सरेया अख्तियार की सूनी गलियां बिहार के हर गांव की यही कहानी है

 

bihar-electionबिहार विधानसभा चुनाव को लेकर मीडिया में भले ही तूफान मचा हो, रेडियो और अख़बारों में अंधाधुंध प्रचार हो रहा हो, लेकिन सारण के गांवों में चुनाव को लेकर कोई विशेष उत्साह नहीं है. बिहार के लोग राजनीतिक तौर पर परिपक्व हैं. वे किसी के झांसे में नहीं आते, वे नेताओं के वादों-आश्‍वासनों की सच्चाई भलीभांति समझते हैं. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैकेज, नीतीश कुमार के सुशासन और लालू यादव के सोशल जस्टिस की असलियत जानते हैं.

वे इससे भी वाकिफ हैं कि बिहार में सरकारें चलती कैसे हैं. पैकेज, सुशासन और सोशल जस्टिस की ऊहापोह के बीच चौथी दुनिया की टीम एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री के गांव पहुंची. यह गांव गोपालगंज ज़िले के बरौली विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है. हमने लोगों से बातचीत कर वहां की हालत और समस्याओं का जायजा लिया.

सरेया अख्तियार गांव में सन्नाटा पसरा है, सड़कें सूनी पड़ी हैं, घरों के दरवाजे दिन में भी बंद रहते हैं. गांव के ज़्यादातर लोग अब यहां नहीं रहते. रोजी-रोटी की तलाश में कोई दिल्ली में है, तो कोई सूरत में, तो कोई विदेश में. जिस तरह यह गांव बाहर से नीरस नज़र आता है, ठीक वैसी ही निराशा विधानसभा चुनाव को लेकर यहां के लोगों में है. सरकार, राजनीतिक दलों एवं नेताओं की विश्‍वसनीयता इस कदर ख़त्म हो चुकी है कि लोगों को उनसे कोई उम्मीद तक नहीं बची है.

इस गांव के लोग अपना मुकद्दर अपने हाथों से लिख रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं और अपना भविष्य संवार रहे हैं. इस इलाके के ज़्यादातर गांवों की यही कहानी है. इलाके की ज़मीनी सच्चाई जानने के बाद नेताओं के चुनावी जुमलों और आश्‍वासनों पर हंसी आती है. उन ज्ञानी विश्‍लेषकों की बातें हवा-हवाई सी लगती हैं, जो कहते हैं कि प्रजातंत्र एवं चुनाव के ज़रिये सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास हो सकता है. सारेंया अख्तियार गांव बिहार के गोपालगंज ज़िले के मांझागढ़ ब्लॉक में है.

यह मुस्लिम बाहुल्य इलाका है. सरेया में भी मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी है. क़रीब साढ़े तीन सौ परिवारों और 2,000 के आसपास आबादी वाला यह एक बड़ा गांव है. यहां के ज़्यादातर मकान पक्के हैं, एक सुंदर मस्जिद भी है. दोपहर (ज़ोहर) की नमाज के वक्त इसमें दस-बाहर लोग ही नज़र आए. गांव में काफी साफ़-सफाई है, गंदगी का नाम-ओ-निशान नहीं है, गांव की गलियों में गाय-बकरियां या मुर्गे घूमते नज़र नहीं आते. इलाके के दूसरे गांवों की तरह यहां ग़रीबी नहीं है.

यह गांव बाहर काफी समृद्ध नज़र आता है. दरअसल, इसके पीछे किसी सरकारी इमदाद का कमाल नहीं है. हक़ीक़त यह है कि इस गांव में जो कुछ अच्छा है, वह यहां के लोगों की मेहनत की बदौलत है. और, जो कुछ नहीं है, वह सरकारों की लापरवाही और उदासीनता का प्रमाण है.

