भारत-पाक वार्ता रद्द पाकिस्तान भरोसे के लायक नहीं

ajit-dovasartaj-azizभारत और पाकिस्तान के बीच एनएसए स्तर की वार्ता पर पूरे विश्व की नजरें थीं, लेकिन पाकिस्तान ने वार्ता के ऐन पूर्व अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ को भारत भेजने से इंकार कर भारत के भरोसे को शर्मिंदा कर दिया. पाकिस्तान न आतंकवाद पर बात करना चाहता है, न हुर्रियत नेताओं से मिलने की जिद्द छोड़ता है. हिमाकत देखिए कि जब भारत द्वारा उसके इस कदम का विरोध किया जाता है, तो वह परमाणु बम की धमकी भी दे देता है.

सवाल यह उठता है कि भारत-पाकिस्तान के बीच होनेवाली यह वार्ता क्या भारत सरकार की विदेश नीति की असफलता थी या पाकिस्तान की चिरपरिचित धोखेबाजी?

आख़िरकार भारत-पाक राष्ट्रीय सुरक्षा स्तर की वार्ता स्थगित हो ही गई. इधर बात रुकी नहीं कि दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया. जब भी भारत-पाक बातचीत की उम्मीद बंधती है, दोनों देशों की जनता एक नई उम्मीद के साथ अच्छे संबंधों की प्रतीक्षा करते हैं. लेकिन पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन और भारत में तबाही मचाने वाले दुश्मनों को जिस तरह से पाकिस्तान शरण देता रहा है, उससे उत्पन्न समस्या को हम सिर्फ बातचीत के रास्ते ही सुलझा सकते हैं, लेकिन अफसोस कि पाकिस्तान बातचीत से भी ऐन वक्त पर पीछे हट जा रहा है. यही कारण है कि भारत की कोई भी कोशिश आज तक बहुत हद तक कामयाब नहीं हो सकी.

पाकिस्तान का शुरू से ही यह दुर्भाग्य रहा है कि इस देश को आज तक राजनीतिक स्थिरता नहीं हासिल हो पाई. पूरा देश आतंकवादियों का पनाहगाह बन चुका है. दूसरे शब्दों में पाकिस्तान को आतंक की नर्सरी कहना गलत नहीं होगा. आए दिन पाकिस्तान में जगह-जगह धमाके होते रहते हैं, आतंकवादी पकड़े जाते रहे हैं. कारण कि इस देश के नेताओं ने आतंकवाद को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया. इसलिए पाकिस्तान अपने पड़ोसी देश भारत के लिए भी सिरदर्द बनता रहा.

यही कारण है कि भारत भी पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार होता गया. अब सवाल यह है कि आख़िर यह राजनयिक वार्ता आरोप-प्रत्यारोप और कटुता पर आकर कैसे ख़त्म हो गई? आखिर क्यों पाकिस्तान खुद वार्ता से पीछे हटता है और भारत को परमाणु बम की धमकी देता है? राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं कि इस मुलाक़ात का बाक़ायदा एजेंडा तो तैयार हुआ, लेकिन इस पर पाकिस्तान की ओर से कोई जवाब नहीं आया. भारत ने जो एजेंडा पाकिस्तान को भेजा, अगर इस एजेंडे पर पाकिस्तान ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया था तो फिर इस वार्ता को अंतिम रूप देने के लिए और क्या बेहतर रास्ता अपनाया गया?

जब ऊ़फा में बातचीत दोबारा शुरू करने के निर्णय पर मुहर लग गई थी तो दोनों ही देशों के प्रधानमंत्रियों को क्या यह याद नहीं था कि इससे पूर्व वार्ता किस बात पर ख़त्म हुई थी या यह बातचीत का सिलसिला किस बात पर अटक गया था. जब दोनों प्रधानमंत्रियों ने ऊफा में बातचीत करने का संकल्प लिया था तो रणनीति क्या होगी, किन-किन मुद्दों पर बातचीत होगी, कौन-कौन सी समस्याएं प्राथमिकता के साथ उठाई जाएंगी? क्या यह सब उस समय तय नहीं किया गया था और अगर यह सवाल ही महत्वपूर्ण नहीं बनाया गया तो फिर यह राजनयिक स्तर पर सबसे बड़ी हार है.

कश्मीर ऊ़फा घोषणा में अगर शामिल नहीं किया गया तो यह किसकी ग़लती है? सारी दुनिया जानती है कि कश्मीर दोनों देशों के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन इस समय इससे भी बड़ा मुद्दा आतंकवाद है. इसलिए इसे ही प्राथमिकता देकर बात को आगे बढ़ाते हुए दूसरी मीटिंग को कश्मीर समस्या तक ले जाना चाहिए था. यह जगजाहिर है कि जब भी दोनों देशों के राजनयिकों के बीच मुलाकात होनेवाली होती है, पहले से ही विभिन्न मुद्दों पर एजेंडा तैयार होता है. एक-एक शब्द को सोच-समझकर तैयार किया जाता है. वार्ता में शामिल होने वाले लोगों का चयन भी बहुत सोच-समझकर किया जाता है.

