बिहार विधानसभा चुनाव 2015 कांग्रेस के लिए सुनहरा मौका है

congress-rahul-gandhiकांग्रेस अध्यक्ष घोषित होने से पहले अपनी नेतृत्व क्षमता को सिद्ध करने के लिए बिहार विधानसभा चुनाव के रूप में राहुल गांधी के पास सुनहरा अवसर है. यदि राहुल गांधी इसे एक अवसर के रूप में देखते हैं और अपनी सारी ताकत इसमें झोंकते हैं तो बिहार की राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी हैं जिसमें कांग्रेस पार्टी को काफी फायदा हो सकता है क्योंकि बिहार का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य कांग्रेस पार्टी के  लिए बहुत अनुकूल है.

यदि कांग्रेस पार्टी सही फैसले करती है तो राहुल गांधी का राजनीतिक कद बढ़ेगा और वह देश के सबसे ताकतवर विपक्षी नेता बन सकते हैं. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बिहार की राजनीतिक परिस्थिति कांग्रेस के अनुकूल क्यों हैं? और राहुल गांधी कैसे इस अवसर को नतीजे में तब्दील कर सकते हैं?

बिहार विधानसभा चुनाव-2015 कांग्रेस पाटी के  लिए एक सुनहरा अवसर है. कई दशकों तक बिहार में कांग्रेस पार्टी का एकक्षत्र राज रहा, लेकिन वी पी सिंह की राजनीति ने बिहार से कांग्रेस को ऐसा उखाड़ फेंका कि पार्टी हाशिए पर चली गई. चुनाव दर चुनाव बिहार में कांग्रेस पार्टी सिमटती चली गई. कांग्रेस की हालत ऐसी हो गई कि पिछले विधानसभा चुनाव में वह 243 सीटों में से केवल 4 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी. जबकि राहुल गांधी ने उस दौरान काफी मेहनत की थी.

साल 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के लिए राहुल गांधी एक साल पहले से ही तैयारी में जुट गये थे. उन्होंने जगह-जगह जाकर, प्रचार-प्रसार करके पार्टी संगठन को मजबूत किया था. लेकिन कांग्रेस की हार के  साथ ही राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे थे. इस बार बिहार में कांग्रेस एक ऐसी राजनीतिक स्थिति में है जहां से वह पार्टी को नया जीवन दे सकती है, एक ताकत बनकर उभर सकती है. चुनावी नतीजे आने के बाद निर्णायक भूमिका में आ सकती है. लेकिन राजनीति में सिर्फ अवसर मिलना ही पर्याप्त नहीं होता है, यहां अवसर को नतीजे में तब्दील करना ही असली चुनौती होती है.

सीट बंटवारा पहले से तय था

बिहार में कांग्रेस पार्टी लालू यादव और नीतीश कुमार के  महा-गठबंधन के साथ है. बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में कांग्रेस 40 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली है. ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषकों के  लिए यह आश्चर्य का विषय है कि लालू यादव और नीतीश कुमार कांग्रेस को 40 सीट देने पर सहमत कैसे हो गए. ज्यादातर विश्लेषक यह मान रहे थे कि महा-गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को अधिक से अधिक 20 सीटें मिलेंगी. लेकिन राहुल गांधी अपनी कुशलता के बल पर 40 सीटें प्राप्त करने में सफल रहे. हक़ीकत यह है कि वह लालू यादव के साथ गठबंधन में शामिल होने के पक्षधर नहीं थे. उनकी बात नीतीश कुमार से हो रही थी.

दिल्ली में नीतीश कुमार और राहुल गांधी के  बीच हुई बातचीत में यह तय हुआ था कि कांग्रेस पार्टी, जनता दल (युनाइटेड) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के  लिए तैयार है. जिसमें कांग्रेस कम से कम 50 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. नीतीश कुमार और राहुल गांधी के  बीच यह करार हो चुका था.

लेकिन, जब नीतीश कुमार और लालू यादव ने जनता परिवार के  तहत एकजुट होकर चुनाव लड़ने का फैसला किया तो चुनावी समीकरण बदल गये. राहुल गांधी 50 सीटों की अपनी मांग पर डंटे रहे. इसी बीच कई समाचार चैनलों पर बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर सर्वे आने शुरु हो गए. हर सर्वे का नतीजा यह था कि लालू यादव और नीतीश कुमार बिना कांग्रेस की मदद के बगैर भाजपा गठबंधन का मुकाबला नहीं कर सकेंगे. इन चुनावी सर्वे की वजह से राहुल गांधी की दावेदारी को बल मिला.