इस गांव के ज़्यादातर युवा बाहर रहते हैं. गांव में कुछ ही लोग बचे हैं, जो सरकारी नौकरी करते हैं या फिर उनका अपना व्यवसाय है. इस गांव में ऐसा कोई परिवार नहीं है, जिसका कोई सदस्य बाहर नौकरी न करता हो. इस गांव के 150 से ज़्यादा युवक सऊदी अरब, अमीरात एवं कुवैत में मज़दूरी करते हैं और क़रीब 150 लोग सूरत की विभिन्न कपड़ा मिलों में काम करते हैं. इसके अलावा रा़ेजगार के लिए यहां के नौजवानों का देश के अन्य शहरों की ओर भी पलायन हुआ है.

वे साल-दो साल में गांव आते हैं और फिर वापस चले जाते हैं. परिवार उनके द्वारा भेजे गए पैसों से ही चलता है. उन्हीं के पैसे से गांव का हर मकान पक्का हो गया. घर-गांव में पैसा तो आ गया, लेकिन उसकी एक बड़ी क़ीमत हर रोज़ चुकानी पड़ती है. घर और गांव की रौनक चली गई है. रोजी-रोटी के सवाल ने परिवार को परिवार नहीं रहने दिया. बूढ़े मां-बाप बिना बेटे के, पत्नी बिना पति के और

छोटे-छोटे बच्चे बिना पिता के जीवन बिता रहे हैं. इस गांव में ऐसा कोई नहीं है, जिसके चेहरे पर शिकन न हो, ज़िंदगी से शिकायत न हो. गांव वाले बताते हैं कि पंद्रह-बीस साल पहले इस गांव में एक-दो घर छोड़कर सारे मकान कच्चे थे, लेकिन रौनक भरपूर थी, तब यह एक ज़िंदा गांव था.

यहां के जो लोग जीविका के चलते देश के विभिन्न हिस्सों में या विदेश गए, वे अकुशल (अनस्किल्ड) हैं, मजदूरी करते हैं. दूसरी समस्या यह है कि इन सबके परिवार यहीं गांव में रहते हैं. कुछ लोग ईद-बकरीद में आते हैं, लेकिन परिवार के साथ त्योहार मनाना सबके नसीब में नहीं होता.

इन सवालों पर गांव के बुजुर्गों की आंखें डबडबा जाती हैं. सच है, भला कौन नहीं चाहता कि त्योहार में पूरा परिवार साथ हो. रुंधी आवाज़ में एक बुजुर्ग ने कहा कि अगर यहीं कोई रा़ेजगार या नौकरी होती, तो बच्चे क्यों बाहर जाकर दुनिया की ठोकरें खाते. सारण के ज़्यादातर मुस्लिम बाहुल्य गांवों की यही कहानी है. परिवार गांव में रहता है, लेकिन परिवार चलाने वाला काफी दूर. हर राजनीतिक दल के नेता-कार्यकर्ता इन गांवों में वोट मांगने आते हैं. सबको इन परिवारों का

दु:ख-दर्द मालूम है. उन्हें यह भी पता है कि बिहार के ना़ैजवान रोजी-रोटी की ख़ातिर घर-गांव छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों मजबूर हैं. लेकिन, देश की राजनीतिक जमात इतनी बेरहम और अमानवीय हो चुकी है कि उसका ध्यान इस तरफ़ जाता ही नहीं है. लगता है, यह बिहार का नसीब बन गया है. चुनाव होते रहेंगे, सरकारें बनती-गिरती रहेंगी, मुख्यमंत्री बनते-बदलते रहेंगे और नौजवान घर-गांव छोड़कर रोजी-रोटी के लिए अन्यत्र पलायन करते रहेंगे.

शिक्षा व्यवस्था के नाम पर इस गांव में स़िर्फ एक प्राइमरी स्कूल है, जो डे़ढ साल पहले खुला है. पढ़ाई जारी रखने के लिए गांव के बच्चों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. सबसे नज़दीक कॉलेज 10 किलोमीटर की दूरी पर है. ऐसा नहीं है कि यहां के लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं. इस गांव के कई लोग पढ़ाई करके भी अपनी किस्मत बनाई. उन्होंने अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय एवं जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) में शिक्षा हासिल की और आईपीएस बने, बनारस विश्‍वविद्यालय में लेक्चरर बने, पत्रकार बने.

