महा-गठबंधन छोड़ने पर समाजवादी पार्टी में उठ रहे सवाल

समाजवादी पार्टी हाल ही में बने धर्मनिरपेक्ष महा-गठबंधन से अलग तो हो गई, लेकिन खुद पार्टी के गलियारे में इस बात को लेकर चर्चा सरगर्म है कि आ़िखर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने महा-गठबंधन से अलग होने का फैसला क्यों किया?

महा-गठबंधन के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया से लेकर बिहार में शुरू हुई चुनावी तैयारियों तक पैनी नज़र रखने वाले सपा के वरिष्ठ नेताओं का भी यह मानना है कि महा-गठबंधन से हटने की नेपथ्य-भूमि हफ्ते भर के अंदर तैयार हुई और जब बिहार में महा-गठबंधन के चुनावी समर में उतरने का बिगुल पटना में स्वाभिमान रैली के ज़रिये फूंक दिया गया, तो उसके बाद सपा ने बिगुल की हवा निकाल दी.

सपा नेताओं का कहना है कि सीटों का मामला इतना गंभीर नहीं था कि महा-गठबंधन टूट जाए, क्योंकि बिहार में सपा की पहले से कोई ज़मीन नहीं है और ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का हश्र वह पहले भी देख चुकी है. पांच से अधिक सीटों पर बातचीत का रास्ता अभी खुला हुआ ही था. यानी महा-गठबंधन से अलग होने की वजह सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि कुछ और है.

इसकी समीक्षा चलती रहेगी और इसमें राजनीतिक कारणों के साथ-साथ मुलायम सिंह यादव की आय से अधिक संपत्ति, यादव सिंह के भ्रष्टाचार को मिला सपा का संरक्षण, अखिलेश मंत्रिमंडल के खास मंत्रियों के खास भ्रष्टाचार पर केंद्रीय एजेंसियों की निगाह, मुलायम के जन्मदिवस के आजमी-समारोह पर हुए आलीशान खर्चे और आईपीएस अधिकारी को फोन पर दी गई धमकी को भी जोड़कर देखा जाता रहेगा.

यह स्पष्ट है कि महा-गठबंधन की चूलें बिखेरने में भाजपा की भूमिका और सपा नेतृत्व की सहमति से कतई इंकार नहीं किया जा सकता. बीते 28 अगस्त को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई थी. उस मुलाकात की विषय-वस्तु अत्यंत गोपनीय रखी गई. कयास खूब लगे कि मुलायम ने मोदी से उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की शिकायत की और लोकायुक्त की नियुक्ति पर लगे अड़ंगे पर प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की, वगैरह-वगैरह. लेकिन, ये सारे कयास थोथे साबित हुए.

प्रधानमंत्री से मुलायम की मुलाकात अचानक नहीं थी, बल्कि उस मुलाकात की वजहें अत्यंत संवेदनशील और सारगर्भित थीं. प्रधानमंत्री से मुलायम की मुलाकात का सिरा महा-गठबंधन भंग के सूत्र से मिला हुआ था. यह सूत्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं समाजवादी पार्टी के शक्तिशाली राष्ट्रीय महासचिव प्रो. राम गोपाल यादव के बीच शाह के घर पर हुई बातचीत में मजबूत हुआ और अगले ही दिन लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह अभिव्यक्त भी हो गया. सपा की बदली हुई बोली और कांग्रेस पर चल रही गोली बेसबब थोड़े ही है.

यह वही समाजवादी पार्टी है, जो संप्रग सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस से रुहानी रिश्ता रखे हुई थी. लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दल से पारिवारिक दलदल में फंस गए सपा नेता भाजपा और नरेंद्र मोदी से जले-भुने रिश्ते हाल-हाल तक अभिव्यक्त कर रहे थे. मुलायम से लेकर अखिलेश तक नरेंद्र मोदी के ़िखला़फ तल्ख बयानों का रैपिड फायर कर रहे थे.

संसद सत्र में भी सपा ने पहले तो पूरी ताकत से सरकार का विरोध करने में विपक्ष का साथ दिया, लेकिन अचानक ऐसा कुछ हुआ कि मुलायम, अखिलेश एवं राम गोपाल यानी सबके सुर भाजपा-मोदी के प्रति मुलायम और कांग्रेस के प्रति कठोर हो गए. इसी दौरान यादव सिंह के भ्रष्टाचार का मामला भी सीबीआई जांच के दायरे में आ गया और आईपीएस अधिकारी को आपराधिक धमकी देने के मामले में भी केंद्र ने तूफान आने के पहले की शांति का नियोजित उपक्रम कर लिया.

बहरहाल, महा-गठबंधन में टूट बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू-राजद के लिए भारी झटका है. लालू के लिए यह अधिक सदमा देने वाला है, क्योंकि वह मुलायम के समधी हैं और कई बार यह भी कह चुके हैं कि मुलायम से उनका रिश्ता मजबूत सीमेंट का जोड़ है, टूटेगा नहीं. लेकिन यह सीमेंट नकली निकली, जो खास तौर पर लालू को बिहार चुनाव में पुल बांधने में ऩुकसान पहुंचाएगी.

