सऊदी अरब महिला अधिकारों को लेकर संजीदा

ISLAMसऊदी अरब में महिलाओं को नगर निगम चुनावों में बतौर उम्मीदवार भाग लेने का अधिकार दिया गया है. सऊदी अरब के स्वर्गीय शासक शाह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अपने शासनकाल में पहली बार महिलाओं को वोट देने का अधिकार और इसके बाद उन्हें नगर निगम के चुनावों में बतौर उम्मीदवार हिस्सा लेने का भी प्रस्ताव दिया था. इस मुद्दे पर वर्तमान सुल्तान सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अंतिम निर्णय ले लिया है. दिसंबर में होने वाले नगर निगम चुनावों में महिलाएं भी हिस्सा लेंगी. इस चुनाव के लिए 70 महिलाओं ने अपने नाम दर्ज कराये हैं.

सरकार के इस निर्णय पर विभिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. अख़बार ‘अलअरबिया’ में प्रसिद्ध राजनीतिक स्तंभकार अब्दुरर्हमान राशिद लिखते हैं कि देश में महिलाओं से संबंधित निरंतर प्रयास हो रहे हैं. छठे दशक तक यहां लड़कियों की शिक्षा की कल्पना गुनाह थी, लेकिन स्वर्गीय शाह फहद के दौर में लड़कियों के लिए शिक्षा के दरवाज़े खुले. जब स्वर्गीय अब्दुल्लाह का दौर आया तो उन्होंने देश में लड़कियों के लिए न केवल विभिन्न यूनिवर्सिटीज स्थापित कीं, बल्कि जामिया अब्दुल्लाह में क्लासरूम के अन्दर लड़के और लड़कियों को एक साथ पढ़ने की अनुमति भी दी गई.

सऊदी महिलाओं के लिए नौकरी करना प्रतिबंधित था, लेकिन अब अस्पतालों में डॉक्टर से लेकर नर्स तक की ज़िम्मेदारियां सऊदी महिलाएं बख़ूबी निभा रही हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मजलिस-ए-शूरा में 20 प्रतिशत महिलाओं को शामिल करने का प्रस्ताव है. ज़ाहिर है एक ऐसे देश में जहां महिलाओं को ड्राइविंग तक की अनुमति नहीं थी, ऐसे देश में अगर उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाती है तो यह एक बड़ा राजनीतिक परिर्वतन है, लेकिन सवाल यह है कि क्या जमीनी स्तर पर इस पर अमल हो सकेगा.

‘अलअरबी 21’ में डॉक्टर टॉकर, डिप्टी मैनेजर ‘बैतुल हुरैया’ लिखती हैं कि क़ानूनी रूप से फैसला तो कर लिया गया है, लेकिन व्यवहारिक रूप से देश में जो माहौल है, उसमें महिलाओं का आगे आना बहुत मुश्किल नज़र आ रहा है, क्योंकि सऊदी अरब के समाज में पुरुषों का वर्चस्व है. महिलाएं अपनी इच्छा से कोई क़दम नहीं उठा सकती हैं. वह चुनाव से लेकर किसी भी निर्णय में अपने पति, भाई और पिता की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं करती हैं.

वह वही करेंगी, जो समाज का मर्द चाहेगा. क़तर के ‘अरब न्यूज़ चैनल’ की वेबसाइट पर एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी मानवाधिकार के कार्यकर्ता का विचार है कि महिलाओं को पहली बार वोट का अधिकार प्राप्त हुआ है, इसलिए उनकी राय पर अभिभावकों, पति या भाइयों की राय हावी होगी और उनके प्रस्ताव पर वोट दिये जा सकते हैं. इसलिए यह कहना मुश्किल है कि वह चुनाव को सही तौर पर प्रोमोट कर सकें. वह वही करेंगी, जो घर का मर्द चाहेगा और इस प्रकार से समाज पर पुरुष का ही वर्चस्व क़ायम रहेगा.

बैरूत से प्रकाशित होने वाला एक अख़बार ‘अलमुलाहिज़’ लिखता है कि दशकों बाद सऊदी अरब की सरकार को यह एहसास हुआ है कि समाज में पुरुष और महिलाओं में समानता के बिना विकास नहीं हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं कि नगर निगम में महिलाओं की भागीदारी की जो बात कही गई है, वह समानता के लिए नहीं, बल्कि सऊदी अरब के अंदरूनी कलह और आये दिन होने वाले महिला अधिकारों की अवहेलना के ख़िला़फ देश और विदेश में उठने वाली आवाज़ से नज़र फेरने के लिए है. अगर सरकार की नीयत सा़फ होती तो ड्राइविंग लाइसेंस और बिना महरम के विदेशी सफर करने जैसे मामलों में उन्हें आज़ादी दी जाती.

एक दूसरा अख़बार ‘अख़बार अलअरबी’ लिखता है कि सरकार का हाल ही में लिया गया निर्णय केवल लॉलीपॉप है. हालांकि महिलाओं को नगर निगम में चुनाव लड़ने का अधिकार दिया गया है और यह कहा जा रहा है कि अब महिलाएं नगर निगम से संबंधित टैक्स, विकास और आर्थिक मामलों से संबंधित निर्णय लेने की हक़दार हो जाएंगी, लेकिन घटना की गहराई से जायज़ा लिया जाये तो पता चलता है कि महिलाओं को चुनावों में भागीदार बनने का जो अधिकार दिया गया है, उसके बाद भी अगर वह इस चुनाव में जीत जाती हैं तो उनके पास कोई अधिकार नहीं होगा और समाज में मर्दों को जो वर्चस्व प्राप्त है, वह ज्यों का त्यों रहेगा.

