यह तथ्यात्मक आलोचना है या अवसरवाद

पिछले एक दशक के दौरान पश्चिमी देशों में मुस्लिम विरोध की भावना में तेज़ी आई है. इसके कई कारण बताए जाते हैं, लेकिन उनमें मुख्य रूप से न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 के हमले और उसके बाद कई पश्चिमी देशों में एक के बाद एक हुए आतंकवादी हमलों का नाम लिया जाता है. पश्चिमी देशों में मुस्लिम विरोध के दो और स्वर हैं, जिनमें से एक का संबंध खुद को पूर्व मुसलमान और दूसरे का खुद को उदारवादी एवं सेक्युलर मुसलमान कहने वालों से है.

इसी दूसरे समूह में एक बहुत महत्वपूर्ण नाम है, पाकिस्तानी मूल के कैनेडियन नागरिक तारिक फतह का. पिछले दिनों तारिक फतह भारत आए थे. उनके भारत दौरे का वीडियो फेसबुक, ट्‌वीटर, व्हाट्स-ऐप और यूट्यूब पर खूब देखा जा रहा है. उनके भारत दौरे के बारे में बात करने से पहले तारिक फतह के बारे में जान लेना ज़रूरी है.

इंटरनेट पर दी गई जानकारियों के मुताबिक, फतह साहब पाकिस्तान के कराची शहर में 1949 में पैदा हुए, वहीं पर शिक्षा प्राप्त की और वामपंथी आंदोलन से जुड़ गए. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने कराची सन नामक अख़बार के संपादक के तौर पर की. उसके बाद पाकिस्तानी टीवी के लिए खोजी प्रत्रकार की भूमिका निभाई. फिर वह सऊदी अरब चले गए, जहां उन्होंने तक़रीबन दस सालों तक काम किया.

उसके बाद उन्होंने कनाडा का रुख किया और वहां की नागरिकता हासिल की. वहां भी उन्होंने राजनीति में हिस्सा लिया, दो बार चुनाव लड़े और दोनों बार हार गए. फतह कई किताबों के लेखक हैं, जिनमें चेसिंग द मिराज, द जीव इज नॉट माई एनमी इत्यादि प्रमुख हैं. उनका कहना है कि ़िफलहाल वह एक किताब लिख रहे हैं, हिंदू इज नॉट माई एनमी.

फतह साहब खुद को पाकिस्तानी कहते हैं. पाकिस्तान से जुड़ी समस्याएं सुलझाने के लिए उनके पास अनोखे उपाय मौजूद हैं. पाकिस्तान में चल रही अलगाववादी गतिविधियों और अन्य आंतरिक समस्याओं के लिए वह फौज को ज़िम्मेदार ठहराते हैं. इसलिए वह फौज को डिस्मेंटल (विघटित) करने की सलाह देते हैं.

वहीं आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति की वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर मंडरा रहे खतरे से निपटने के लिए वह पाकिस्तान को चार हिस्सों में बांटने की वकालत करते हैं. ब्लूचिस्तान मसले पर उनका कहना है कि ब्लूचिस्तान का इतिहास 1,000 साल पुराना है, इसलिए पाकिस्तान और ईरान के कब्जे वाले ब्लूचिस्तान को अलग मुल्क बना देना चाहिए.

वह यह भी मानते हैं कि ईरानी ब्लूचिस्तान की हालत पाकिस्तानी ब्लूचिस्तान से भी बदतर है. वह अपनी एक और पहचान पंजाबी बताते हैं. तारिक फतह का कहना है कि पाकिस्तान बनने के बाद उत्तर प्रदेश के ज़मींदारों ने पंजाबियों के ऊपर उर्दू थोप दी. एक पंजाबी होने के नाते उनका दर्द समझा जा सकता है कि आज़ाद पाकिस्तान में पंजाबी भाषा को वह हक़ नहीं मिल सका, जो उसे मिलना चाहिए था. लेकिन, यह तस्वीर का केवल एक पहलू है, क्योंकि पाकिस्तान बनने से बहुत पहले पंजाब उर्दू का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था. अल्लामा इकबाल, फैज़ अहमद फैज़, राजेंद्र सिंह बेदी, कृश्न चंदर एवं सआदत हसन मंटो जैसे उर्दू साहित्य की पहली पंक्ति के नामों का संबंध पंजाब से था.

इस सिलसिले में मज़ेदार बात यह है कि आज़ादी के बाद भारत में सबसे अधिक प्रसार संख्या वाला उर्दू अ़खबार हिंद समाचार भारतीय पंजाब से ही निकलता था. इसलिए यह कहना कि पंजाबियों के ऊपर उर्दू थोपी गई थी, ग़लत होगा.

