नीरा राडिया की अंतरंग दुनिया झूठ, फरेब और ब्लैकमेल

nira-radiaदो साल बाद इयान स्मिथ को स्वयं खुद के अनुभव से नीरा के सच का पता चला. वह मुझसे मिले और बताया कि नीरा ने उन्हें भी धोखा दिया है. उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि कैसे नीरा ने उन्हें यह समझाया था कि उसने मुझे पैसे दे दिए हैं. दिसंबर 2000 में इंग्लैंड में मेरे, नीरा और केएलएम के बीच एक बैठक तय हुई. नीरा ने बैठक में दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसके बाद भी कई बार डेर्बीशायर ने केएलएम अधिकारियों की उपस्थिति में मेरे और नीरा के बीच आमने-सामने की मुलाकात तय कराने की कोशिश की, लेकिन हर बार नीरा इंकार करती रही. 2002 तक केएलएम को पता चल गया था कि उसे नीरा ने धोखा दिया है. नीरा की साख केएलएम की निगाह में ़खत्म हो चुकी थी. नीरा में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह मेरा सामना कर सके.

नीरा जानती थी कि मैं अगर चाहूं, तो उसके खला़फ अभी भी एक ताकतवर हथियार इस्तेमाल कर सकता हूं यानी उसकी एक रिकॉर्डिंग. जब वह एक बार मेरे दफ्तर में आई थी, तब की एक रिकॉर्डिंग मेरे पास थी, जिसमें नीरा ने कहा था कि उसने खुद सारा पैसा रख लिया था और उसके लिए उसने माफी भी मांगी थी. दिसंबर 2000 तक नीरा केएलएम की विश्वासपात्र बनी रही, तब तक केएलएम ने नीरा को भारत में अपनी क़ानूनी लड़ाई कैसे लड़नी है, इसके लिए पूरी तरह से अधिकृत किया था. लेकिन, संदेह की बात यह थी कि 1999 में नीरा ने मुझसे कहा था कि केएलएम के साथ उसका रिश्ता खत्म हो गया है.

मेरे लिए यह जानना मुश्किल था कि नीरा से मुझे मिल रहे निर्देश क्या अंतिम थे? लेकिन कुछ भी हो, मेरे हर एक काम का बिल तो आ ही रहा था. असल में नीरा बहुत चालाकी से केएलएम को हैंडल कर रही थी. केएलएम के पैसों से एक सुपर रिच की तरह जीवन जीना उसकी ज़रूरत थी. यूके में एक असफल महिला उद्यमी बनने के बाद से नीरा को भारत में स्थापित होने में केएलएम ने मदद की थी. मैंने नीरा के व्यक्तिगत मामले में कोई फीस नहीं ली थी, लेकिन नीरा ने केएलएम से भारी फीस वसूली.

2002-03 के दौरान केएलएम के अधिकारियों को नीरा की चालाकी का पता चलने लगा. इसके बाद वे लोग मुझमें भरोसा दिखाने लगे और इस बात को समझ गए कि नीरा ने हम दोनों को धोखा दिया है. जॉन डेर्बीशायर, इयान स्मिथ और एक महिला, जो इस पूरे मामले की जांच के लिए उत्तरदायी थे, मुझसे मिले और इस बात पर सहमत हो गए कि मेरी फीस के 5,50,000 यूएस डॉलर मुझे अब तक नहीं मिले हैं. वे इस मसले को सुलझाना चाहते थे. क़ानूनी तरीके के तहत उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं उनके ़िखला़फ अपने पैसों के लिए एक मुक़दमा दाखिल करूं.

उसके आधार पर केएलएम नीरा के ़िखला़फ ब्रिटिश अदालत में कार्रवाई कर सकती थी. मैंने यह सलाह मानते हुए एक मुक़दमा दाखिल किया. मेरे मित्र विजय एसटी शंकर दास, जो लंदन में ही थे, मुझे सलाह देते रहे. 2002 में केएलएम मुश्किल हालात का सामना कर रही थी. उसे मेरे 5,50,000 यूएस डॉलर भी देने थे, जबकि इतना पैसा वह पहले ही नीरा को दे चुकी थी. इससे पहले उसे सतीश मोदी की ओर से परेशान होना पड़ा था. वह हर तऱफ से हारी हुई नज़र आ रही थी.

2004 में लंदन में एक बैठक हुई, जिसमें शंकर दास भी मौजूद थे. केएलएम की ओर से मौजूद महिला प्रतिनिधि ने राज खोलने शुरू किए. उसने बताया कि केएलएम नीरा के ़िखला़फ कोई क़दम उठाने से इसलिए बच रही है, क्योंकि वह इस विवाद के अलावा भारतीय अधिकारियों और केएलएम के बीच कई द्विपक्षीय समझौतों में शामिल रही है. उसके पास कई संवेदनशील दस्ताव़ेज थे और वह केएलएम को ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रही थी. उसी वक्त मुझे पता चला कि नीरा मेरी फीस का दस गुना पैसा तभी वसूल चुकी थी, जब अदालत के आदेश पर एयरक्राफ्ट यहां से रिलीज हुए थे.

नीरा ने केएलएम से जमकर पैसा वसूला था, यह कहकर कि भारतीय अधिकारियों को बड़ी मात्रा में पैसा देना पड़ रहा है, ताकि एयरक्राफ्ट रिलीज कराए जा सकें. मैं चकित था. मैंने वहां उपस्थित लोगों को बताया कि अब तक डीजीसीए या क़ानून मंत्रालय में मेरी व्यक्तिगत साख रही है, उसी वजह से एयरक्राफ्ट रिलीज हो सके और इसके लिए किसी को भी बेवजह एक पैसा देने की ज़रूरत नहीं पड़ी. मैंने उनसे सीधे पूछा कि जब उनके पास मेरा बैंक खाता विवरण था, तो सीधे मुझे पैसे देने के बजाय उन्होंने नीरा को पैसे क्यों दिए? जवाब था कि उनका भरोसा नीरा में था. खैर, दस वर्षों के बाद (सात वर्षों तक मुक़दमा चला) केएलएम (यूके) ने मेरी फीस मुझे दे दी. लेकिन, तब तक मुझे प्रति डॉलर 30 रुपये का ऩुकसान हो चुका था.

जारी…
(आर. के. आनंद मशहूर वकील और क्लोज एनकाउंटर्स विद नीरा राडिया के लेखक हैं.)