व्यवस्था का बचाव जीत-हार से ज़्यादा ज़रूरी

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई और उसके तुरंत बाद कई चैनलों ने सर्वे दिखाकर बताया कि मतदाताओं के मन में क्या चल रहा है? ज़ाहिर है, वे पहले से आंकड़े (डेटा) एकत्र कर रहे थे और चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद उसे दिखा रहे हैं. आश्चर्य की बात यह है कि लगभग सभी चैनल एक ही ट्रेंड दिखा रहे हैं.

चैनल यह उम्मीद कर रहे हैं कि जदयू, राजद और कांग्रेस गठबंधन आगे रहेगा. वास्तव में उनकी संख्या ऐसी है, जिससे वे स्पष्ट बहुमत पा सकते हैं. भाजपा सभी चैनलों के सर्वे में पीछे है. चुनाव कुछ सप्ताह दूर हैं. भाजपा बहुत अधिक पैसा खर्च करेगी और चुनाव जीतने के लिए सारे प्रयास करेगी. दांव बहुत बड़ा है.

लेकिन, इतिहास गवाह है कि बिहार राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य है, जबकि दूसरे राज्य व्यापार उन्मुख हैं. बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है. कृषि एक प्रमुख मुद्दा है. स़िर्फ चतुर जुमलेबाजी या पैसों के दिखावे या विज्ञापन युद्ध से भाजपा को लाभ नहीं मिलने वाला है.

पहले से ही प्रधानमंत्री ने बिहार के लिए बहुत अधिक पैसों की घोषणा कर दी है, लेकिन फिर भी लोगों के बीच उसका बढ़िया संकेत नहीं जा रहा है, क्योंकि लोगों को पता है कि उसमें से अधिकांश पैसा पहले से ही बिहार के लिए आवंटित था और स़िर्फ री-पैकेजिंग की जा रही है. इसके अलावा प्रधानमंत्री की बातों का अंदाज़ ऐसा था, मानो वह पैसों के बदले सत्ता चाह रहे हों. बिहार के लोग इस तरह की बातों को भाव नहीं देते.

आज़ादी की लड़ाई में समाजवादियों जैसे डॉ. राम मनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण आदि की भागीदारी बिहार स्वाभिमान का केंद्र बिंदु थी. और, आज ये लोग पैसा फेंक कर लोगों का समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं. ज़ाहिर है, पैसा महत्वपूर्ण है, औद्योगिक प्रगति महत्वपूर्ण है.

निश्चित रूप से अधिक से अधिक उद्योग लगने चाहिए, रा़ेजगार मिलना चाहिए, लेकिन इस तरीके से नहीं. स़िर्फ पैसों की बात करके समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता. तो आप क्या करेंगे? खनिज आधारित उद्योग झारखंड में चले गए हैं. अगर आप और अधिक उद्योग चाहेंगे, तो वे सब झारखंड जाएंगे.

वे बिहार में नहीं आएंगे. बिहार कृषि, लघु एवं कुटीर और मध्यम उद्योगों पर निर्भर एक राज्य है. चीनी आदि जैसे कुछ उद्योग वहां पहले से हैं. तथ्य यह है कि कोई भी कृषि की ओर ध्यान नहीं दे रहा है. यह खतरनाक बात है. आबादी हर साल बढ़ती जा रही है, 20 साल बाद देश के लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी, यदि हम कृषि क्षेत्र में उचित निवेश नहीं करते और इस पर केंद्रित योजना बनाकर खाद्य सुरक्षा नहीं देते. बिहार एक प्रमुख राज्य है और चुनाव भी नज़दीक हैं.

इन सब बातों पर बहस के लिए समय नहीं है. लेकिन, जो विकल्प दिया जा रहा है, वह उपयुक्त नहीं है. अगर आप कृषि की बात किए बगैर स़िर्फ पैसों की बात करते हैं, तो यह वास्तव में बिहार को प्रभावित नहीं करता है. इंतजार करिए और देखिए कि अगले कुछ हफ्तों में क्या होता है.

देश में पहली बार हम देख रहे हैं और यह अधिक महत्वपूर्ण बात भी है कि राजनीतिक बहस एक स्वीकार्य स्तर से नीचे चली गई है. स्वयं प्रधानमंत्री जिस तरह के भाषण देते हैं और भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वह उनके स्वयं के व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता. 282 सीटों के साथ अब वह एक राष्ट्रीय नेता हैं, ऐसी भाषा का इस्तेमाल उनके लिए सही नहीं है.

