यथार्थ से मुठभेड़ की परख

harivanshदैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश जी राज्यसभा के सदस्य बने. उन्होंने अपने सांसद बनने के बाद के अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर एक लंबा लेख लिखा. भारतीय राजनीति के बारे में रुचि रखनेवाले सभी लोगों को उस लेख को पढ़ना चाहिए. अपने उसी लेख में हरिवंश जी ने जॉन इलियट की किताब इंप्लोजन की चर्चा की है.  हालांकि जॉन इलियट की यह किताब इंप्लोजन दो हजार चौदह में छपी थी और उसी साल उसको एशियन पब्लिशिंग अवॉर्ड भी मिला था.

किताब चर्चित भी हुई थी.लेखक जॉन इलिएट ने लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद इस किताब को फौरन अपडेट किया और नई भूमिका और नरेन्द्र मोदी पर एक चैप्टर लिख डाला.

इसके बाद इस साल इस किताब का परिवर्धित और परिमार्जित संस्करण प्रकाशित हुआ. लगभग पांच सौ पृष्ठों की यह किताब आजादी के बाद के भारतीय राजनीति के विकासक्रम को समझने का बेहतर आधार प्रदान करती है. इस किताब को पढ़ते हुए एक बार फिर से दिमाग में वही बात कौंधी कि क्यों हिंदी में इस तरह के लेखन नहीं हो पाता है. क्यों हिंदी में राजनीति और समाज पर गंभीर लेखन की कमी है. इसके बहुत कारण हैं, लेकिन हिंदी के लिए यह स्थिति अप्रिय है, हिंदी वालों के लिए शर्मनाक. खैर यह एक अवांतर प्रसंग है जो विस्तार से चर्चा की मांग करता है.

भारत को जब आजादी मिली थी तब जवाहरलाल नेहरू जी ने आधी रात को अपने ऐतिहासिक भाषण में ट्रायस्ट विद डेस्टिनी का जुमला इस्तेमाल किया था, जॉन इलियट ने अपनी किताब का नाम उससे ही प्रेरित होकर इंप्लोजन, ट्रायस्ट ऑफ रियलिटी यानि यथार्थ से मुठभेड़ करार दिया है. अपनी इस किताब को जॉन इलियट ने साथ अध्याय में बांट कर भारतीय राजनीति को देखा है. दरअसल जॉन इलिएट लंबे समय से भारत की राजनीति को बेहद करीब से देख रहे हैं.

उनकी इस किताब को लिखने की भी बेहद दिलचस्प कहानी है. जॉन इलिएट ने लिखा है कि अस्सी के दशक में जब लंदन के एक अखबार की दिल्ली की उनकी पोस्टिंग खत्म हुई तब से ही वो भारत के बारे में, यहां की बदलती राजनीति के बारे में लेख लिखना चाहते थे. उनकी ये योजना दो हजार सात तक परवान नहीं चढ़ पा रही थी. दो हजार सात में उन्होंने राइडिंग द एलिफेंट के नाम से एक ब्लॉग लिखना शुरू किया. उनका दावा है कि इस ब्लॉग को लिखने के क्रम में ही उनको इस किताब को लिखने के लिए जरूरी जमीन मिली. इंप्लोजन का मतलब होता है – भीतर ही भीतर फूटना या अंत: विस्फोट.

अब अगर हम भारतीय राजनीति के नजरिए से देखें तो यह किताब उसको भीतर ही भीतर खोखला होते जाने की कहानी भी कहती है. इस किताब की एक खास बात और है कि ज्यादातर रेफरेंस उनके व्यक्तिगत साक्षात्कार से तो हैं ही भारतीय मीडिया में छप रहे लेखों को भी इलियट ने बहुलता से अपनी किताब में सुविधानुसार उपयोग किया है. इन संदर्भों की वजह से इस किताब की उपयोगिता थोड़ी बढ़ जाती है.

लगभग ढाई दशक से ज्यादा वक्त भारत में गुजारनेवाले जॉन इलिएट ने अपनी इस किताब में भारतीय राजनीति और समाज में जारी जुगाड़ और चलता है की मानसिकता को उजागर किया है. इसके अलावा इलियट ने अपने तर्कों के समर्थन में योजना आयोग से लेकर कंपनियों की रिपोर्ट तक को उद्धृत किया है.

