चिकित्सकीय गुणों से भरपूर है अकरकरा

 

acharyabalkrishnaअकरकरा का पौधा मूल-रूप से अरब का निवासी कहा जाता है इसलिए इसको मोरक्को अकरकरा कहते हैं. भारत के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जाती है. वर्षाॠतु की प्रथम फुहार पड़ते ही इसके छोटे-छोटे पौधे निकलना शुरू हो जाते हैं. इसकी जड़ का स्वाद चरपरा होता है तथा इसको चबाने से गर्मी महसूस होती है व जीभ जलने लगती है. आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव में अरब से आयातित औषधि अधिक वीर्यवान मानी जाती है. आयुर्वेद में इसका प्रयोग लगभग 400 वर्षों से किया जा रहा है.

यद्यपि चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं होता है, तथापि यह नहीं माना जा सकता कि यह बूटी भारतवर्ष में पहले नहीं होती थी. भारतवर्ष में पाई जाने वाली यह औषधि प्राय: तीन प्रकार की होती है.

1-आकारकरभ

इसके छोटे-छोटे क्षुप वर्षा-ॠतु के आरम्भ काल में उत्पन्न हो जाते हैं. शाखाएं, पत्र और पुष्प सफेद बाबूना के समान होते हैं, किन्तु इनके डण्ठल कुछ पोले होते हैं. तना और शाखाएं रूएदार होती हैं. ये शाखाएं एक तने या डाली में से निकल कर कई भागों में विभक्त हो जाती हैं. इसकी जड़ में एक प्रकार की सुगन्ध होती है. इसकी जड़ 2.5-10 सेमी लंबी और 5-20 सेमी मोटी तथा वजनदार होती है. मूल छाल मोटी, भूरी तथा झुर्रीदार होती है.

अन्य वनस्पतियों का गुण-धर्म तो एक वर्ष में नष्ट हो जाता है, परन्तु इस असली अकरकरा मूल का गुण धर्म 7 वर्षों तक प्राय: जैसे का तैसा रहता है. इसको मुख में चबा लेने से अन्य कटु, तिक्त रस वाली औषधियों का स्वाद मालूम नहीं होता. महाराष्ट्र में इसकी डंडी का अचार और शाक बनाकर खाया जाता है.

2-भारतीय अकरकरा

यह 30-60 सेमी ऊंचा, वर्षायु, शाकीय पौधा है. इसका काण्ड सीधा अथवा आरोही, अत्यधिक पुष्ट एवं मांसल, रोमश, आधार उच्चाग्र भूशायी अत्यधिक अथवा अल्प रोमश होता है. इसके पत्र साधारणत:  विपरीत, अंडाकार-भालाकार, त्रिकोणाकार-अण्डाकार होते हैं. इसके पुष्प पीले अथवा रक्ताभ भूरे वर्ण के अण्डाकार अथवा दीर्घायत अंतस्थ पुष्पगुच्छों में होते हैं. इसके फल चपटे, पृष्ठ भाग पर सम्पीडित, अधोमुख अण्डाकार से त्रिकोणीय, कृष्ण वर्ण के होते हैं.

अकरकरा की उपरोक्त उल्लेखित प्रजातियों के अतिरिक्त नामक एक प्रजाति और पाई जाती है, जिसका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है, परन्तु यह अल्प गुण युक्त होती हैं.

3-दीर्घवृन्त अकरकरा

यह शाखा प्रशाखायुक्त, चिकना, सीधा अथवा आरोही लगभग 30 सेमी लम्बा शाकीय पौधा होता है. इसके पत्ते वृंतयुक्त, अण्डाकार या भलाकार 2-4 सेमी लम्बे, 1-2.5 सेमी चौड़े तथा शीर्ष पर नुकीले होते हैं. इसके पुष्प दीर्घवृन्त युक्त पीतवर्ण के होते हैं. इसके पुष्पों का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है. इसके फूलों की मिलावट अकरकरा के पुष्पों से की जाती है तथा कई स्थान पर अकरकरा के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है. इसके पुष्पों का क्वाथ बनाकर गरारा करने से दंतशूल तथा कण्ठशूल का शमन होता है. इसके पुष्पों का चूर्ण बनाकर दांतों पर रगड़ने से दंतशूल का शमन होता है.

रासायनिक संघटन

इसके मूल में ऐनासाईक्लिन, पाईरेथ्रीन, पेलीटोरिन, एनेट्रीन, हाइड्रोकेरोलिन, टैनिन, डिहाइड्रो ऐनासाइक्लिन, ऐल्कामाइड्स, इन्युलिन, वाष्पशील तैल एवं सीसेमिन पाया जाता है.