सपा के एक नेता ने कहा भी कि लालू को अब यह याद आ रहा होगा कि उन्होंने किस तरह मुलायम को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था. समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेकुलर, नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी का विलय कर राष्ट्रीय स्तर पर एक पार्टी बनाने की जो पहल हुई थी, उसमें सपा नेता शिवपाल यादव की भी सक्रिय भूमिका थी. एक पार्टी तो नहीं बनी, लेकिन बाद में यह महा-गठबंधन सामने आया.

पटना में पिछले दिनों हुई महा-गठबंधन की स्वाभिमान रैली में सपा का प्रतिनिधित्व कर रहे शिवपाल ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे प्रहार किए थे. उन्हें शायद यह भान नहीं था कि उनके दोनों भाई महा-गठबंधन का शिराजा बिखेरने की तैयारी में लगे हैं. सपा के इस रोल को बड़े ग़ौर से देखा जा रहा है और यह उत्तर प्रदेश के चुनाव पर भी खासा असर डालेगा.

सपाई थिंक टैंक के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि महा-गठबंधन का ़फायदा बिहार में नीतीश कुमार को ही मिलता. नीतीश कुमार महा-गठबंधन में भले ही राजद के साथ रहे हों या लालू यादव उन्हें आगे रखकर चुनाव में उतरे हों, लेकिन नीतीश की कांग्रेस से बढ़ रही अंतरंगता लालू को भी रास नहीं आ रही है. मुलायम सिंह तो इसे बिल्कुल नापसंद कर रहे थे. लिहाजा, नीतीश के फायदे के लिए मुलायम केंद्र के कोप का भाजन बनना पसंद नहीं करते.

महा-गठबंधन टूटने का संदेश बिहार में गंभीरता से लिया गया. सपा की स्थिति बिहार में मजबूत भले न हो, लेकिन यादव समुदाय में मुलायम की खास प्रतिष्ठा है. अगर सपा ने अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, तो उसका ऩुकसान लालू को ही अधिक उठाना पड़ेगा. प्रो. राम गोपाल यादव ने महा-गठबंधन से अलग होने का ऐलान करते हुए कहा भी कि समाजवादी पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटों पर और अपने बूते चुनाव लड़ेगी.

राम गोपाल ने कहा कि जनता परिवार के एकजुट करने का मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि समाजवादी पार्टी का अस्तित्व ही खत्म हो जाए. इस बयान के गहरे निहितार्थ हैं. राम गोपाल ने कहा, मैंने शुरू में ही कहा था कि बिहार चुनाव के वक्त यह नौबत आएगी. इसलिए मैंने गठबंधन के वक्त ही कहा था कि मैं अपनी पार्टी के डेथ वारंट पर दस्तखत नहीं कर सकता. राजनीतिक पंडितों का कयास है कि सपा कम से कम 50 सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

हालांकि, सपा नेता इससे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं. पिछले चुनाव में सपा ने 243 में से 146 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे पराजय का सामना करना पड़ा. महा-गठबंधन से अलग होने के मुलायम के ऐलान के बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने खाई पाटने की भरसक कोशिश की, जो मुलायम पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाई और समाजवादी पार्टी को महा-गठबंधन में बनाए रखने की लालू की आ़खिरी कोशिश भी नाकाम साबित हुई.

उल्लेखनीय है कि पिछले 12 अगस्त को राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के बिहार प्रभारी सीपी जोशी की मौजूदगी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू, राजद एवं कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल को लेकर आपसी सहमति बनने की घोषणा करते हुए कहा था कि बिहार विधानसभा की 243 सीटों में से सौ-सौ सीटों पर जदयू एवं राजद और 40 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव लड़ेंगे.

बाकी बची तीन सीटों के बारे में नीतीश ने स्पष्ट कहा था कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महा-गठबंधन के साथ आने की उम्मीद है. उस समय किसी नेता ने समाजवादी पार्टी की चर्चा तक नहीं की, सपा को पूछा भी नहीं गया. ऐसे रवैये की समाजवादी पार्टी में सांगठनिक स्तर पर काफी निंदा हुई. सपा को न पूछने पर जब सवाल उठे, तो लालू ने मुलायम से अपनी रिश्तेदारी का हवाला दिया और मज़ाकिया लहजे में कहा कि मुलायम हमारे समधी हैं, राजद की सारी सीटें तो उन्हीं की हैं. लेकिन, तल्खी बढ़ती ही चली गई.

सपा आलाकमान के इशारे पर पार्टी की बिहार इकाई के अध्यक्ष रामचंद्र सिंह यादव ने खुला प्रतिरोध किया और पटना में अनशन-प्रदर्शन की भी शुरुआत हो गई. मुलायम से महा-गठबंधन से अलग होकर वामदलों और राकांपा के साथ मिलकर बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया जाने लगा. महा-गठबंधन चुनावी कसौटी पर उतरने के पहले ही टूटकर बिखर गया. लालू-मुलायम की रिश्तेदारी भी उसे बचा नहीं पाई.

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प्रभात रंजन दीन

प्रभात रंजन दीन शोध,समीक्षा और शब्द रचनाधर्मिता के ध्यानी-पत्रकार...