इस पूरी किताब के केंद्र में या यों कहें कि पूरी किताब में जो एक अंतर्धारा चलती है वो यह है कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में नेताओं और अफसरों कॉरपोरेट के गठजोड़ ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया. इस गठजोड़ ने ना केवल देश को लूटा बल्कि देश की प्राकृतिक संपदा भी डाका डाला और गरीबों को उनके अधिकारों से सालों तक वंचित रखा और इस वक्त भी उनको उनके हक से दूर रखने में ये गठजोड़ बहुत हद तक कामयाब रहा है.

अपनी इस किताब में इलियट भारतीय राजनीति में वंशवाद की लहलहाती फसल की तरफ भी इशारा करते हैं और यह बताते चलते हैं कि किस तरह से प्रजातंत्र में राजनीतिक वंशवाद चल रहा है और अपनी विरासत अपने उत्तराधिकारी को सौंपने के लिए चालें चली जाती हैं.

जॉन इलियट इस बात का भी विश्‍लेषण करते हैं कि प्राकृतिक और मानवीय संपदा से भरपूर होने के बावजूद किस तरह से इस देश में अपेक्षा के मुताबिक काम करना मुश्किल है. लोगों की आकांक्षाएं जरूर हिलोरें लेती हैं लेकिन जल्दी ही उनका मोहभंग हो जाता है. जॉन इलियट इस बात का संकेत करते हैं लेकिन विस्तार में नहीं जाते हैं कि किस तरह से भारतीय राजनीति में जनता की इसी आकांक्षा को भुनाकर आजादी के बाद कई बार राजनीतिक दलों ने सत्ता पर कब्जा जमाया.

इस देश में ज्यातार चुनाव और राजनीतिक जंग परसेप्शन के आधार पर लड़े और जीते जाते रहे हैं. नारों और जुमलों ने कई सरकारें बनवाई और गिरवाईं. बस नारे के क्लिक करने की जरूरत होती है.  ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए अगर हम देखें तो इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे पर कई चुनाव जीते, राजा नहीं फकीर है के जुमले पर वीपी सिंह देश के पीएम बने. सुशासन बाबू का तमगा लगाकर नीतीश लगातार चुनाव जीतते रहे हैं. मजबूत शासन देने के दावे और वादे पर नरेन्द्र मोदी पहली बार बीजेपी को केंद्र में बहुमत दिलवाया.

नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह की जुमलेबाजी पिछले लोकसभा चुनाव में की और सफलता हासिल की वो राजनीति शास्त्र के छात्रों के लिए शोध का विषय हो सकता है. उसी तरह से दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का एलान कर सत्ता पर ऐतिहासिक बहुमत से काबिज हुए.

द इंसाइक्लोपीडिया ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस (1978-83) के पच्चीसवें खंड में इंदिरा गांधी ने कहा था कि – कांग्रेस अपने डायनमिक प्रोग्राम्स और आम जनता से जुड़ी नीतियों की बदौलत ही अपने आपको बचा सकती है. हम कांग्रेस के सरवाइवल के लिए तो लड़ ही रहे हैं, लेकिन भारत की जनता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं. अब यहां भी यह साफ तौर पर देखा जा सकता है कि किस तरह से इंदिरा गांधी ने बेहद चतुराई के साथ अपनी लड़ाई को जनता की लड़ाई बताई.

नतीजा यह हुआ कि इमरजेंसी के बाद सतहत्तर के चुनाव में बुरी तरह से मात खानेवाली कांग्रेस अस्सी में बहुमत से सरकार में आई. तो भारतीय राजनीति में, खासकर चुनाव में बहुत कुछ भावनात्मक स्तर पर होता है. भावना के इस निर्माण के कई कारक होते हैं जिसपर इस किताब इंप्लोजन में इसके लेखक ने प्रकाश डाला है.

