भागलपुर रैलीः माय समीकरण में सेंध की कोशिश

bhagalpur-rallyकोसी और पूर्वी बिहार में अपनी खराब हालत भाजपा शीर्ष नेतृत्व की निगाह में सबसे अहम मुद्दा है. हालांकि सीमांचल में थोड़ी बेहतर स्थिति होने के बावजूद पार्टी के शीर्षस्थ नेता कोई चांस नहीं लेना चाहते हैं. मोदी की रैली में महादलितों, यादवों और अल्पसंख्यकों की मौजूदगी पर विपक्षी गठबंधन की भौहें तन सकती हैं. दरअसल भाजपा ने कोसी और पूर्वी बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करने और माय समीकरण को जोड़ने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पढ़िए भागलपुर रैली के निहितार्थों पर हमारी ग्राउंड रिपोर्ट-

बिहार चुनाव में एक-दूसरे के आमने-सामने दोनों विपक्षी गठबंधनों में बड़ी रैलियां करने की होड़ मची है. दोनों ही गठबंधन अपनी रैलियों को सफल बनाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाए हुए हैं. पटना में महागठबंधन की रैली के बाद भागलपुुुर में नरेंद्र मोदी की परिवर्तन रैली पर सबकी नज़र टिक गई थी. मोदी अच्छे वक्ता हैं और अपनी रैलियों में भीड़ खींचने की ताकत भी रखते हैं. ऐसा हुआ भी. भागलपुर में बड़ा जनसैलाब उन्हें सुनने आया.
उनकी रैली में उमड़ी भीड़ के पीछे भी कई कारण हैं. इसकी एक वजह पटना में हुई महागठबंधन की रैली में मोदी के ़िखला़फ हुई ज़बरदस्त बयानबाज़ी भी मानी जा रही है. पटना रैली में लालू यादव द्वारा किए प्रत्येक व्यंग्य का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी शैली में दिया.

इस रैली से पूर्वी बिहार और सीमांचल की राजनीति असर पड़ सकता है. रैली में भारी संख्या में महादलितों, यादवों और ठीक-ठाक संख्या में अल्पसंख्यकों की मौजूदगी ने यह जता दिया कि लालू यादव के आधार वोट बैंक माय समीकरण में सेंध लगनी शुरू हो गई है. उन्हें माय समीकरण को बरकरार रखने में खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है. मोदी की रैली में अल्पसंख्यकों की मौजूदगी विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात रही. अल्पसंख्यकों को रैली तक खींच के लाने के पीछे शाहनवाज़ हुसैन और अ़फज़र शमशी को श्रेय दिया जा रहा है.

रैली के माध्यम से कोसी और सीमांचल को साधने की कोशिश की गई. शीर्ष भाजपा नेताओं ने ऐसे संकेत भी दिए हैं कि इन क्षेत्रों पर विशेष फोकस किया जाएगा. दरअसल असदुद्दीन आवैसी की एंट्री और पप्पू यादव के मैदान में कूदने के बाद सीमांचल और कोसी का राजनीतिक समीकरण विल्कुल बदल गया है. ऐसे समय में भाजपा के लिए इस रैली का सफल होना मायने रखता है. अब रैली के इंपैक्ट पर चर्चा करते हैं. किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार सीमांचल क्षेत्र में आते हैं. यहां अच्छी खासी मुस्लिम आबादी है. वहीं कोसी के अंतर्गत सहरसा, मधेपुरा और सुपौल आते हैं. यहांं यादव निर्णायक भूमिका में है. ऐसे में मोदी ने जातिवाद और सांप्रदायिकता का जुमला छोड़कर एक तीर से कई शिकार करने की कोशिश की.

दरअसल इस क्षेत्र में भाजपा की साख पूरी तरह दांव पर लगी है. पूर्वी बिहार, जो भाजपा का गढ़ माना जाता है, के भागलपुर, मुंगेर और बांका में पिछले लोक सभा चुनाव में भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया था. कमोवेश वही स्थिति कोसी और सीमांचल में भी है. आश्चर्य की बात है कि सीमांचल इलाके, जहां मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत से भी अधिक है, में भाजपा सेफ जोन में है. यहां 24 विधान सभा सीटों में से 13 पर भाजपा का कब्ज़ा है. कोसी और पूर्वी बिहार में पप्पू यादव का खासा प्रभाव है. भाजपा की रणनीति है कि अगर पप्पू यादव से किसी तरह की बात बनती है तो पूर्वी बिहार और कोसी में अपने खोये जनाधार को फिर से हासिल किया जाए.

वहीं सीमांचल में ओवैसी के चुनावी जंग में कूदने के बाद अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में करने के भी ठोस रणनीति की जा रही है. रैली में मोदी द्वारा पेश किए गए आंकड़े भले ही जनता के समझ मे नहीं आए, लेकिन कार्यकर्ता यह अवश्य समझ गए कि अगर किला फतह करना है तो इन क्षेत्रों में जम कर पसीना बहाना होगा.

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