभियान लागू करने में प्रधानमंत्री की दिलचस्पी भी है, सो ग़ैर सरकारी संस्थाएं उस दिलचस्पी का फायदा उठाने में जुट गई हैं. केंद्र में बदले हुए राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी स्वच्छता अभियान पर ज़ोर दे रहे हैं, लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहे हैं कि स्वच्छता अभियान पंच सितारा होटलों से नहीं, बल्कि गंदी गलियों और कूचों में चलाया जाता है.

पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने ऐसे ही एक पंच सितारा कार्यक्रम में जाकर वहां के स्वच्छ आलीशान माहौल में प्रदेश की गलियों-मोहल्लों की सफाई पर खूब सारी स्वच्छ बातें कीं, अपना भव्य स्वागत कराया और एनजीओ के साथ-साथ लगीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना हित साधने का मार्ग प्रशस्त किया. इसी माहौल में मुख्यमंत्री ने अपने प्रदेश की सफाई का खूब ढिंढोरा पीटा और एनजीओ ने खूब प्रायोजित तालियां पिटवाईं.

अखिलेश जिस प्रदेश के फिलहाल मुखिया हैं, उसके दर्जनों ज़िले आज गंदगी से बजबजा रहे हैं और वह जिस राजधानी में वास करते हैं, उसके भी अधिकांश इलाके घनघोर गंदगी वाली मलिन बस्तियों में तब्दील हो चुके हैं. आलीशान कोठी से निकल कर आलीशान सचिवालय जाने और हेलिकॉप्टर पर सवार होकर फुर्र से उड़ जाने को ही मुख्यमंत्री, उनके चाटुकार मंत्रिमंडलीय सदस्य और नौकरशाह स्वच्छता समझ लेते हैं.

गंदगी को जीवन का हिस्सा बना चुके प्रदेश के लोग जब मुख्यमंत्री का भाषण सुनते हैं कि राज्य सरकार स्वच्छता और पर्यावरण पर विशेष ध्यान दे रही है, ताकि क्लीन यूपी-ग्रीन यूपी का सपना साकार हो सके, तो अब उन्हें हंसी भी नहीं आती. उन्हें सैकड़ों विशाल वृक्षों के कटे शवों में पर्यावरण संरक्षण और गंदगी से सने राजधानी के मोहल्ले देखकर स्वच्छता अभियान की सच्चाई का एहसास हो जाता है.

पिछले दिनों ऐसे ही एक भव्य कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने क्या-क्या कहा, वह देखिए और ज़मीनी असलियत के साथ मुख्यमंत्री के संवाद की असलियत भी परखिए. मुख्यमंत्री बोले, अपनी सा़फ-सफाई के साथ-साथ हमें अपने घरों, गांवों, मजरों, शहरों इत्यादि की सफाई पर भी ध्यान देना होगा. हमारे स्वास्थ्य एवं प्रगति के लिए स्वच्छ पर्यावरण अत्यंत आवश्यक है. खुले में शौच की आदत हमारे स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए ठीक नहीं है. राज्य सरकार स्वच्छता और पर्यावरण पर विशेष ध्यान दे रही है. तमाम उपलब्धियों के बावजूद खुले में शौच जाना आज भी एक गंभीर समस्या है.

इसके चलते पीलिया आदि घातक रोग फैलते हैं. घरों में शौचालय निर्मित कर उनका प्रयोग करने से इन गंभीर रोगों से हम स्वयं को बचा सकते हैं. बीमारियों से बचने के लिए सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके मद्देनज़र ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण की लागत 10 हज़ार रुपये से बढ़ाकर 12 हज़ार रुपये कर दी गई है, ताकि कोई दिक्कत न हो. इस कार्य के लिए वर्तमान वित्तीय वर्ष में 1,533 करोड़ रुपये के बजट की व्यवस्था की गई है. ग्रामीण इलाकों में शौचालयों के साथ-साथ स्नानगृहों के निर्माण के लिए भी 16 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है. स्वच्छता अभियान के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के 100 गांवों का चयन किया गया है, जिनमें वाराणसी जनपद के 50 और कन्नौज एवं इटावा ज़िले के 25-25 गांव शामिल हैं.

मुख्यमंत्री जब शौचालयों के निर्माण के लिए धन आवंटन की राशि का जिक्र कर रहे थे, तब कार्यक्रम के आयोजकों के चेहरे की चमक देखी जा सकती थी. लेकिन, जब मुख्यमंत्री ने स्नानगृहों के निर्माण के लिए महज 16 करोड़ रुपये के आवंटन की बात कही, तो आयोजकों में भुनभुनाहट भी सुनी गई. और, आम लोगों को भी उत्तर प्रदेश सरकार की स्वच्छता के प्रति दिलचस्पी के सत्य का एहसास हुआ.