जब बातचीत चल ही रही थी तब बिहार में विधान परिषद का चुनाव हुआ, जिसमें भाजपा गठबंधन ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की. सार्वजनिक तौर पर नीतीश कुमार और लालू यादव ने भले ही इसे महत्वहीन करार दिया, लेकिन परिणामों से उन्हें भाजपा गठबंधन की ताकत अंदाजा हो गया. जब सीटों  के बंटवारे की बातचीत अंतिम दौर में पहुंची, तब भी राहुल गांधी अपनी दावेदारी पर कायम रहे. नीतीश कुमार भी लालू यादव को यह समझाने में सफल रहे कि कांग्रेस की मदद के बगैर भाजपा गठबंधन को हराना मुश्किल है.

इन्हीं वजहों से महा-गठबंधन के  सीट बंटवारे में लालू यादव को 100, नीतीश कुमार का 100 और कांग्रेस को 40 सीटें मिलीं. अब सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी इन 40 सीटों के साथ क्या करेंगी? क्या इस विधानसभा चुनाव के जरिए राहुल गांधी और कांग्रेस कम-बैक(वापसी) करने में सफल होंगे? क्या वह इस सुनहरे अवसर का फायदा उठा पाएगी या फिर गंवा देगी?

बिहार कांग्रेस के पास फंड की कमी

बिहार-कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हैं. लेकिन दिल्ली से उन्हें वैसी मदद नहीं मिल रही है जैसी मिलनी चाहिए. पटना में तैनात पार्टी संगठन के अधिकारियों की स्थिति ऐसी है कि उन्हें हर काम के  लिए फंड की कमी का सामना करना पड़ता है. वैसे, यदि कोई यह कहे कि कांग्रेस के पास पैसे की कमी है, तो इस बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा. लेकिन हक़ीकत यह है कि कांग्रेस की बिहार इकाई पैसे की कमी की समस्या से जूझ रही है.

संगठन के कई पदाधिकारी ऐसे हैं जिनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है वे अपनी जेब से पैसे लगा सकें. फंड की कमी की वजह से कांग्रेस पार्टी प्रचार-प्रसार में सबसे पीछे है. यहां तक कि पप्पू यादव का प्रचार-प्रसार भी कांग्रेस से बेहतर है. जबकि भारतीय जनता पार्टी, जनता दल (युनाईटेड), राष्ट्रीय जनता दल, यहां तक कि लोक जनशक्ति पार्टी बिहार के कोने-कोने में पोस्टर, बैनर और होर्डिंग लगा चुकी है, लेकिन वहीं कांग्रेस पार्टी का न तो कोई पोस्टर है, न राहुल का कोई होर्डिंग और न ही सोनिया गांधी की तस्वीर कहीं दिखाई देती हैै.

सोनिया गांधी की जो तस्वीर नज़र भी आई, वह भी स्वाभिमान रैली के  दौरान लालू और नीतीश के  साथ थी. लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि महा-गठबंधन की इस रैली के होर्डिंग्स से राहुल गांधी की तस्वीर गायब है. अखबारों में भी कांग्रेस पार्टी को जगह नहीं मिल रही है.

चुनाव प्रचार में पिछड़ी कांग्रेस

लोकसभा चुनाव के बाद प्रचार-प्रसार का महत्व हर राजनीतिक दल को समझ में आ चुका है. चुनाव की घोषणा के  बाद वैसे भी सारे होर्डिंग और बैनरों को उतारना पड़ता है. चुनाव की आधिकारिक घोषणा से पहले जहां अन्य पार्टियों ने प्रचार-प्रसार कर अपने पक्ष में माहौल बनाने का सफल प्रयास किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के अलग-अलग इलाकों में रैलियां कीं और पूरे बिहार में होर्डिंग, बैनर और रेडियो के जरिए भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया. वहीं, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल द्वारा दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान किए चुनाव प्रचार की तर्ज पर बिहार में प्रचार-प्रसार में जुटे हैं. बाकी पार्टियों की तुलना में कांग्रेस पार्टी का प्रचार-प्रसार नगण्य है, शून्य है.

हैरानी तो इस बात की है कि राहुल गांधी देश के अलग-अलग इलाकों में जा रहे हैं लेकिन जहां सबसे महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला है वहां उन्होंने अब तक एक भी रैली नहीं की. अब यह पता नहीं कि कांग्रेस पार्टी किसी रणनीति के तहत प्रचार-प्रसार नहीं कर रही है या फिर दिल्ली में बैठे कांग्रेस के  रणनीतिकारों ने बिहार में दूसरी पार्टियों को वाक-ओवर देने का फैसला कर लिया है. कांग्रेस पार्टी की यदि स्वयं को बिहार में पुनर्जिवित करने की योजना है तो यह कहना पड़ेगा कि पहले राउंड में कांग्रेस ने यह अवसर गंवा दिया है.

