बेटों के भरोसे विरासत बचाने की कवायद

rjdकैमूरांचल

विधानसभा चुनाव की धमक सुनाई देते ही राजनीतिक विश्लेषकों की नज़र कैमूरांचल के दिग्गजों पर जा टिकी है, जो अपनी राजनीति की दूसरी पारी अपने बेटों के सहारे शुरू कर विरासत बचाने में जुटे हैं. कुछ राजनीतिक दिग्गजों के बेटे बगावत की राह पकड़ कर विरासत हथियाने का खेल भी खेल रहे हैं. इस नज़रिये से कैमूरांचल की कुल 11 विधानसभा सीटों में से रामगढ़, चैनपुर, मोहनियां, काराकाट एवं दिनारा की सीटें अति महत्वपूर्ण हैं.

मोहनियां सीट 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के बाद छेदी पासवान ने खाली की थी, तब वहां से वह जदयू के विधायक हुआ करते थे. उपचुनाव में सांसद की मंशा भाजपा के टिकट पर अपने परिवार के किसी सदस्य को लड़ाने की थी, लेकिन ऐन वक्त पर राजद छोड़कर भाजपा में शामिल हुए निरंजन राम ने बाजी मार ली और भाजपा नेतृत्व ने निरंजन राम को मैदान में उतार दिया, जिससे छेदी पासवान को मन मसोस कर रह जाना पड़ा. हालांकि, उनके भतीजे चंद्रशेखर पासवान ने घर में ही बगावत करके जदयू का दामन थामा और उन्हें मोहनियां से टिकट भी मिला, लेकिन चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को बड़े अंतर से जीत हासिल हुई.

हालांकि, चंद्रशेखर प्रसाद को लगभग 42 हज़ार मत मिले, जो जदयू का एक बेहतर रिकॉर्ड है.

इस चुनाव के बाद सांसद पुत्र रवि पासवान ने राजनीति में सक्रियता दिखाई और अपने सांसद पिता के साथ-साथ उनकी तस्वीर भी बैनरों-पोस्टरों पर दिखने लगी. उनका निशाना चेनारी विधानसभा सीट है, जहां प्रदेश रालोसपा के कार्यकारी अध्यक्ष ललन पासवान एनडीए प्रत्याशी के रूप में पहले से ही ताल ठोंक रहे हैं. देखना यह है कि चेनारी विधानसभा सीट पर सांसद की दावेदारी मजबूत पड़ती है या गठबंधन धर्म का पालन होता है.

ग़ौरतलब है कि ललन पासवान इस सीट से दो बार विधायक रहे हैं और दो बार काफी कम अंतर से चुनाव हारे हैं. दूसरी महत्वपूर्ण सीट रामगढ़ है, जहां राजद के कद्दावर नेता एवं पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद के विश्वसनीय साथी जगदा बाबू की पकड़ खासी मजबूत बताई जाती है. उनके बेटे सुधाकर सिंह ने घर में बगावत कर पिछली बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था. लेकिन, जगदा बाबू ने पार्टी धर्म का पालन किया और उन्होंने राजद प्रत्याशी अंबिका यादव को जिताने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया.

अंतत: अंबिका यादव विधायक निर्वाचित हुए. फिर भी सुधाकर सिंह की राजनीतिक सक्रियता जारी रही. इसी बीच भाजपा ने जदयू के ज़िलाध्यक्ष एवं पिछले विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर देने वाले अशोक सिंह को अपने पाले में शामिल कर लिया. इस बार भाजपा का टिकट पाने के लिए अशोक सिंह और सुधाकर सिंह में कांटे की टक्कर चल रही है. बीच में पूर्व प्रत्याशी एवं नुआंव के प्रखंड प्रमुख अभय सिंह तीसरा कोण बनाने की फिराक में हैं. यहां बगावत की राह पकड़ कर भाजपा से राजनीति शुरू करने वाले सुधाकर सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.

तीसरी विधानसभा सीट रोहतास की काराकाट है, जहां से सहकारिता नेता स्वर्गीय तपेश्वर सिंह के पौत्र एवं आरा की पूर्व सांसद मीना सिंह के बेटे विशाल सिंह अपनी राजनीतिक पारी शुरू करने की कोशिश में हैं. क्षेत्र के लगातार दौरे बता रहे हैं कि विशाल सिंह अपने परिवार से जुड़े पारंपरिक मतदाताओं को एकजुट करने में लगे हैं. वह मतदाताओं को कितना समझा-रिझा पाते हैं, यह अलग बात है.

रोहतास की दिनारा विधानसभा सीट भी इस परिवार और तपेश्वर सिंह के सबसे छोटे बेटे रंजीत सिंह के लिए एक चुनौती है, जहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए वह दिल्ली, पटना और दिनारा एक किए हुए हैं. कैमूर की चैनपुर विधानसभा सीट से पिछली बार राजद उम्मीदवार के रूप में तत्कालीन सांसद महाबली सिंह के बेटे धर्मेंद्र सिंह चुनाव लड़े थे, जिन्हें  हार का सामना करना पड़ा था. इस बार अपनी यह परंपरागत सीट बचाने के लिए महाबली सिंह स्वयं मैदान-ए-जंग में उतरने का मन बना चुके हैं.

रोहतास की नोखा विधानसभा सीट पर कई वर्षों तक कब्जा जमाए बैठे पूर्व मंत्री जंगी चौधरी और उनके बेटे आनंद मोहन सिंह के परिवार से भी किसी सदस्य के चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट है. हाल में आनंद मोहन सिंह की पार्टी कार्यक्रम में हुई मौत के बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने ऐसे संकेत भी दिए हैं. यानी कुल मिलाकर कैमूरांचल की 11 में से सात सीटों पर विभिन्न राजनेताओं के परिवारीजन विरासत की जंग लड़ते दिखाई देंगे.

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