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

आकारकरभ

-यह बलकारक, कटु, लालास्रावजनक, प्रदाहकारक, नाड़ी को बल देने वाला, कामोद्दीपक, वेदनास्थापक तथा प्रतिश्याय और शोध को नष्ट करता है.

-इसकी मूल हृदयोत्तेजक, रक्तिमाकारक तथा बलकारक होती है.

-यह सुक्ष्मजीवाणुरोधी कीटनाशक, कृमिदंत, दंतशूल, ग्रसनीशोथ, तुण्डीकेरी शोथ, पक्षाघात, अर्धांगघात, जीर्ण नेत्ररोग, शिरशूल, अपस्मार, विसूचिका, आमवात तथा टाइफस ज्वरनाशक होता है.

-इसके बीज में अल्प गर्भस्रावक प्रभाव दृष्टिगत होता है.

भारतीय अकरकरा

-यह रस में कटु, उष्ण, रूक्ष तथा वातपित्तकारक होती है.

-यह लालास्राववर्धक, उत्तेजक, दीपन, कफिन  सारक, स्वेदक, पाचक, उदरशूल तथा ज्वरनाशक होती है.

-इसका पुष्प कटु, तापजनक, कफनिस्सारक, वेदनाहर, स्वेदजनन एवं ज्वरहर होता है.

औषधीय प्रयोग मात्रा एवं विधि

शिरो रोग

1-मस्तक पीड़ा(शिर:शूल) अकरकरा की जड़ या फूल को पीसकर, हल्का गर्म करके ललाट(मस्तक) पर लेप करने से मस्तक की पीड़ा का शमन होता है.

2-अकरकरा के फूल को दांतों के बीच में रखकर चबाने से जुकाम के कारण होने वाला सिर दर्द मिटता है. इसको चबाने से दाढ़ की पीड़ा मिट जाती है. एक बार के प्रयोग के लिए एक फूल या थोड़ा कम पर्याप्त होता है.

नेत्र रोग

जीर्ण चक्षुरोग-2-4 बूंद अकरकरा मूल स्वरस को नाक में डालने से पुराने नेत्ररोग तथा सिर के दर्द में लाभ होता है.

नासा रोग

पीनस-2-4 बूंद अकरकरा स्वरस को नाक में डालने से पीनस तथा जुकाम, आधासीसी व अन्य ऊर्ध्वजत्रुगत रोगों में लाभ होता है. यह तीक्ष्ण है, बच्चों व सुकुमार लोगों को थोड़ा पानी मिलाकर इसका प्रयोग करना चाहिए.(अकरकरा स्वरस के लिए ताजी जड़ का प्रयोग करें इससे जीर्ण प्रतिश्याय में भी अत्यंत लाभ होता है)

मुख रोग

दंतशूल-अकरकरा मूल या पुष्प और उसका दसवांभाग कपूर लेकर थोड़ा-सा सेंधानमक मिलाकर, पीसकर मंजन करने से सब प्रकार की दंत पीड़ा का शमन होता है.

2-मुख दुर्गन्ध-अकरकरा, माजुफुल, नागरमोथा, भुनी हुई फिटकरी, काली मिर्च तथा सेंधानमक सबको बराबर मिलाकर बारीक पीस लें, इस मिश्रण से प्रतिदिन मंजन करने से दांत और मसूड़ों के सभी विकारों में लाभ होता है तथा मुख की दुर्गन्ध मिट जाती है.

3-दंतशूल-अकरकरा के पुष्पों को चबाने से दांत के दर्द में लाभ होता है व मुख की दुर्गन्ध मिटती है.

4-अकरकरा के पुष्पों का प्रयोग हनुशोथ व दांत में कीड़ा लगने या दांतों की पीड़ा, मसूड़ों की सूजन आदि में भी अत्यंत लाभकारी होती है.

5-अकरकरा मूल या पुष्प, हल्दी तथा सेंधानामक को पीसकर उसमें थोड़ा सरसों का तेल मिलाकर दांतों पर मलने से दांत के दर्द का शमन होता है, साथ ही मुख दुर्गन्ध व मसूढ़ों की समस्या भी दूर होती है. यह एक चमत्कारिक प्रयोग है.

6-दंतरोग-अकरकरा की मूल को चबाने से तथा काढ़े का कवल एवं गण्डूष धारण करने से दंतकृमि (दांत में कीड़ा लगना), दांत दर्द आदि दंत रोगों तथा वातजन्य मुख रोगों में लाभ होता है.

