मोदी सरकार के ओआरओपी फॉर्मूले से सैन्यकर्मी नाखुश

oropवन रैंक-वन पेंशन की घोषणा ने पूर्व सैनिकों में उम्मीद तो ज़रूर जगाई, पर सरकार के फॉर्मूले से वे असंतुष्ट हैं. उनका कहना है कि यह ओआरओपी के मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं है. सरकार ने पहल तो की, लेकिन साथ में कई अड़ंगे भी लगा दिए. प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वाले पूर्व सैनिकों को ओआरओपी से अलग रखना उन्हें अखर रहा है. उनकी तादाद तक़रीबन 46 फीसद है. पूर्व सैनिकों का कहना है कि पांच वर्ष में समीक्षा की शर्त भी स्वीकार्य नहीं है. अधिकतम पेंशन के बजाय औसत पेंशन को आधार मान सरकार ने एक नई बहस को जन्म दे दिया.

उदाहरण के तौर पर, अलग-अलग वर्षों में लेफ्टिनेंट जनरल पद से रिटायर हुए दो अधिकारियों में से एक की पेंशन साढ़े 36 हज़ार रुपये है और दूसरे की 40 हज़ार रुपये. यदि औसत पेंशन को आधार मानें, तो साढ़े 36 हज़ार रुपये पाने वाला शख्स 38,225 रुपये पर पहुंच जाएगा, जो 40 हज़ार रुपये से फिर भी कम है. एक सदस्यीय समिति पर भी पूर्व सैनिकों को ऐतराज है.

वे पांच सदस्य समिति की मांग कर रहे हैं, जिसमें तीन पूर्व सैनिक, एक सेवारत सैनिक और एक व्यक्ति रक्षा मंत्री द्वारा नामित होना चाहिए. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में देख रहे हैं. वे मानते हैं कि धीरे-धीरे अन्य मसले भी हल हो जाएंगे. देवभूमि पूर्व सैनिक, अर्द्धसैनिक कल्याण समिति के अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर दिनेश चंद्र सकलानी ने कहा कि इस मामले में रक्षा मंत्री की घोषणा से समिति की मांगें पूरी नहीं हुई हैं.

वारंट ऑफिसर बीएस नेगी ने कहा कि वन रैंक-वन पेंशन की जो अवधारणा है, सरकार ने उसके खिला़फ जाकर घोषणा की. साथ ही पांच वर्ष में परीक्षण की बात कहकर इसकी मूलभावना ही बदल दी. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने इस मामले में पूर्व सैनिकों के साथ छल करने की बेजा कोशिश की है, जिसका खमियाजा उसे उठाना पड़ेगा. लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गंभीर सिंह नेगी कहते हैं कि मोदी सरकार की घोषणा वन रैंक-वन पेंशन के मूल स्वरूप के मुताबिक नहीं है.

सरकार के फॉर्मूले में कई खामियां हैं. पांच वर्ष में समीक्षा और प्री-मैच्योर रिटायरमेंट लेने वालों को इससे अलग रखने जैसे अड़ंगे बिना वजह लगा दिए गए. लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) ओपी कौशिक ने कहा कि सेना में वीआरएस जैसा कुछ नहीं है. न्यूनतम सेवा के बाद एक फौजी पेंशन का हक़दार होता है, जिसे प्री-मैच्योर रिटायरमेंट कहा जाता है और ऐसे पूर्व सैनिकों की तादाद तक़रीबन 46 फीसद है. सरकार कह रही है कि उन पर ओआरओपी लागू नहीं होगी.

लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एमसी भंडारी के अनुसार, वन रैंक-वन पेंशन पर अभी तक सब मुंह ज़ुबानी था. अब यह आधिकारिक रूप से सामने है. इसे एक सकारात्मक पहल के रूप में लिया जाना चाहिए. कुछ मसले बचे हैं, वे भी सुलझ जाएंगे. बिग्रेडियर (सेवानिवृत्त) केजी बहल कहते हैं कि प्रत्येक वर्ष लगभग 60 हज़ार सैन्यकर्मी सेवानिवृत्त होते हैं. उन्हीं का रिव्यू सरकार को करना है.

पांच वर्ष में समीक्षा की शर्त डालकर मामले को उलझाया जा रहा है. लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत्त) पीएल पराशर के अनुसार, यह छलावा है. हम 2013 की अधिकतम पेंशन को आधार मानने की बात कर रहे थे, लेकिन सरकार ने औसत पेंशन को आधार माना और उसे अप्रैल 2014 से लागू करने के बजाय जुलाई 2014 से लागू किया. सेवानिवृत्त सूबेदार एवं सेना में धर्मगुरु डॉ. शक्तिधर शर्मा शास्त्री ने कहा कि सरकार ने पूर्व सैनिकों के छल किया है.

सेना में वीआरएस तो होता ही नहीं है, वहां तो पीएमआर (सरकार से अनुमति लेकर अवकाश प्राप्त करना) है. सरकार को इस मामले में राजनीति नहीं करनी चाहिए, यह देश के लाखों पूर्व सैनिकों और देश की रक्षा में प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों की विधवाओं के जीवन से जुड़ा मामला है. देवभूमि पूर्व सैनिक, अर्द्धसैनिक कल्याण समिति, हरिद्वार के उपाध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त हवलदार प्रकाश चंद भट्ट ने कहा कि वन रैंक-वन पेंशन पर सरकार की घोषणा ने पूर्व सैनिकों को निराश किया है. इस मामले में केंद्र सरकार ने पूर्व सैनिकों के साथ राजनीति की है.

दूसरी तऱफ पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि मोदी सरकार सैन्य कर्मियों को लेकर पूरी तरह जागरूक एवं संवेदनशील है. ओआरओपी लागू करना सरकार का एक महत्वपूर्ण क़दम है. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और हरिद्वार के सांसद रमेश पोखरियाल निशंक ने भी सरकार के ़फैसले का स्वागत किया है. वहीं कांग्रेस के दिग्गज नेता सरकार के ़फैसले में मीन-मेख निकाल रहे हैं.