सही उम्मीदवारों के चयन की चुनौती

कांग्रेस पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह कि वे 40 उम्मीदवार कौन होंगे, जिनके  कंधों पर पार्टी चुनावी मैदान में उतरेगी. समस्या यह है कि पार्टी ने पिछले कई सालों में बिहार में किसी नेता को तैयार नहीं किया. लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, नन्दकिशोर यादव, शाहनवाज हुसैन आदि की तरह, कांग्रेस में एक भी बड़ा नेता नहीं है. बिहार कांग्रेस में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसे बिहार के  हर इलाके  के लोग जानते हों.

कांग्रेस का बिहार में अध्यक्ष कौन है, या पांच बड़े नेता कौन हैं, यह आम जनता को पता ही नहीं है. जो पुराने नेता हैं वे या तो सक्रिय नहीं है या फिर सिर्फ चुनाव के  समय ही अवतरित होते हैं. चुनाव के  समय बिहार कांग्रेस में एक और अनोखी बात होती है, जीतने वाले उम्मीदवार की दुहाई देकर ऐसे पैसे वालों को टिकट मिल जाता है जिनके  बारे में इलाके  के  लोग शुरूआत से ही जानते हैं कि यह जीतने वाला उम्मीदवार नहीं है.

अब यह पता नहीं कि जिन उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाती है उन्हें कांग्रेस के  रणनीतिकार चुनाव से पहले किस दिव्य-दृष्टि से जीतने वाला मानकर टिकट दे देते हैं. कांग्रेस के  युवा नेता दबी ज़बान से बताते हैं कि ज्यादातर टिकट बेच दिए जाते हैं. कांग्रेस पार्टी के  कुछ महान नेता पैसे लेकर टिकट दिलवाने में एजेंट का काम करते हैं. ऐसी ही शिकायत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी मिली थी.

पुरानी गलतियों से सीख  

राहुल गांधी बिहार में पिछले दस सालों से काम कर रहे हैं. उन्होंने बिहार में युवाओं को जोड़ने का काम किया. उन्होंने राज्य के कई इलाकों का दौरा भी किया, कई जिलों में संगठन को भी मजबूत किया, लेकिन राहुल गांधी बिहार के नई पीढ़ी के नेताओं को ग्रूम करने में विफल रहे. इसका सबसे बड़ा ख़ामियाजा चुनाव के  दौरान के भुगतना पड़ता है. पिछले विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने युवाओं को पार्टी से जोड़ा लेकिन टिकट वितरण में युवा नेताओं को तरजीह नहीं दी गई, उनके साथ न्याय नहीं हुआ. कांग्रेस पार्टी ने उन्हीं घिसे-पिटे पुराने लोगों को टिकट दिया जिन्हें जनता कई साल पहले ही रिजेक्ट कर चुकी है. इस बार भी शायद ऐसा ही हो क्योंकि इसकी सुगबुगाहट होने लगी है.

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब से 40 सीटों की घोषणा हुई है कई इलाकों में पुराने कांग्रेसी नेता फिर से सक्रिय हो गए हैं. पैसे वाले अमीर उम्मीदवारों नें दिल्ली के चक्कर लगाने शुरु कर दिये हैं. कांग्रेस के कई युवा नेता और कार्यकर्ता इस बात को लेकर काफी निराश हैं कि जिन लोगों ने पिछले कई सालों से पार्टी के लिए कुछ नहीं किया, वे टिकट के  लिए अपनी दावेदारी पुख्ता करने के लिए दिल्ली में लॉबी और सेटिंग कर रहे हैं. जो गलती कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में की थी, यदि वही गलती इस बार भी हुई तो निश्चित तौर पर नतीजे पिछले चुनाव से बेहतर नहीं होने वाले हैं.

युवा उम्मीदवारों को वरीयता

बिहार में ज्यादातर युवा कांग्रेसी नेता साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे और वैचारिक दृष्टि से कमिटेड कार्यकर्ता हैं. ज्यादातर युवा वे हैं जो राहुल गांधी के  कैंपेन की वजह से पार्टी में हैं. राहुल गांधी से उन्हें बहुत आशाएं हैं. उन्हें बिहार की वास्तविकता की अच्छी समझ है. वे पार्टी की कमियों से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं, वेे भारतीय जनता पार्टी की ताकत और खूबियों को भी बखूबी समझते हैं. लेकिन उनकी शिकायत यह है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं है.