कण्ठ रोग

1-कंठ्य-अकरकरा चूर्ण को 250-500 मिग्रा की मात्रा में सेवन करने से बच्चों और गायकों का कंठ स्वर सुरीला हो जाता है. अकरकरा मूल या अकरकरा फूल को मुंह में रखकर चूस भी सकते हैं यह कण्ठ के लिए बहुत लाभकारी है.

2-कण्ठरोग-तालु, दांत और गले के रोगों में अकरकरा के काढ़े से कुल्ला करने पर बहुत लाभ होता है.

वक्ष रोग

1-हिचकी- आने पर आधा से एक ग्राम अकरकरा मूल चूर्ण को शहद के साथ चटाएं. हिचकी पर यह चमत्कारिक असर दिखता है.

2-श्‍वास-अकरकरा के कपड़छान चूर्ण को सूंघने से श्‍वास में लाभ होता है.

3-खासी-अकरकरा (2 ग्राम) एवं सोंठ (1 ग्राम) का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सुबह-शाम पीने से पुरानी खांसी मिटती है.

4-अकरकरा चूर्ण को 1-2 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से कफज विकारों में लाभ होता है.

हृदय रोग

1-दो भाग अर्जुन की छाल और एक भाग अकरकरा मूल चूर्ण, दोनों को मिलाकर, पीसकर दिन में दो बार आधा-आधा चम्मच की मात्रा में खाने से घबराहट, पीड़ा, कम्पन और कमजोरी आदि हद् विकारों में लाभ होता है.

2-कुलंजन, सोंठ और अकरकरा की 2-5 ग्राम मात्रा को 100 मिली पानी में उबालें, जब चतुर्थांश काढ़ा शेष रह जाए तो इस काढ़े को नियमित रूप से पिलाने से घबराहट, नाड़ीक्षीणता, हृदय कार्य शिथिलिता आधि हृद् विकारों में अत्यंत लाभ

होता है.

उदर रोग

1-उदर रोग-अकरकरा मूल चूर्ण और छोटी पिप्पली चूर्ण को समभाग लेकर उसमें थोड़ी भुनी हुई सौंफ मिलाकर, आधा चम्मच सुबह शाम भोजनोपरांत खाने से उदररोगों में लाभ

होता है.

2-मंदाग्नि(अफारा)- शुंठी चूर्ण और अकरकरा दोनों को 1-1 ग्राम की मात्रा में लेकर सेवन करने से मंदाग्नि और अफारा में लाभ होता है.

प्रजनन संस्थान रोग

1-मासविकार-अकरकरा मूल काढ़ा बनाकर 10 मिली काढ़े में चुटकी भर हींग डालकर कुछ माह सुबह-शाम पीने से मासिकधर्म ठीक होता है. इससे मासिकधर्म के दिनों में होने वाली पीड़ा का शासन शमन होता है.

2-इन्द्रिय शिथिलिता -20 ग्राम अकरकरा मूल को लेकर उसका चतुर्थांश क्वाथ बना लें, अब इस क्वाथ के साथ 10 अकरकरा मूल को पीसकर पुरुष जननेंद्रिय(शिश्‍न) लेप करने से इन्द्रिय शैथिल्यता का शमन होता है. लेप कुछ घण्टों तक लगा रहने दें, लेप लगाते समय शिश्‍न के ऊपरी भाग(मणी) को छोड़कर लगाएं.

अस्थि संधि रोग

1-गृध्रसी-अकरकरा के मूल चूर्ण को अखरोट के तेल में मिलाकर मालिश करने से गृध्रसी में लाभ होता है.

2-वातरोग-अकरकरा के मूल कल्क तथा काढ़े का लेप, सेंकाई, धावन आदि रूपों में बाह्य-प्रयोग करने से आमवात(एक प्रकार का गठिया), लकवा तथा नसों की कमजोरी में लाभ होता है.

त्वचा रोग

1-पामा-भारतीय अकरकरा के 5 से 7 ग्राम पंचांग का क्वाथ बनाकर प्रभावित स्थान को धोने से खुजली तथा छाजन में लाभ होता है.

2-व्रण-अकरकरा के मूलार्क को घावों में या मूल को पाउडर कर घाव के ऊपर लगाने से घाव जल्दी भरता है व संक्रमण होने की सम्भावना भी नहीं रहती है.

3-कण्डू- अकरकरा के ताजे पत्र व फूल को पीसकर लगाने से दाद, खाज तथा खुजली में लाभ होता है.

मानस रोग

1-अपस्मार-अकरकरा के फूल या जड़ को सिरके में पीसकर मधु मिलाकर 5-10 मिली की मात्रा में चाटने से मिर्गी का वेग रुकता है.

2-ब्राह्मी के साथ अकरकरा की जड़ का काढ़ा बनाकर पिलाने से मिर्गी में लाभ होता है. मिर्गी में मोरक्को वाली अकरकरा ज्यादा कार्य करती है.

