मधेशी आन्दोलन बदले की राजनीति की आग में धधकता नेपाल

madeshi-protestपूरा नेपाल हिंसा की आग में जल रहा है. दशकों से सुलग रहे मधेश आन्दोलन ने विकराल रूप ले लिया है. मधेश और थरूहट प्रदेश की मांग को लेकर चल रहा आन्दोलन 24 अगस्त को एकाएक तब हिंसक रूप ले लिया जब कैलाली जिले के टीकापुर में कर्फयू के दौरान सभा कर रहे आन्दोलनकारियों और पुलिस के बीच हुई झडप में दर्जनोंं मौत हो गई. अपुष्ट जानकारी के अनुसार 50 से ज्यादा आन्दोलनकारी मारे गये जबकि एसएसपी लक्ष्मण न्यूपाने सहित दो इन्सपेक्टर और 17 पुलिस जवान मारे गये.

घटना के बावत बताया जा रहा है कि कर्फयू को तोडकर आन्दोलनकारी सभा कर रहे थे. एसएसपी सशस्त्र जवानों के साथ सभा को रोकने पहुंचे. इसी दौरान झडप हो गई और पुलिस ने गोलीबारी कर दी. गोलीबारी में तीन आन्दोलनकारी मारे गये. इसके बाद आन्दोलनकारी इग्र हो गये और पुलिस पर हमला कर दिया. नेपाली समाचार एजेन्सी के अनुसार भीड नें हेड कान्सटेबुल रामवीर थारू को जिंदा जला दिया. आन्दोलन की विकरालता को देखते हुये सेना बुला ली गयी है लेकिन आन्दोलन रूकने का नाम नहीं ले रहा है.

गृह युद्ध जैसे हालात हैं. आन्दोलन फैलता जा रहा है. आन्दोलन की आग नें मधेश क्षेत्र के 22 जिलों को अपने गिरफ्‌त में ले लिया है. सरकारी आदेशों और निषेधाज्ञा का कोई असर नहीं है. लाखों आन्दोलनकारी सडक पर इतर गये हैं. अनियंत्रित हालात को देखते हुए नेपाली सीमा में भारतीयों के प्रवेश पर रोक लगा दिया गया है. इधर भारत के गृह मंत्रालय ने भी नेपाल से सटे इलाकों में फेले हिंसा को देखते हुए भारत-नेपाल सीमा पर सीमा सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया है.

एसएसबी के आला अधिकारी सीमा पर कैम्प कर रहे हैं.आन्दोलन के कारण नेपाल के हालात बिगडते जा रहे हैं. एक पखवारे से चल रहे आन्दोलन के कारण आवश्यक वस्तुओं का निर्यात भारत से पूरी तरह से बन्द है. पेट्रोल, दुध, नमक, दवा, बिस्किट, रसोई गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी हो गई है. बावजूद आन्दोलनकारी थरूहट और मधेश की मांग को लेकर डटे हैं.

वे कैलाली एवं कंचनपुर को मिलाकर थरूहट प्रदेश और मधेश क्षेत्र के शेष जिलों को मिलाकर मधेश प्रदेश बनाने की मांग कर रहे हैं.मधेशी आन्दोलन की सुगबुगाहट तो संविधान मसौदा निर्माण के समय से हीं था. मधेशी और थरूहट समानुपातिक अधिकार की मांग कर रहे थे. जबकि यह भी माना जा रहा था कि इनकी इपेक्षा की जायेगी. नये संविधान के मसौदे में नेपाल में ब्याही गयी भारतीय महिला से जन्में बच्चे को दोयम दर्जे की नागरिकता दिये जाने के प्रावधान किया गया है.

मधेशी इसे अपने मौलिक अधिकारों का हनन मानते हैं. आन्दोलन में इबाल का एक कारण यह भी है. लेकिन ये सभी तात्‌कालिक कारण है. इसके मूल में नेपाल का निरंकुश बा्रहम्णवादी शासन व्यवस्था है. नेपाल के शासन, प्रशासन, राजनीति यहां तक कि मीडिया के इच्च पदों पर पहाडी बा्रहम्णों का एकाधिकार है. स्थिति पर गौर करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा. जनसंख्या के आधार पर पूरे नेपाल में मधेशी 33 प्रतिशत हैं. वहीं जनजाति लोगो की संख्या भी 33 प्रतिशत है.

