राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति : नीति आयोग की नीयत बताती एक चिट्ठी

policyयोजना आयोग को शायद अब तक लोग भूल गए होंगे. अब इसकी जगह नीति आयोग ने ले ली है. नीति आयोग यानी नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांस्फॉर्मिंग इंडिया. मतलब यह कि एक ऐसा संस्थान, जो भारत में परिवर्तन लाने का काम करेगा. अब यह कैसा परिवर्तन होगा, किसके लिए परिवर्तन होगा, इस पर अभी भी चर्चा हो रही है. लेकिन, चौथी दुनिया के पास नीति आयोग का एक ऐसा पत्र है, जो उसकी नीयत बताने के लिए काफी है.

यह पत्र नीति आयोग के आईएएस अधिकारी आलोक कुमार, एडवाइजर (हेल्थ) की ओर से स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार डॉ. शीला प्रसाद को लिखा गया है. यह पत्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (नेशनल हेल्थ पॉलिसी-2015) के पुनर्निरीक्षण की मांग को लेकर लिखा गया है. इस पत्र में जो भी तथ्य हैं, वे नीति आयोग की सीईओ की पूर्ण सहमति से लिखे गए हैं.

अब जानते हैं कि इस पत्र में लिखा क्या है? एक लाइन में अगर बात कहनी हो, तो इस पत्र के ज़रिये नीति आयोग यह सलाह दे रहा है कि सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं देने की जो बात सोच रही है, वह ग़लत है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा मजबूत बनाने, मुफ्त दवा-जांच की सुविधा देने की बात है. नीति आयोग ने इस पत्र में सरकार की ओर से निवेश बढ़ाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान देने और मुफ्त दवा-जांच जैसी सुविधा दिए जाने का विरोध किया है.

आयोग ने अपनी तऱफ से यह भी कहा है कि निजी क्षेत्र और बीमा आधारित मॉडल की भूमिका सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में बढ़ाने की ज़रूरत है. नीति आयोग की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सिंधुश्री खुल्लर की सहमति से लिखे गए इस पत्र में नीति आयोग ने बीमा आधारित मॉडलों पर निर्भरता बढ़ाए जाने के साथ-साथ निजी क्षेत्र की भूमिका को भी महत्व दिए जाने की बात कही है.

ज़ाहिर है, नीति आयोग का यह पत्र राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के मक़सद के ठीक उलट है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत जहां सरकार नागरिकों को अपनी ओर से सारी सहूलियतें देने पर विचार कर रही है, वहीं नीति आयोग, जो सरकार को परामर्श देने और देश के विकास के लिए नीति बनाने वाला संस्थान है, सरकार के इस विचार से सहमत नहीं दिख रहा.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में सिफारिश की गई है कि वर्ष 2020 तक स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का 2.5 ़फीसद किया जाना चाहिए और ज़्यादातर निवेश सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में होना चाहिए. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के मुताबिक, निजी क्षेत्र का इस्तेमाल स़िर्फ स्वास्थ्य सेवाओं में उत्पन्न होने वाली कमी दूर करने के लिए किया जाना चाहिए.

इसके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी, इस पर सरकार का विचार है कि सामान्य कर प्रणाली के साथ ही शिक्षा अधिभार (एजुकेशन सेस) की तर्ज पर स्वास्थ्य अधिभार (हेल्थ सेस) लगाया जा सकता है. जबकि नीति आयोग का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के साथ ही निजी क्षेत्र को भी इस सेक्टर में महत्व दिए जाने की ज़रूरत है, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की विशाल मांग पूरी की जा सके.

नीति आयोग के मुताबिक, मुफ्त इलाज या दवा का विचार कारगर साबित नहीं होगा. वर्ष 2002 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में जीडीपी का दो फीसद हेल्थ केयर पर खर्च करने की बात कही गई थी, लेकिन वह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका. नतीजतन, दुनिया भर में इलाज पर अपनी जेब से सबसे ज़्यादा खर्च भारत में होता है. विकसित देशों ने अपने नागरिकों के अनिवार्य इलाज की व्यवस्था की है.

इसके दो प्रचलित मॉडल हैं. ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस, जिसमें सारा इलाज सरकारी अस्पतालों में होता है. वहीं अमेरिका में सबको मेडिक्लेम की सुविधा मुहैया कराई गई है. अब सरकार के सामने दो विकल्प हैं. देखना है कि मौजूदा सरकार इनमें से किस मॉडल का चयन करती है. सवाल यह है कि ऐसे में सरकार स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने का सपना कैसे पूरा कर पाएगी, जबकि देश के भीतर ही नीति आयोग जैसे महत्वपूर्ण संस्थान राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति से सहमत न हों?

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