अब तक फैसले दिल्ली में होते रहे हैं. फैसला वेे लोग करते हैं जो बिहार की राजनीति की बारीकियों से अनभिज्ञ होते हैं. लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी में भी बदलाव आया है. अब वह आम कार्यकर्ता की बातों को ध्यान से सुनते हैं. इससे कार्यकर्ताओं और स्थानीय युवा नेताओं का हौसला बढ़ा है. कांग्रेस के  युवा नेता बिहार के  महा-गठबंधन में 40 सीटें लेने को राहुल गांधी की जीत बताते हैं. लेकिन इसे वास्तविक जीत में बदलने के  लिए राहुल गांधी की आगे भी सजग रहना होगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिन सीटों पर कांग्रेस लड़ेगी, उन सीटों पर यदि जद(यू) या आरजेडी के डमी उम्मीदवार खड़े हो गए तो कांग्रेस के लिए मुश्किल होगी.

युवा मतदाताओं का रुख

वर्तमान में बिहार की राजनीति की हकीकत यह है कि भले ही लालू यादव और नीतीश कुमार ने हाथ मिला लिया हो. लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता एक नहीं हैं. आज भी वे एक दूसरे को विरोधी मानते हैं. दोनों ही पार्टियों में टिकट को लेकर मतभेद उभरेंगे. दोनों ही पार्टियों के  नेता निर्दलीय या किसी अन्य पार्टी के  टिकट पर  चुनाव लड़ेंगे और क्षति पहुंचाएंगे. कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छी खबर यह है कि वह महा-गठबंधन के आतंरिक विरोधाभास की चपेट से बाहर है.

जनता दल (युनाइटेड) के समर्थक हों या राष्ट्रीय जनता दल के  समर्थक, उन्हें कांग्रेस को वोट देने में कोई गुरेज नहीं है. आम जनता भी नए चेहरे को मौका देने के मूड में है. ज्यादातर युवा किसी पार्टी के  समर्थक नहीं हैं इसलिए वे अच्छे उम्मीदवार को वोट देना चाहते हैं. बिहार के  युवा मतदाता अब पुराने चेहरों से ऊब चुके हैं. कहने का मतलब यह कि बिहार चुनाव में कांग्रेस के  लिए एक अनुकूल स्थिति है.

इस चुनाव में न तो यूपीए के कामों की विवेचना होगी और न ही घोटालों की परछाई उन्हें सताएगी, अल्पसंख्यकों का पूरा वोट मिलेगा, लालू यादव और नीतीश कुमार के समर्थकों के  वोट भी बिना किसी भीतरघात के उन्हें आसानी से मिल जायेंगे. लेकिन यह तभी संभव है जब कांग्रेस पार्टी हर विधानसभा क्षेत्र की बारीकियों को समझते हुए नए चेहरों और ऊर्जावान युवाओं को मैदान में उतारेगी.

कांग्रेस नेतृत्व की सक्रियता में कमी

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि कांग्रेस पार्टी को योजनाबद्ध और प्राफेशनल तरीके  से चुनाव लड़ना होगा. सभी 40 विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार को ध्यान में रखकर चुनाव कैंपेन चलाना होगा. बिहार की जनता राजनीतिक तौर पर परिपक्व है. वह किसी राष्ट्रीय नेता के  भाषण को सुनकर वोट नहीं देती है. बिहार की राजनीतिक परिस्थिति कांग्रेस के अनुकूल है, लेकिन यह देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी कितना सूझबूझ दिखाती है और इसका फायदा कितना उठाती है.

यदि कांग्रेस पार्टी पिछली विधानसभा चुनाव की गलतियों को दोहराती है तो यह अवसर शोक में बदल सकता है. राहुल गांधी को इसका नुकसान सबसे ज्यादा होगा. कांग्रेस पार्टी को इन नतीजों का खामियाजा बंगाल और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी उठाना पड़ेगा. अगर राहुल गांधी बिहार में अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो राहुल गांधी की 2019 के चुनावों की दावेदारी पुख्ता हो जाएगी, साथ ही उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर उठ रहे सवाल भी समाप्त हो जाएंगे.

लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी बिहार चुनाव को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से सक्रियता की कमी नजर आ रही है. लालू और नीतीश की रैली में उपस्थिति दर्ज कराने से कांग्रेस का ज्यादा लाभ नहीं होने वाला है.

ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी के  रणनीतिकारों को बिहार चुनाव के  दूरगामी असर का आभास नहीं है. शायद उन्हें यह पता नहीं है कि बिहार का यह चुनाव, भारत की राजनीति के  लिए एक ऐतिहासिक चुनाव है. नतीजा जो कुछ भी हो, यह भारतीय राजनीति का मील का पत्थर साबित होना वाला है. बिहार विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कांग्रेस के  लिए संजीवनी का काम करेगा. और यदि कांग्रेस का प्रदर्शन पिछली बार की तरह ही रहा, तो राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल कांग्रेस के  भीतर से ही उठेंगे.

साथ ही कांग्रेस पार्टी संसद के अंदर और बाहर भारतीय जनता पार्टी से मुक़ाबला करने में पहले से ज्यादा कमजोर और असहाय दिखाई देगी.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