लेकिन, ऐसी किस्मत सरेया अख्तियार के सभी बच्चों की नहीं है. सवाल यह है कि अगर स्कूल नहीं होंगे, तो बच्चों का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा? इलाके में बड़े किसान नहीं हैं, इसलिए जीविका के लिए खेतों पर निर्भर नहीं हो सकते. इस गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तक नहीं है. गांव वाले बताते हैं कि 1992 में यहां के लिए सड़क का प्रस्ताव मंजूर हुआ था, तबसे लेकर अब तक बिहार में हर विचारधारा और मॉडल की सरकार आई, लेकिन इस गांव के हिस्से में सड़क नहीं आई. दबी ज़ुबान से, लेकिन शिकायती लहजे में एक बुजुर्ग ने कहा कि यह गांव मुसलमानों का है, इसलिए सड़क नहीं बनी. गांव के बगल से

ग़ुजरने वाली सारी सड़कें बन गईं, लेकिन सारेंया की नहीं. एक और समस्या है बिजली. सरकार चाहे जो दावा करे, लेकिन हक़ीक़त यह है कि सरेया और आसपास के गांवों में स़िर्फ पांच-छह घंटे बिजली रहती है, वह भी दिन के समय. शाम होते ही बिजली चली जाती है और पूरी रात गांव वालों को अंधेरे में गुज़ारनी पड़ती है.

सरकार की तरफ़ से पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं है. ज़मीन का पानी दूषित हो चुका है. गांव वालों ने पानी की जांच कराई, तो पता चला कि गांव और इलाके का पानी मनुष्यों के पीने लायक नहीं है. जो ग़रीब हैं, वे उसी दूषित पानी को पीने के लिए मजबूर हैं. जिनके पास पैसा है, वे आरओ लगाकर पानी पी रहे हैं. दूषित पानी से बीमारियां भी होती हैं, लेकिन इतने बड़े गांव में अस्पताल तो दूर, एक डिस्पेंसरी तक नहीं है.

इलाज कराने के लिए लोगों को 20 किलोमीटर दूर सीवान जाना पड़ता है. महिलाओं के लिए प्रसव केंद्र भी नहीं है. ग़रीब परिवारों की महिलाएं घर में प्रसव के लिए मजबूर हैं. लोगों ने बताया कि आशा नामक एक एजेंसी है, जो ऐसे वक्त में महिलाओं को

अस्पताल लेकर जाती है, लेकिन उसके लिए भी पैसे देने पड़ते हैं. सरकार की इस आपराधिक लापरवाही ने सारेंया अख्तियार के लोगों को एकजुट कर दिया है. अगर किसी की तबीयत बिगड़ती है, तो गांव के लोग मदद करने में पीछे नहीं रहते. पूरा गांव खड़ा हो जाता है. हिंदुस्तान के गांव वाले भी अजीब होते हैं, हर कमी को अपनी ताकत बना लेते हैं.

राजनीतिक तौर पर इस इलाके में सरेया अख्तियार का काफी महत्व है. यह बिहार के बड़े नेता अब्दुल गफूर का गांव है. वह एक जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वह कई बार जेल गए. फिर कांग्रेस पार्टी में सक्रिय रहे. वह बिहार के अकेले मुस्लिम मुख्यमंत्री (जुलाई, 1973 से अप्रैल, 1975) रहे. वह राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मिनिस्टर रहे. आज उनके घर पर ताला लगा हुआ है. गांव में उनके रिश्तेदार आज भी हैं.

सोचने वाली बात यह है कि जब एक पूर्व मुख्यमंत्री-केंद्रीय मंत्री के गांव की हालत ऐसी है, तो बिहार के बाकी गांवों की तस्वीर कैसी होगी? न स्कूल, न स्वास्थ्य सेवाएं, न पानी, न बिजली और न युवाओं के लिए रा़ेजगार का कोई अवसर. स्वर्गीय अब्दुल गफूर के रिश्तेदार 82 वर्षीय महमूद आलम कहते हैं कि कोई भी नेता कुछ नहीं करता, हर कोई अपने लिए राजनीति करता है. चाचा जी (अब्दुल गफूर) हर चुनाव में वोट देने गांव आते थे और बाहर से ही चले जाते थे.

किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ती थी. अब्दुल गफूर की मृत्यु 2004 में हुई. उसके बाद उनके पोते राजनीति में आए. वह कांग्रेस पार्टी में हैं, लेकिन न कभी चुनाव जीत सके और न सरेया अख्तियार के लोगों का दिल. अब्दुल गफूर के एक अन्य रिश्तेदार (चचेरे पोते) शमीम  आलम कहते हैं कि इस गांव के लोगों को सरकार और किसी भी नेता से कोई उम्मीद नहीं है. गांव के लोग अपने दम पर अपना विकास करने में भरोसा रखते हैं.

बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. हर राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से लोगों को भ्रमित करने के लिए उन बातों को तरजीह दे रहा है, जिनसे वोट मिलते हैं. कोई स्पेशल पैकेज का लालच देकर, तो कोई सुशासन का झांसा देकर, तो कोई ग़रीब-गुरबों को बोलने की ताकत देने की बात कहकर लोगों को बहलाने-फुसलाने की कोशिश कर रहा है. जनता त्रस्त है. सरकार है, जो समस्याओं को समझना नहीं चाहती. योजनाएं हैं, जो जनता तक पहुंचती नहीं.

सरकारी तंत्र से जुड़े ऊपर से लेकर नीचे तक के लोग आलीशान गाड़ियों में हॉर्न बजाते हुए ऐसे ग़ुजरते हैं, मानो जनता को चिढ़ा रहे हों. अगले एक महीने में बिहार में फिर से जाति और धर्म का खेल होगा. टेलीविजन पर ज्ञान बांटने वाले बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, प्रजातंत्र के ज़रिये सामाजिक और आर्थिक विकास की रटी-रटाई बातें दोहराएंगे. लेकिन, इस चुनाव में भी वही होगा, जो हमेशा से होता रहा है. बिहार, खासकर उसके गांवों की असल समस्या पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, रा़ेजगार के अवसर की है. लोगों का भरोसा वर्तमान तंत्र से उठता जा रहा है. यह एक चिंताजनक स्थिति है.

सरेया अख्तियार बिहार के उन चंद गांवों में से है, जहां के लोगों ने अपनी मेहनत से अपनी तकदीर संवारी है. इस गांव के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया. मुश्किल से चार-पांच लोगों के पास सरकारी नौकरी है, बाकी पूरा गांव किसी सरकारी मदद के बगैर संघर्ष कर रहा है. देश चलाने वाले नेताओं और अधिकारियों से पूछा जाना चाहिए कि देश में चल रही सौ से अधिक

योजनाओं से क्या हासिल हो रहा है? क्या देश के युवाओं की यही नियति है कि वे अपना घर-परिवार और गांव छोड़कर ज़िंदगी भर दर-दर की ठोकरें खाते फिरें. क्या यही है वह विकास का मॉडल, जिसमें कोई अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा न कर सके, पत्नी-बच्चों के साथ जीवन न बिता सके और घर चलाने वाला स़िर्फ छुट्टियां मनाने के लिए अपने घर-गांव जाएगा? यह सारेंया अख्तियार की खुशकिस्मती है कि यहां के लोग अपने घर वालों को पैसे भेज पाते हैं. बिहार में ऐसे कई गांव हैं, जहां के

हज़ारों-लाखों लोग रोजी-रोटी के लिए घर-परिवार छोड़कर देश के दूसरे शहरों में या विदेश तो चले गए हैं, लेकिन वे पैसे कमाकर भेजने की स्थिति में नहीं हैं. गांव में उनके परिवारों का क्या हाल होता होगा, यह सोचकर भी दिल दहल जाता है. सरकार चलाने और विकास का आख़िर यह कैसा मॉडल है, जिसमें ज़िंदगी ही सजा बन गई है?

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