महा-गठबंधन की स्वाभिमान रैली हीरो और विलेन दोनों रहे लालू

lalu-parsad-yadavविधानसभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले पटना के गांधी मैदान की यह पहली और शायद आ़िखरी राजनीतिक रैली रही. महा-गठबंधन में शामिल दलों के आह्वान पर आयोजित यह स्वाभिमान रैली भीड़ के लिहाज से हाल के वर्षों की बड़ी रैलियों में गिनी जाएगी. राजधानी के विभिन्न इलाकों की सड़कों पर रैली में भाग लेने वालों का हुजूम देखा गया. राज्य के सुदूर अंचलों से लोग आए, अपने नेताओं के आवास पर रहे, गांधी मैदान एवं अन्य सड़कों पर छाए रहे और फिर वापस लौट गए. महा-गठबंधन की यह बहु-प्रतीक्षित और बहु-प्रचारित रैली अपने तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य यानी विधानसभा चुनाव का ताप परवान चढ़ाने में कामयाब रही.

रैली की सबसे बड़ी राजनीतिक परिघटना इसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की उपस्थिति मानी जा सकती है. रैली में उनकी मौजूदगी को लेकर कई नकारात्मक कयास लगाए जा रहे थे, पर चुनावी राजनीति ने सभी कयासों को धता बता दिया. बिहार की धरती पर सोनिया गांधी पहली बार नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के साथ एक मंच पर मौजूद थीं. सोनिया ने केंद्र सरकार की नीतियों पर तो हमले किए ही, सांप्रदायिकता को भी अपना निशाना बनाया. उन्होंने मोदी सरकार पर केवल शो-बाजी करने का आरोप लगाया. इस लिहाज से उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव का राष्ट्रीय महत्व गंभीर रूप से रेखांकित किया.

यह रैली बिहारी स्वाभिमान के सवाल को लेकर आयोजित थी, लिहाजा वक्ताओं का ज़ोर उस पर ज़्यादा रहा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के स्वाभिमान के साथ-साथ अपने दस वर्षों के शासनकाल की उपलब्धियों और सुशासन को अपने भाषण का मुद्दा बनाया. राजद प्रमुख ने एक बार फिर पुरज़ोर तरीके से जातिगत जनगणना की रिपोर्ट के प्रकाशन का मुद्दा तो उठाया ही, अपनी राजनीति के अनुरूप पिछड़ा कार्ड और मंडल की राजनीति को चुनावी मुद्दा बनाने की हरसंभव कोशिश की. पिछड़ों को गोलबंद करने के अघोषित एजेंडे के फ्रंट पर यह रैली सफल रही, इसमें शक है.

लालू प्रसाद के आह्वान पर आयोजित रैलियों की एक खासियत रही है कि उनमें ग़रीबों-वंचितों का सैलाब उमड़ता रहा है, लेकिन इस बार ऐसे चेहरे कम थे. शहरी बिहार के साथ-साथ ग्रामीण बिहार के चेहरे तो थे, पर वैसे चेहरे काफी कम थे, जो अमूमन लालू प्रसाद की रैलियों में हुआ करते हैं. लालू प्रसाद की रैलियों में बिहार के अगड़े सामाजिक समूहों की भागीदारी बहुधा कम होती रही है, इस बार भी यही हुआ. स्वाभिमान रैली में अपेक्षा के अनुरूप माय सामाजिक समूहों की भागीदारी राज्य के अन्य सामाजिक समूहों से काफी अधिक दिख रही थी, लेकिन अति पिछड़े एवं दलित (महादलित) सामाजिक समूहों की मौजूदगी अपेक्षाकृत काफी कम रही.

मंच भी इससे इतर आभास नहीं दे रहा था. महा-गठबंधन की यह रणनीतिक सफलता तो नहीं कही जा सकती. बिहार में पिछले कई चुनावों से सामाजिक समूहों की राजनीतिक गोलबंदी सा़फ दिखती रही है. इस बार यह गोलबंदी अधिक तीखी होती दिख रही है. लेकिन, इस गोलबंदी के दौर में भी अति पिछड़ों के अधिकांश समूह राजनीतिक तौर पर किसी राजनीतिक गोल से बाहर हैं.

कुछ समूहों को अपवाद मान लें, तो दलित (महादलित) सामाजिक समूहों के बहुमत का भी यही हाल है. सूबे में अति पिछड़ों की 32 और दलित (महादलित) की 14 प्रतिशत से अधिक आबादी है. संयोग से महा-गठबंधन के नेतृत्व ने इन मतदाता समूहों को अपने साथ जोड़ने का स्पष्ट राजनीतिक संदेश नहीं दिया. सोनिया गांधी ने राष्ट्रीय राजनीति में बिहार विधानसभा चुनाव की महत्ता रेखांकित की, तो नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेकर अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाईं. इसके अलावा उन्होंने महिलाओं एवं युवाओं को साधने की हरसंभव कोशिश की.

राजद प्रमुख ने पिछड़ा कार्ड खेलने की कोशिश में माय और विशेषकर, यदुवंशियों तक स्वयं को सीमित रखा, लेकिन वह मंडल राजनीति के दायरे के सामाजिक समूहों को समग्रता में कोई स्पष्ट संदेश नहीं दे सके. रैली में युवाओं की भागीदारी तो कम थी ही, जोश से भरे नव-मतदाता समूहों (पहली या दूसरी बार मतदाता बने युवा) की कमी सा़फ दिखी. माना जाता है कि बिहार में छह करोड़ से अधिक मतदाताओं में 60 प्रतिशत से अधिक युवा वर्ग के हैं, जो चुनावी माहौल सरगर्म करते हैं. इसी समूह से राजनीतिक दलों को चुनावी कार्यकर्ता उपलब्ध होते हैं और यही समूह बूथ पर वोटों की रक्षा करता है.

सो, इस मतदाता समूह को आकर्षित करने के उपाय होने ही चाहिए. यह कहना अनुचित होगा कि महा-गठबंधन में युवाओं को आकर्षित करने की रणनीति का अभाव है. उसके साथ युवा हैं, उत्साह और जोश से भरे युवा हैं, लेकिन रैली में इसकी अभिव्यक्ति नहीं हुई. रैली का एक कृष्ण पक्ष लालू वंश का राजनीतिक सम्मान भी रहा. राबड़ी देवी सहित लालू प्रसाद के परिवार के कोई आधा दर्जन चेहरे मंच पर उपस्थित थे, चहलक़दमी कर रहे थे.