पिछले एक साल से भी अधिक समय में उनके व्यक्तित्व में निखार की उम्मीद की गई थी. ऐसा होना चाहिए था. उन्हें छोटे-मोटे मुद्दों से ऊपर उठना चाहिए था. लेकिन, उनकी संघ की पृष्ठभूमि और संघ को भरोसे में रखने की ज़रूरत के मुताबिक वह ऐसी बातें कर रहे हैं, जो प्रधानमंत्री के स्तर की नहीं हैं. स्वच्छ भारत, जो एनजीओ स्तर की बात थी, उसे प्रधानमंत्री के स्तर पर लाया गया. अब मांस और पोर्न पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर केंद्रीय स्तर पर निर्णय लिया जा रहा है. बहस का स्तर बदतर हो गया है.

संसद में गतिरोध बना रहा और कोई काम नहीं हुआ. अब सोनिया गांधी और नरेंद्र मोदी एक-दूसरे के ़िखला़फ जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह न तो प्रधानमंत्री स्तर की है और न नेता विपक्ष के स्तर की. यह भाषा राज्य विधानसभाओं और सांसद के स्तर की भी नहीं है. यह सब कैसे ठीक होगा, पता नहीं. मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री पक्ष के लोग दूसरे पक्ष से मिलकर कुछ नियम बनाएं.

ज़ाहिर है, इससे उनकी कमज़ोरी नहीं दिखेगी, क्योंकि वह सत्ता में हैं. यह उनका काम है कि बहस का स्तर ठीक कराएं. वह सोनिया गांधी को पेशकश कर सकते हैं कि यदि यह सब जारी रहता है, तो इससे किसी को कोई फायदा नहीं होगा. निश्चित रूप से देश के लिए यह कोई बेहतर स्थिति नहीं है. भारत जैसे देश ने पाकिस्तान के साथ ही आज़ादी पाई. यहां अंतर देखने की ज़रूरत है.

भारत को स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्थिर नीतिगत ढांचे के साथ एक ज़िम्मेदार शक्ति के रूप में दुनिया भर में स्वीकार किया गया है. अगर इसी तरह से सब कुछ चलता रहा, तो एक या दो साल में भारत अपनी एक ज़िम्मेदार लोकतंत्र की छवि खो देगा. अगर आप ग़लत भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो वह आपके कामकाज में भी दिखने लगता है और तब नौकरशाही हावी हो जाती है. सेना की महत्वाकांक्षा जागने लगती है और तब फिर जो पाकिस्तान में होता है, उसी राह पर हमारा देश चल पड़ेगा. आज एक राजनेता की आवाज़ पाकिस्तान में कौन सुनता है?

भारत में ऐसा नहीं है, क्योंकि यहां सेना सिविल नियंत्रण में है और वह नागरिक अधिकारों पर सवाल खड़े करने की हिम्मत नहीं करती. न्यायपालिका और मीडिया स्वतंत्र हैं, उन्हें भी आदर्शों का पालन करना चाहिए. लेकिन, अभी वे देखते हैं कि राजनीतिक नेता अपनी ज़िम्मेदारी से दूर भाग रहे हैं और अपना संतुलन खो रहे हैं. आ़िखरकार, वे सब इंसान हैं और उनका मानक भी गिर सकता है. ऐसा हुआ, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए दु:खद होगा.

मेरे हिसाब से व्यवस्था में सबसे बड़ा खतरा उनके लिए है, जो निर्वाचित हैं या जो निर्वाचित होना चाहते हैं. मेरे हिसाब से जो जीते हुए लोग हैं, हारे हुए लोग हैं और जो आगे जीतना चाहते हैं, सबको मिलकर इस व्यवस्था को बचाने के लिए आगे आना चाहिए. यदि सिस्टम बचा रहता है, तो कोई जीते-हारे, लेकिन सत्ता में आने की गुंजाइश बनी रहेगी. लेकिन, यदि सिस्टम ही नहीं बचता है, तो सभी निर्वाचित लोग और सिविल सोसायटी सबसे बड़े लूजर (हारे हुए) साबित होंगे. हमें उस दिन को नहीं आने देना है.

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