3-मंदबुद्धि-अकरकरा मूल और ब्राह्मी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनाएं, इसको आधा चम्मच या लगभग 1-2 ग्राम लेकर शहद के साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से बुद्धि तीव्र होती है.

4-हकलाना- 2 भाग अकरकरा मूल चूर्ण, 1 भाग काली मिर्च व 3 भाग बहेड़ा छिलका लेकर पीसकर रखें, उसे 1-2 ग्राम की मात्रा में दिन में दो से तीन बार शहद के साथ बच्चों को चटाने से टॉन्सिल में लाभ होता है. जिह्वा पर मलने से जीभ का      सूखापन और जड़ता दूर होकर हकलाना या तोतलापन कम होता है. 4-6 हफ्ते या कुछ माह तक प्रयोग करें.

5-पक्षाघात-अकरकरा मूल को बारीक पीसकर महुए के तेल या न मिलने पर तिल के तैल में मिलाकर प्रतिदिन मालिश करने से पक्षाघात(लकवा) में लाभ होता है.

6-अकरकरा मबल चूर्ण(500 मिग्रा-1ग्राम) को मधु के साथ प्रात: सायं चाटने से पक्षाघात(लकवा) में लाभ होता है.

7-अर्दित-उशवे के साथ अकरकरा का 10-20 मिली क्वाथ करके पिलाने से अर्दित(मुंह का लकवा) में लाभ होता है.

8-अकरकरा चूर्ण और राई के चूर्ण को बारीक पीसकर, मिलाकर प्रतिदिन मालिश करने से अर्धांगवात में लाभ होता है. यदि शरीर में शुष्कता ज्यादा हो या बाल झड़ते हों, तब थोड़ा राईं का तैल भी मिलाकर मालिश करें. यह अनुभूत व अत्यंत लाभकारी प्रयोग है.

9-अकरकरा मूल को धीरे-धीरे चबाने से अर्दित में लाभ होता है. 1 से 2 ग्राम सूक्ष्म चूर्ण को शहद में मिलाकर या गर्म पानी में सुबह-शाम लेने से अर्दित में लाभ होता है.

10-अपस्मार-अकरकरा के मूल चूर्ण को प्रतिदिन दो बार मधु के साथ सेवन करने से मिर्गी में लाभ होता है.

सर्वशरीर रोग

1-ज्वर-अकरकरा की जड़ के चूर्ण को जैतून के तैल में पकाकर मालिश करने से पसीना आकर बुखार उतर जाता है. आवश्यकता के अनुसार यह प्रयोग कई दिन तक किया जा सकता है.

2-अकरकरा के 500 मिग्रा चूर्ण में 4-6 बूंद चिरायता अर्क मिलाकर सेवन करने से बुखार में अत्यंत लाभ होता है.

3- 1 ग्राम अकरकरा मूल, 5 ग्राम गिलोय तथा 3-5 पत्र तुलसी को मिलाकर काढ़ा बनाकर दिन में 2-3 बार देने से जीर्ण ज्वर, बार-बार होने वाले बुखार व सर्दी लगकर आने वाले बुखार में अत्यंत लाभ होता है.

4-अकरकरा से निर्मित ज्वरघ्नी गुटिका का सेवन करने से ज्वर में लाभ होता है.

रसायन वाजीकरण

1-वाजीकरण-अश्‍वगंधा, सफेद मसूली तथा अकरकरा मूल को समान भाग लेकर महीन पीसें. नित्य प्रात: व सायंकाल एक-एक चम्मच एक कप दूध के साथ लेने से इसका प्रभाव वाजीकारक होता है.

2-1 ग्राम आकारकरभादि चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से यह शुक्र का स्तम्भन करता है.

प्रयोज्यांग: पुष्प, पंचांग एवं मूल

मात्रा : स्वरस 5-10 मिली, पुष्प 1-2 ग्राम.

प्रशस्त(उत्तम) अकरकरा के लक्षण-प्रशस्त अकरकरा भारी (वजनदार) और तोड़ने पर भीतर से सफेद होती है. यह स्वाद में अत्यंत तीक्ष्ण होती है. इसको चबाने से मुख और जीभ में बहुत तेज और एक विचित्र ढ़ंग की सनसनाहट होने लगती है तथा मुंह का शोधन हो जाता है. जो अकरकरा वजन में हल्की, तोड़ने पर अन्दर कुछ पीला या भूरापन लिए होती है तथा इसकी झनझनाहट कम और थोड़ी-देर तक होती है, वह अकरकरा औषधि कार्य हेतु अप्रशस्त होती है.

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