राजनीति के अलावा इस किताब में भारत के आर्थिक इतिहास का विश्‍लेषण भी किया गया है. 1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था खुल रही थी या ये कहें कि जब भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार शुरू हुए थे तो लेखक उसका गवाह रहा. इस किताब के दूसरे अध्याय ओपनिंग अप की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से होती हैं. 21 जून 1991 में जब नरसिम्हा राव ने अपनी सरकार बनाई तो अपने एक उच्चाधिकारी से उन्होंने छूटते ही कहा था – हमें इस मकड़जाल से बाहर निकलना हैं.

उन्होंने मनमोहन सिंह से कहा था कि आप अपने दफ्तर जाएं और इसके बारे में कार्ययोजना बनाएं. नरसिम्हा राव की यही बात या कहें कि प्रधानमंत्री का यही आदेश भारत में आर्थिक सुधार की बुनियाद बना. उस वक्त राव के दफ्तर में काम करनेवालों को ये एहसास नहीं था कि वो देश पर कितनी बड़ी छाप छोड़ने जा रहे हैं. जब नरसिम्हा राव ने देश की बागडोर संभाली थी तो देश की अर्थव्यवस्था बदहाल थी. विदेशी मुद्रा भंडार आश्‍चर्यजनकर रूप से कम था.

विदेशी निवेश के नाम पर लगभग शून्य की स्थिति थी. इस अध्याय में इलियट ने विस्तार से इसके शुरू होने की ऐतिहासिक वजहों पर लिखा है. उस दौर को जानने के लिए यह अध्याय एक जरूरी दस्तावेज की तरह हैं. आर्थिक सुधार के दौर से लेकर यह यूपीए 2 के शासन काल तक की आर्थिक गतिविधियों को परखते हैं और सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी की छाप को इन नीतियों पर रेखांकित करते चलते हैं.

किताब का एक और महत्वपूर्ण चैप्टर सोशल चेंज है जिसमें लेखक दिल्ली में 2012 में हुए निर्भया कांड के खिलाफ उठे जनज्वार से शुरूआत करता है और फिर लोकतंत्र में विरोध के अधिकार पर विस्तार से बात करता है. चूंकि लेखक लंबे समय तक रिपोर्टर रहा है लिहाजा जब वो आंखों देखी कहता है तो उसमें  खबर के साथ साथ सामाजिक बदलाव को भी पकड़ता है. घटनाओं के मार्फत चीजों को देखने का नजरिया इस अध्याय को प्रामाणिक बना देता है.

जैसा कि उपर संकेत किया गया है कि इलियट ने राजनीतिक वंशवाद पर विस्तार से लिखा है. डायनेस्टी के नाम से लिखे अध्याय में मुख्यत वो गांधी नेहरू परिवार पर ही अपना फोकस रखते हैं. सोनिया के काल को परखते हुए राहुल के आगमन की आहट को भांपने की कोशिश करते हैं. सोनिया पर इलियट लिखते हैं कि उन्होंने अपने इर्द गिर्द एक ऐसा घेरा बना लिया है कि कोई भी उनपर व्यक्तिगत हमले करने से बचता हैं. 2004 से लेकर करीब करीब 2010 तक तो सोनिया की यही स्थिति थी.

इस बात के लिए सोनिया गांधी को दाद तो देनी ही होगी कि जब कांग्रेस अपने पतन काल में थी तो उन्होंने आगे बढ़कर संभाला और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता के रहते भारतीय राजनीति में ना केवल अपनी जगह बनाई बल्कि अपनी पार्टी को सत्तारूढ़ भी करवाया. फिर अगले दस साल तक कांग्रेस केंद्र की सत्ता पर काबिज रही.

जॉन इलियट की किताब इस लिहाज से अहम है कि इसमें उस दौर की सारी घटनाएं जीवंत हो जाती है. इस किताब के अंत में लेखक ने अपने निष्कर्ष दिए हैं जिसमें वो भारतीय लोकतंत्र की सफलता को तो स्वीकार करते हैं लेकिन लोकतंत्र की कमियों को भी उजागर करते हुए अपने तर्कों के आधार पर उसको साबित करते चलते हैं. कुल मिलाकर देखें तो यह किताब एक शोध की तरह है लेकिन बोझिल नहीं.