अध्यात्म से समाजशास्त्र और राजनीति तक की यात्रा कराता है ब्रह्मास्त्र

bharamsastraआशीष भारती एक ऐसे लेखक हैं, जिनपर सांख्य-योग के प्रवर्त्तक महर्षि कपिल का गंभीर प्रभाव है. विद्वानों ने माना है कि सांख्य-दर्शन मानव-मस्तिष्क की क्षमता का अब तक का श्रेष्ठतम उपयोग का फ़लित है. इसमें मानवीय बौद्धिक-क्षमता की अद्भुत शक्ति को देखा और समझा जा सकता है. लेखक की मान्यता है कि सांख्य-दर्शन अंतिम दर्शन है. इसके आगे कोई विचार हो नहीं सकता.

इस संबंध में सांख्य-दर्शन की ठीक-ठीक समझ रखने वाले विद्वान, जो अन्य दर्शनों के प्रखर अध्येता और चिंतक हों, वे ही इस संबंध में स्थिर मत दे सकते हैं. किंतु मेरी दृष्टि में, किसी भी संबंध में, किसी भी बात को अंतिम मान लेना, आगे की संभावनाओं को सदा-सदा के लिये समाप्त कर देना है. अस्तु विचारों में नयापन का होना, काल की गति की सापेक्ष-दृष्टि का परिचायक है, और वांछित भी.

नोवेल्टी एण्ड कम्पनी से से प्रकाशित पुस्तक ब्रह्मास्त्र में, लेखक ने अपनी बौद्धिक-क्षमता का प्रयोग, अपने संचित ज्ञान और भारत के विगत एक हज़ार वर्षों के इतिहास के अध्ययन के आधार पर, एक निराले ही अंदाज में करते हुए, भारत की वर्तमान समस्या को समझने की कोशिश की है. समस्याओं के निदान के प्रसंग में कुछ स्पष्ट मार्ग देने के प्रयास में लेखक अवश्य सफ़ल नही दिखते हैं, किंतु अपनी सीमाओं में, उन्होंने समस्याओं की पड़ताल करने का प्रयास अवश्य किया है.

लेखक की मान्यता है कि भारतीय संस्कृति की मूल-शक्ति, उसका वैदिक-ज्ञान है. इसी ज्ञान को महर्षि कपिल ने सांख्य-दर्शन के रूप में और परिस्कृत रूप में रखा, किंतु इस दर्शन के गूढ़ार्थ को समझने में बाद का मनुष्य असफल रहा, अथवा इस दर्शन के संबंध में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई गयी. भारतीय संस्कृति की उदारता के कारण अन्य अनेक विचार और दर्शन भी भारत में, अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हीं नहीं फलित भी हुए.

कई विचार विभिन्न मानव-जाति के भारत में प्रवेश के कारण भी आये और इन विचारों ने भी भारतीय संस्कृति में अपना स्थान बनाने में सफ़लता प्राप्त की. यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि इसने अपना स्वरूप सामासिक रखा और अन्यविचारों के प्रति सहिष्णु भी रही. भारत की इसी विशालता ने संसार के सभी विचारों को अपने में समेट लिया और सबके मेल से इसकी विशाल सामासिक संस्कृति और अधिक परिस्कृत हुई.

किंतु लेखक का मत है कि, भारत की इसी उदार दृष्टि ने, अनेक ऐसे विचारों को भी भारत में प्रवेश का मार्ग प्रदान कर दिया, जिससे इस राष्ट्र की बड़ी क्षति हुई और आज भी हो रही है. लेखक का यह विचार संकीर्णतापूर्ण परिलक्षित होता है. लेखक के इन विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता, किंतु वर्णित परिस्थिति में उनका तर्क कुछ सीमा तक इस पर विचार करने का आग्रह अवश्य रखता है.

अत्यंत बौद्धिक-चिंतन का संदर्भ और तदनुरूप भाषा का प्रयोग पुस्तक के अनुकूल कहा जा सकता है, किंतु अनेक-स्थलों पर वर्ण-संयोजन की भूल भी मिलती है. किसी विद्वान से वर्ण-संयोजन की त्रुटियां दूर कर इसका प्रकाशन किया गया होता तो सुधी पाठकों को पुस्तक और आकर्षक लगती.

लेखक के निराले ढंग का प्रभाव भी इस पुस्तक के कलेवर और तेवर में दिखाई देता है. कुल 288 पृष्ठों की पुस्तक एक मात्र अध्याय में पूर्ण की गयी है. मूल शीर्षक के अतिरिक्त न तो इस पुस्तक में कोई एक भी उपशीर्षक है और न ही खण्ड-विराम. यही कारण है कि, कई प्रसंगों में पुनरावृत्ति भी मिलती है.

कुल मिलाकर यह पुस्तक, भारत की आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक संदर्भों के साथ इसकी अनमोल चिंतन-धारा को समझने में सहायक है और प्रबुद्ध पाठकों के लिये प्रचूर सामग्री भी प्रदान करती है. इस दृष्टि से इस पुस्तक को मूल्यवान और लाभकारी माना जा सकता है.