जमिया मिल्लिया इस्लामिया मौलाना आज़ाद चेयर के साथ धोखाधड़ी

Maulana-Azad-Chair,भारत के वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी एवं प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना आजाद चेयर के साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पिछले दिनों काफी गैरजिम्मेदाराना और लापरवाही वाला बर्ताव सामने आया. इसकी तस्दीक आरटीआई से मिले दस्तावेज भी करते हैं. पिछले दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2009 में 6 विश्वविद्यालयों में मौलाना आजाद चेयर प्रदान की, जिनमें जामिया मिल्लिया इस्लामिया, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, कश्मीर विश्वविद्यालय, कालीकट विश्वविद्यालय, कोलकाता विश्वविद्यालय और मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के नाम प्रमुख हैं.

बकौल फिरोज बख्त अहमद, सामाजिक कार्यकर्ता, जब जामिया को मौलाना आजाद चेयर प्रदान की गई तो विश्वविद्यालय में बिना जांच-पड़ताल के इसे 2009 से 2014 तक अर्थात्‌ 5 वर्ष तक एक ऐसे व्यक्ति के हवाले कर दिया गया, जिसने इस अवधि में देश के इस सपूत पर एक पृष्ठ का भी कार्य नहीं किया और लगभग सवा लाख रुपये प्रति मास से भी अधिक की मोटी रकम वह डकारता रहा. मजे की बात तो यह है कि इस व्यक्ति का संबंध जामिया के फोटोग्राफी विभाग से है और मौलाना आजाद शोध से इसका दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं है.

विश्वविद्यालय में कोई कहने-सुनने वाला नहीं. c की यह कहावत बिल्कुल सही उतरती है कि माल-ए-मुफ्त दिल-ए-बेरहम!

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग किसी भी मान्य व्यक्ति के नाम में चेयर का संस्थापन इसलिए करता है, ताकि भावी पीढ़ियों को इस व्यक्ति का योगदान याद रहे. इसी प्रकार से जब जामिया को मौलाना आजाद चेयर प्रदान की गई तो इसमें कहा गया था कि यह एक ऐसे व्यक्ति को मौलाना पर शोध कार्य के लिए यह कुर्सी दी जाए, जो समाज में गणमान्य हो. साथ ही विश्वविद्यालय की ओर से एक कमेटी उप कुलपति की निगरानी में बनाई जाती है, जिसमें विशिष्ठ प्रतिनिधि चेयर पर विस्थापित होने वाले व्यक्ति का चयन करते हैं. जामिया में यह सब नहीं किया गया. साथ ही, पांच वर्ष पूर्ण होने पर एक कमेटी इस शोध कार्य की जांच करती है कि यह ठीक तौर से हुआ या नहीं.

बिना किसी चयन कमेटी के जामिया के फोटोग्राफी विभाग के फरहत बसीर खान को मौलाना आजाद चेयर पर विस्थापित कर दिया गया. इसके अतिरिक्त अवधि पूरी होने पर किसी ने नहीं देखा कि क्या काम हुआ है. जो व्यक्ति भी किसी चेयर पर कार्यरत होता है, उसे पांच साल तक कम से कम 1.25 लाख प्रतिमास का वेतन तो दिया ही जाता है, साथ ही साथ उसे और अलग से भी ‘पर्क्स’ भी दिए जाते हैं.बकौल अहमद, जब सूचना का अधिकार के अन्तर्गत उन्होंने 23 जुलाई, 2015 को जामिया को चिट्‌ठी में छ: प्रश्न लिखे तो एक महीना चार दिन गुजर जाने के बाद (जबकि एपिलेट अथॉरिटी को दूसरी चिट्‌ठी देने का समय होता है) जामिया से 27 अगस्त 2015 को जवाब आया, जिसमें केवल तीन प्रश्नों का ही उत्तर दिया गया.

मगर इससे इस बात का पता चल गया कि 5 वर्ष तक मौलाना आजाद चेयर पर कार्यरत व्यक्ति ने 2009 से 2014 तक कोई भी कार्य नहीं किया, यहां तक कि एक पृष्ठ भी नहीं लिख कर दिया मौलाना आज़ाद पर!
वास्तव में जब जामिया से ही इस प्रकार की शिकायतें आने लगीं कि इस चेयर पर कुछ भी नहीं हुआ तो बख्त ने जांच-पड़ताल कर इस बात का निर्णय लिया कि अब न्यायालय का सहारा लेना आवश्यक है. यूजीसी के 25 जुलाई 2011 के पत्र के अनुसार इस चेयर पर कार्य करने के लिए 33.10 लाख रुपये की राशि जामिया को प्रदान कर दी गई थी. इसका अर्थ यह हुआ कि मात्र आजाद चेयर पर कार्य करने के लिए 5 वर्ष में लगभग एक करोड़ 55 लाख रुपए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा दिए गए और बदले में शोध कार्य टांय-टांय फिस्स या कपिल शर्मा की भाषा में बाबा जी का ठुल्लू!
एक और मजे की बात यह है कि यूजीसी ने जामिया में आजाद चेयर के अतिरिक्त और कई चेयर्स भी दी, जिनमें एम के गांधी चेयर डॉ सुजीत दत्ता को दी गई, सैफुद्दीन किचलू चेयर संजॉय हजारिका को दी गई, सज्जाद जहीर चेयर शोहिनी घोष को दी गई (जिनको उर्दू का अलिफ, बे, ते तक नहीं आती), फोर्ड फाउंडेशन चेयर वीणा सीकरी एवं ए एम ख्वाजा चेयर डॉ विनय लाल को दी गई. अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद इन सभी कुर्सियों पर कोई भी कार्य नहीं हुआ. हो सकता है कि ये घोटाले बाद में सामने आएं. जिन वरिष्ठ बुद्धिजीवियों ने इन चेयर्स पर उपर्युक्त नामी व्यक्तियों को अधीन किया, उनमें नामचीन लोग शामिल हैं जैसे-प्रो एस इनायत ए जैदी (डीन, भाषा विभाग), प्रो देवी सिंह (अध्यक्ष, आईआईटी, कानपुर) और डॉ मुकुल केसवन (इतिहास विभाग, जामिया). बख्त ने बताया कि वह अपने अधिवक्ता मु. अत्यब सिद्दीकी द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कराने जा रहे हैं.
(लेखक शिक्षाविद् और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के पौत्र हैं)