वह ऐसे कि सऊदी अरब में नगर निगम को कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है. न तो कोई क़ानून बनाने का अधिकार प्राप्त है, न ही निगम के लिए पैकेज पास करने और न ही विकास कार्यों के लिए सरकार से बजट पास कराने का अधिकार ही प्राप्त है. यह सभी निर्णय मजलिस-ए-शूरा की ओर से किये जाते हैं और इसकी अनुशंसा एडवाइज़री कमेटी करती है. मजलिस-ए-शूरा में 150 सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति सुल्तान करते हैं.

नगर निगम के लिए जो क़ानून बनाये जाते हैं, उस क़ानून बनाने वाली समिति का गठन भी सुल्तान ही करते हैं. इससे यह बात सा़फ हो जाता है कि सऊदी सरकार में सभी अधिकार सुल्तान के पास हैं और किसी भी क़ानून की अनुशंसा करने, उसकी निगरानी या लागू करने का अधिकार या तो सलाहकार समिति और कैबिनेट के पास है या फिर मजलिस-ए-शूरा के पास. इसके अलावा धार्मिक मामलों में भी नगर निगम को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है.

इसकी देख-रेख अमर बिल मारू़फ और न ही अलमुनकिर की ओर से किया जाता है और इसकी निगरानी मुफ्ती आम अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल्लाह करते हैं. यहां तक कि अगर ये महिलाएं जीत कर नगर निगम की प्रतिनिधि बन भी जाती हैं, तो भी इनके पास न तो डेवलपमेंट का कोई अधिकार होगा, न ही टैक्स का और न ही धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप का. ऐसी स्थिति में इन्हें प्रतिनिधि चुने जाने के बाद भी सिर से पैर तक ख़ुद को ढक कर ही क्षेत्र की सेवाएं करनी होंगी.

फिर यह कि देश में पुरुषों में वर्चस्व का एहसास पाया जाता है. इसके अलावा वहां के पुरुष महिलाओं के साथ काम करने में हिचकिचाहट महसूस करते हैं. अगर यह महिला प्रतिनिधि क्षेत्रीय अधिकारियों को प्रतिनिधि के रूप में काम करने का निर्देश देंगी तो पुरुष इसे अपना अपमान समझेंगे और इस प्रकार से सरकार के कामकाज में रुकावट पैदा होगी. एक और बात है, जिसको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सऊदी अरब के माहौल में घर के पुरुष इस बात को पसंद नहीं करते हैं कि उनकी महिलाएं गैर पुरुषों के साथ किसी दफ्तर या संस्था में काम करें. अब अगर वह जीत कर नगर निगम में पहुंच भी जाती हैं तो घर के पुरुषों के दबाव में वह अपना काम सही तौर पर नहीं कर पाएंगी. इस स्थिति के बारे में कहा जा सकता है कि क़ागजों में फैसला हो जाने के बावजूद व्यवहारिक रूप से इसे लागू करने के लिए सरकार को अभी बहुत कुछ करना होगा.

जब तक समाज में पुरुष और महिला की समानता का भाव पैदा नहीं होगा, उस समय तक महिलाओं के सही प्रतिनिधित्व की कल्पना नहीं की जा सकती. रियाज़ में सऊद यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र की स्कॉलर फौज़िया ख़ालिद कहती हैं कि सरकार का यह कदम अच्छा है, साथ ही यह महिला अधिकारों के संबंध में एक बड़ा परिवर्तन भी है. लगता है, देश एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन की ओर चल पड़ा है.

उनका कहना है कि सऊदी अरब की महिलाओं में काम करने की काफी ललक है. यहां की स्त्रियां मर्दों की तरह देश के लिए कुछ करना चाहती हैं. इसका सबूत यह है कि 70 महिलाओं ने बतौर उम्मीदवार और 80 महिलाओं ने चुनाव प्रबंध मामलों में काम करने में रुचि दिखाई है. महिलाओं का चुनावों में हिस्सा लेने का अधिकार स्वागतयोग्य है.

अभी तक सऊदी अरब में शाही व्यवस्था क़ायम है, लेकिन इस निर्णय के बाद महसूस हो रहा है कि यह देश अब निरंतर लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है और महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं. अगर देश में वास्तव में लोकतांत्रिक तर्ज़ पर चुनाव हों और लोकतंत्र का अमल शुरू हो तो महिलाओं को भी आगे आने और अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिलेगा.

वसीम रशीद

वसीम रशीद के पास इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मिडीया का 20 वर्षो का अनुभव है.उन्होंने रेडियो और टीवी के लिए कईराजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक लोगों के साक्षात्कार लिए है और देश के अहम् उर्दू समाचार पत्रों और साप्ताहिक एवं मासिक पत्रिकाओं में लिखती रही हैं. और कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों और संगोष्ठियों में शिरकत कर चुकी है. पिछले 4 वर्षों से राष्ट्रीय सहारा उर्दू से जुड़ी रही है. चौथी दुनिया उर्दू अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक में उन पर संपादक (उर्दू) की जिम्मेदारी है.
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वसीम रशीद

वसीम रशीद के पास इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मिडीया का 20 वर्षो का अनुभव है. उन्होंने रेडियो और टीवी के लिए कई राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक लोगों के साक्षात्कार लिए है और देश के अहम् उर्दू समाचार पत्रों और साप्ताहिक एवं मासिक पत्रिकाओं में लिखती रही हैं. और कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों और संगोष्ठियों में शिरकत कर चुकी है. पिछले 4 वर्षों से राष्ट्रीय सहारा उर्दू से जुड़ी रही है. चौथी दुनिया उर्दू अंतर्राष्ट्रीय साप्ताहिक में उन पर संपादक (उर्दू) की जिम्मेदारी है.