जनजाति मे मगर, राई, गुरूंग, शेरपा, तमांग, नवार आदि इपजातियां शामिल हैं. वहीं क्षेत्री 16 फिसदी और ब्राहम्णों की आबादी 13 प्रतिशत है. स्पष्ट है कि ब्राहम्णो की संख्या अन्य सभी जातियों से कम है लेकिन सभी क्षत्रों में महत्वपूर्ण स्थानों पर पहाडी ब्राहम्णों का कैंजा है. ऐसे में मधेशी व अन्य लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की नियमावली या नीति निर्धारण में पहाडी ब्राहम्णों का महत्वपूर्ण प्रभाव होता है. पहाडी और तराई के लोगों के संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है.

शुरू से हीं तराई के लोगों द्वारा प्रगतिशील परिवर्तन का प्रयास किया जाता रहा है. तराई के मधेशी और थरूहट के लोग समानुपातिक रूप से राज्य में अपना अधिकार मांगते रहे हैं. नेपाल का माओवादी आन्दोलन भी इससे प्रभावित रहा है. हॉलाकि इन मांगों को कुचलने के लिए तराई क्षेत्र के आन्दोलन को दबाया जाता रहा है.नेपाल के मधेशी क्षेत्र के सलाही क्षेत्र संख्या 6 के सांसद अमरेश कुमार सिंह के अनुसार पहाडियों की ब्राहम्णवादी व्यवस्था हमेशा से मधेशीयों का हक छीनती रही है और आन्दोलन को दबाने का प्रयास करती रही है. सांसद श्री सिंह के अनुसार नेपाल में कुल 36,700 सशस्त्र बल के जवान हैं.

इनमें से 23,000 सशस्त्र बल मधेशी क्षेत्र में पदस्थापित हैं. जबकि मात्र 13,700 सशस्त्र बलों के बूते पूरे नेपाल की सुरक्षा व्यवस्था चलाई जाती है. जबकि चीन से जुडे बडे सीमाई क्षेत्र एवं पूरे पहाडी क्षेत्र के साथ हीं राजधानी काठमाण्डू के लिए यह संख्या पर्याप्त नहीं है. फिर भी इतनी बडी संख्या में मधेशी क्षेत्र में सशस्त्र बलों को केवल मधेशियों पर दबाव बनाकर आन्दोलन को कुचलने के लिए रखा जाता है. इतना हीं नहीं मधेशी क्षेत्र की हमेसा इपेक्षा की गई.

इसके विकास के लिए कभी सार्थक प्रयास नहीं किया गया. मधेशी क्षेत्र विकास मद में बहुत कम राशि निर्गत की जाती है. विगत वर्ष विकास के लिए 37 अरब की राशि का प्रावधान किया गया था, जिसमें पहाडी क्षेत्र के विकास मद में 32 अरब की राशि दी गई. वहीं मधेशी क्षेत्र के लिए मात्र 5 अरब दिया गया. मधेशियों की इपेक्षा की यह एक बानगी है. हर क्षेत्र में इसी प्रकार इपेक्षित रखकर मधेशियों को गुलाम होने का एहसास कराया जाता है.

इतिहास की चर्चा करते हुए सांसद श्री सिंह कहते है कि शुरूआती दौर में 104 वर्ष राणा घराने के शासन में ऐसी स्थिति नहीं थी. इसके बाद साह घराने का शासन हुआ. इसी काल में ब्राहम्णों ने अपना वर्चस्व स्थापित किया. अब सभी महत्वपूर्ण पदों पर कैंजा जमाये है और मधेशी क्षेत्र से केवल रेवेन्यू और वोट चाहते है.