तारिक फतह खुद को मुसलमान कहते हैं, लेकिन मुसलमानों के बुनियादी अकीदे पर भी हमला करने से गुरेज़ नहीं करते. वह कुरान का पुन: संकलन कराना चाहते हैं, क्योंकि उनके मुताबिक, कुरान की आयतों का संकलन उनके नाजिल होने के क्रम में नहीं किया गया. इसमें उन्हें एक का तरह का षड्यंत्र दिखाई देता है. बहरहाल, उन्हें पूरा हक़ है कि वह मुसलमानों के विश्वास और अकीदे पर सवाल खड़ा करें और साथ में यह भी कहें कि वह मुसलमान हैं.

खुद को मार्क्सवादी कहें और अमेरिका के नियो-कॉन (नव रूढ़िवादियों) के खयालात की पैरवी करें. फिलिस्तीनी राज्य की हिमायत भी करें और इजरायल की विस्तारवादी नीति पर खामोशी अख्तियार कर लें. आधुनिक लोकतंत्र में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी है, लेकिन तारिक फतेह का यह कहना कि वह इस्लामोफोबिया विरोधी हैं, आसानी से गले नहीं उतरता, क्योंकि उनके वीडियो और उनके द्वारा संचालित इंटरनेट टीवी चैनलों पर उनके बहुत सारे विचार ऐसे हैं, जो इस्लामोफोबिया को हवा देते हैं.

इसका अंदाज़ा इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि इजरायली अख़बार जेरूसलम पोस्ट भी उनकी आलोचना करने पर बाध्य हो गया. दिसंबर, 2014 में न्यूयॉर्क के दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उन्होंने ट्‌वीट किया कि जिहाद न्यूयॉर्क पहुंच गया. जिस शख्स ने न्यूयॉर्क पुलिस के दो अधिकारियों की हत्या की, उसका नाम इस्माइल अब्दुल्लाह ब्रिन्स्ले था यानी वह मुसलमान था. ऐसे बहुत सारे उदाहरण उनके ट्‌वीटर एवं फेसबुक एकाउंट और यूट्यूब पर पोस्ट किए उनके वीडियो में मौजूद हैं.

तारिक फतेह खुद को भारतीय भी कहते हैं और वह यह मानते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू थे. तकनीकी तौर पर तो वह भारतीय नहीं हो सकते, क्योंकि उनका जन्म पाकिस्तान में हुआ था. लेकिन, चूंकि पाकिस्तान कभी भारत का हिस्सा था, इसलिए वह अपने आपको भारतीय मूल का कह सकते हैं. जहां तक उनके पूर्वजों के हिंदू होने का सवाल है, तो इसके बारे में वही बेहतर बता सकते हैं.

यह हक़ीक़त है कि भारत के अधिकतर मुसलमानों के पूर्वज हिंदू थे, लेकिन यह भी हक़ीक़त है मुस्लिम हमलावरों के साथ बहुत सारे मुसलमान ईरान, अ़फग़ानिस्तान, तुर्की, अरब देशों और मध्य एशिया से भारत आकर बस गए थे. इसलिए कोई अगर यह दावा करे कि उसके पूर्वज अ़फग़ान थे या तुर्क थे या ईरानी थे तो इस पर भी किसी को कोई ऐतराज़ नहीं हो सकता.

बहरहाल, तारिक फतेह पश्चिमी देशों में आबाद मुसलमानों को वहां का मेहमान ख्याल करते हैं. जिस तरह की नसीहत वह पश्चिमी देशों के मुसलमानों को दे चुके हैं और मुसलमानों के व्यवहार के बारे में अपने मेजबानों को बताकर अपनी वफादारी साबित कर चुके हैं, कुछ उसी अंदाज़ में वह अपने भारतीय होने का सुबूत भी देते हैं.

यूट्यूब पर उनका एक वीडियो मौजूद है, जिसका टाइटल है कि भारतीय मुसलमान भारत की सहिष्णुता का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं. उदाहरण के लिए वह मस्जिदों में लाउडस्पीकर से अज़ान और मुंबई के अंडरवर्ल्ड को पेश करते हैं, जिसमें मुसलमानों का वर्चस्व है. इसी तरह भारत में कैसे मुसलमान लुटेरे आए, कैसे उन्होंने भारत को लूटा, वह ये बातें भी बताते हैं.

दरअसल, ये वही मिसालें हैं, जो वह अपनी बात साबित करने के लिए पश्चिम में दे चुके हैं. उनकी बातों से यह भी ज़ाहिर हो रहा है कि भारत में मुसलमान बराबर के नागरिक नहीं हैं या कम से कम भारतीयों में शामिल नहीं हैं, इसलिए वह भारत की सहिष्णुता का ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं.

दरअसल, पश्चिम में जो इस्लामो़फोबिया है, वह उसी नज़रिये से भारतीय समाज को देखना चाहते हैं और एक खास समूह के प्रति अपनी वफादारी साबित करना चाहते हैं. लिहाज़ा उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि तारीक फतह साहब मौक़ा देखकर अपना रंग बदल लेते हैं. अब इन सब बातों में कितनी सच्चाई है, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.

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