लोगों को यह भी पता चला कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की स्वच्छता प्राथमिकता में प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और अपना गृह जनपद इटावा ही शामिल है. इस कार्यक्रम में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे, जो अपने पूरे कार्यकाल में शौच-शौच तो खूब कहते रहे, पर शौचालय बनाने के काम में कोई रुचि-तीव्रता नहीं दिखा पाए. कार्यक्रम आयोजित करने वाले एनजीओ और उसके साथ जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को आमंत्रित किया था और उनकी नजाकत का पूरा ध्यान रखा. एक अधिकारी ने कहा भी कि धंधा उत्तर प्रदेश में चलाना है, तो नजाकत का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.

स्वच्छता अभियान से जुड़ा पूरा कार्यक्रम एनजीओ और उससे जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के मार्केटिंग-अभियान के रूप में ही अभिव्यक्त हुआ. उसमें कहीं से भी प्रदेश के गंदे इलाकों की सफाई की कोई मुकम्मल योजना नहीं दिखी. बड़े-बड़े स्वच्छ महानुभावों के दर्शन ज़रूर हुए. सफाई का रसायन बेचने वाली कंपनी रही हो या टॉयलेट बनाने का धंधा करने वाली कंपनी, इस कार्यक्रम में एनजीओ के साथ मिलकर उन्होंने मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों को खूब पटाया और अंगवस्त्र पहना-पहना कर उनसे अंतरंग होने की खूब कोशिश की तथा इसमें वे सफल भी रहीं.

इस अंतरंगता का ही नतीजा था कि मुख्यमंत्री अपने भाषण में कई बार सफाई की दवा बेचने वाली कंपनी के सूत्र-वाक्य की तरह यह दोहराते रहे कि हाथ की सफाई कितनी ज़रूरी है. मुख्यमंत्री जब-जब यह विज्ञापनीय सूत्र-वाक्य दोहराते, वह मुख्यमंत्री कम, उस कंपनी के ब्रांड अंबेसडर अधिक दिखते. उत्तर प्रदेश सरकार ने जो विज्ञप्ति जारी की, उसमें भी एनजीओ और उसके साथ जुड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के काम की ढेर सारी प्रशंसा की गई है.

सरकार ने एनजीओ और उक्त कंपनी की प्रशंसा करते हुए यह भी लिखा है कि अभियान में उनका किस-किस तरह से सहयोग लिया जाएगा. अब देखिए कि स्वच्छता के नाम पर एनजीओ और बहुराष्ट्रीय कंपनी का साझा धंधा कैसे चलेगा (सरकारी भाषा में)… इनके साझा प्रयास से क्षमता निर्माण और जन-पैरोकारी साधनों द्वारा ग्रामीण इलाकों में खुले में शौच मुक्त स्थिति प्राप्त करने तथा स्वच्छता को बढ़ावा देने हेतु परिवर्तन वाहकों को तैयार किया जाएगा. खुले में शौच करने से रोकने और जागरूकता लाने के लिए लोगों में व्यवहार परिवर्तन करने की दिशा में काम किया जाएगा.

स्वाभाविक है कि इन सारे कामों में फंड लगेगा. सफाई के नाम पर सफाई की दवा बेचने वाली कंपनी अपने उत्पाद की थोक आपूर्ति का रास्ता खोलेगी. टॉयलेट निर्माण करने के नाम पर भी धंधा चलेगा. सरकार ने तो लिखित तौर पर कहा कि स्वच्छता सुविधाओं में सुधार के लिए एनजीओ के साथ काम करना है, जिससे उन हिस्सों को चिन्हित किया जा सके, जहां शौचालय का निर्माण होना है और उनका सही रखरखाव सुनिश्चित कराना है.

ऐसा कहते हुए सरकार ने स्वच्छता अभियान में शरीक पंचायती राज संस्था के सदस्यों, आशा एवं आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका और योगदान पर पानी फेर दिया. सरकार ने अपनी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में जब यह कहा कि स्वच्छता अभियान के इस कार्य में समाज के प्रभावशाली व्यक्तियों और मीडिया का भी सहारा लिया जाएगा, तो कार्यक्रम की नज़दीक से समीक्षा करने वालों को प्रभावशाली लोगों और मीडिया का खास परिप्रेक्ष्य भी सा़फ-सा़फ समझ में आ गया.

प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन
शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...
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प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...