इस संदर्भ में त्रिभुवन विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और डेनमार्क में नेपाल के राजदूत रह चुके विजय कान्त कर्ण के अनुसार इसी वर्ष के प्रारम्भ में 16 देशों के लिए राजदूत प्रतिनियुक्त किया गया , जिसमें सभी पहाडी हैं. सेना के इच्च पदों पर मधेशी क्षेत्र के लोगों की बहाली नहीं की जाती है. देश के 97 प्रतिशत सीडीओ ;जिलाधिकारीद्ध पहाडी ब्राहम्ण हीं हैं. मधेशी क्षेत्र भारत से जुडा हुआ है और आचार-विचार, व्यवहार लगभग एक समान है.

एक दूसरे के बीच बेटी-रोटी का संबंध है. ऐसे में मधेशियों द्वारा जब कभी हक के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए भारत से सहयोग की मांग की जाती है, तब चीन से सहयोग लेने और साथ होने की बात पहाडी ब्राहम्णों द्वारा की जाती है. आज तक मधेश क्षेत्र के लोगो को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है. सांसद अमरेश कुमार सिंह कहते है कि इस बार निर्णायक लडाई लडी जा रही है. मधेश और थरूहट प्रदेश की मांग को लेकर चल रहे आन्दोलन में थरूहान मुक्ति मोर्चा, मधेशी मुक्ति मोर्चा, नवा मुक्ति मोर्चा, लिम्बवान मुक्ति मोर्चा, तंगवान मुक्ति मोर्चा, मगराथ मुक्ति मोर्चा, खसांग मुक्ति मोर्चा, तमसाली मुक्ति मोर्चा के साथ मधेश क्षेत्र के सभी दल एवं संस्थाए एक मंच पर आ गई हैं.

इन्होने बताया कि मधेश की इपेक्षा से जडी खबरों पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाता है. नेपाल के 23 मीडिया घरानों में से 21 पर पहाडियों का कैंजा है. मीडिया द्वारा बातों को तोड मरोड कर परोसा जाता है. कैलाली की घटना के बाद नेपाली राजनीति में हडकंप मच गया है. नेपाल में प्रतिशोधात्मक राजनीति शुरू होने लगा है. कैलाली की घटना के दूसरे दिन हीं पहाडियों द्वारा थारूओं का घर जला दिया गया. लेकिन बीबीसी नेपाली सेवा के पत्रकार ने इस घटना को महज तोड-फोड बताया.

जबकि बतातें हैं कि इस घटना में दर्जनो लोग मारे गए. फिर भी नेपाली मीडिया ने इस घटना को छापने की जहमत भी नहीं इठाई.इसी तरह रौटहत जिला के गौर में आन्दोलनकारी राजकिशोर ठाकुर पुलिस की गोली से घायल हों गये, लेकिन पुलिस इन्हें घेर कर रखी रही. बाद में इलाज के लिए वीरगंज ले जाते हुए इनकी मौत हो गई. इन घटनाओं को प्रतिशोधात्मक कार्यवाई के रूप में देखा जा रहा है. अब मधेशी और थारू आन्दोलनकारियों से ज्यादा आक्रामक सरकार दिख रही है. गृह मंत्री आन्दोलन को दबाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं.

वहीं कैलाली की घटना में सांसद अमरेश कुमार सिंह, राजेन्द्र महतो और इपेन्द्र यादव का नाम भी इछाला जा रहा है. ज्ञात हो कि तीनो नेताओं ने कैलाली में सभा को संबोधित किया था. श्री सिंह के संबध भी गृह मंत्री के साथ अच्छे नहीं रहे हैं. बताया जाता है कि कुछ दिनों पूर्व दोनों के बीच तू तू-मैं मैं भी हुआ था. इधर गृह मंत्री ने अमरेश सिंह द्वारा कैलाली में दिए गए भाषण का आडियो रिकार्ड संसद में पेश कर कार्यवाही की मांग की है. श्री सिह नेपाली कांग्रस के केन्द्रीय सभासद है. कैलाली की घटना पर कांग्रेस ने इनसे स्पष्टीकरण की मांग की है. बहरहाल आन्दोलन हिंसक होकर भयावह होता जा रहा है, जिसका परोक्ष रूप से पडोसी भारत पर भी प्रभाव पडना तय है.

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