इस संदर्भ में एक और बात आम भारतीयों के ज़हन में आती है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और नवाज़ शरी़फ दोनों ही टेलीफोनिक संपर्क में रहते हैं. दोनों ईद, होली, दीवाली और क्रिकेट मैच की जीत पर एक-दूसरे को मुबारकबाद देते हैं. जब दोनों को ही नज़र आ रहा था कि मुलाक़ात ख़तरे में पड़ सकती है तो फोन पर बातचीत क्यों नहीं की गई. एजेंडे पर दोनों की ही सहमति नहीं थी तो फिर बातचीत को कुछ समय के लिए रद्द किये जाने की बात करनी चाहिए थी.

पाकिस्तान ने जिस प्रकार अंतिम निर्णय ले लिया कि बातचीत स्थगित की जा रही है और सरताज अज़ीज़ ने परमाणु शक्ति होने की धमकी तक दे डाली. सरताज अज़ीज़ गैर ज़िम्मेदाराना बयान देते हुए यह भी कहते रहे कि अब पाकिस्तान वार्ता के लिए पहल नहीं करेगा. सरताज अज़ीज़ यह भूल गये हैं कि दोनों देशों में स्थिरता रहे और दोनों अच्छे पड़ोसियों की तरह बर्ताव करें, इसकी पहल हमेशा भारत की ओर से ही हुई है.

अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर बार स्वयं ही संबंध बेहतर बनाने पर पहल की है. अगर वर्तमान सरकार संबंध बेहतर बनाने में गंभीर न होती तो नरेन्द्र मोदी अपनी ताजपोशी में नवाज़ शरी़फ को आमंत्रित न करते. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का औचित्य इस संदर्भ में स्पष्ट था, इन्होंने इस बार की बातचीत को आतंकवाद पर केन्द्रित किया था. हालांकि भारत पाकिस्तान के साथ अन्य विवादित मुद्दों पर भी बात करना चाहता था, जिसे शांति की दिशा में काबिलेतारीफ कहा जा सकता है. पिछले 2 महीनों के दौरान 100 से अधिक घुसपैठ की घटनाएं हो चुकी हैं.

जिंदा आतंकवादी नवेद पकड़ा गया है, जिसको झुठलाया नहीं जा सकता. आतंकवादी खुद स्वीकार रहा है कि वह पाकिस्तान का नागरिक है, लेकिन पाकिस्तान की थोथी दलील देखिए कि वह अपने नागरिक को ही पाकिस्तानी होने से इंकार कर रहा है. एनएसए स्तरीय इस वार्ता के स्थगित होने के बाद दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों और सीमा रक्षकों के बीच अगली निर्धारित मुलाक़ातें भी खटाई में पड़ गई हैं. दोनों देशों के सेना मिलिट्री ऑपरेशन के प्रमुखों के बीच 6 सितंबर को मुलाक़ात का प्रस्ताव दिया गया था. इसके अलावा भारतीय सीमा सुरक्षा बलों और पाकिस्तानी रेंजर्स के अधिकारियों को भी इन्हीं दिनों में मुलाक़ातें करनी थीं.

अब यह सब शायद ही हो पाए. पाकिस्तान ने आखिरी समय में जिस तरह से एनएसए स्तर की वार्ता को स्थगित कर दिया, उससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान को यह बात समझ में आ गई थी कि पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज पर भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भारी पड़ेंगे. इस बात की जानकारी हमें पाकिस्तानी सूत्रों से ही मिलती है.

दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच प्रमुख समस्या आतंकवाद की है, लेकिन पाकिस्तान इसे कोई समस्या मानता ही नहीं, क्योंकि जिस तरह से भारत सरकार आतंकवाद पर वार्ता के लिए अडिग थी और इस मुद्दे पर जिस तरह से पाकिस्तान अपना रवैया दिखा रहा था, उससे खुद पाकिस्तान को ही लगने लगा था कि वह आतंकवाद के मुद्दे पर घिर सकता है. पाकिस्तान की एक और जिद्द भारत को नागवार गुजरी और वह थी हुर्रियत नेताओं से मिलने की जिद्द. इन सारे बिंदुओं पर पाकिस्तान ने भारत के समझ खुद को घिरता हुआ पाया.

इसलिए उसने वार्ता रद्द करना ही उचित समझा. सारे बिंदुओं पर भारत वार्ता के लिए तैयार बैठा था, लेकिन पाकिस्तान ने भारत के भरोसे को शर्मिंदा किया. कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान भरोसे के लायक नहीं है, उसके साथ बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ाना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय या घरेलू मंचों पर भारत की किरकिरी न हो.