लालाराम-श्रीराम के अपराध की सजा बेहमई ने भुगती

journlismजब एक स्त्री डाकू बदला लेने पहुंचती है-2

यमुना नदी के दोनों तरफ़ कानपुर व जालौन ज़िलों में मेव ठाकुरों के कुल 72 गांव हैं. कहते हैं कि ये औरंगजेब के जमाने में मेवाड़ से इस क्षेत्र में आए थे. तब इनके 84 गांव थे. शरीर से खूब तंदुरुस्त मेव ठाकुरों के अनोखे रीति-रिवाज थे. मसलन इनके यहां शादियां आपस में ही होती थीं. फिर समय बदला और कुछ ने अपने को इन रिवाजों से अलग कर लिया. लेकिन अभी भी मेव ठाकुरों के 72 गांवों में यह रिवाज चल रहा है और इनकी आपस में ही रिश्तेदारियां हैं.

इन्हें दादी ठाकुर भी कहते हैं. लालाराम व श्रीराम भी, जिनकी तलाश में फूलन बेहमई गई थी, दादी ठाकुर ही हैं और पड़ोस के गांव दमनपुर के रहने वाले हैं. उनकी बेहमई में कई रिश्तेदारियां हैं. क्षेत्र में फैली चर्चा के अनुसार,, बेहमई गांव लालाराम-श्रीराम का मुख्य अड्डा है. इसका कारण गांव में उनकी रिश्तेदारियां और गांव का भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होना है.

बेहमई की घटना को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा. इस पूरे अंचल में डकैतों के तीन क्षेत्र हैं. पहला है एटा, मैनपुरी, आगरा व इटावा के इलाके, दूसरा आगरा एवं इटावा के राजस्थान से जुड़े व मध्य प्रदेश से लगे क्षेत्र और तीसरा है कानपुर, जालौन, हमीरपुर एवं इटावा ज़िले. इस पूरे क्षेत्र में चंबल व यमुना के अलावा कुंवारी, पहुंज तथा बेतवा ने भयानक बीहड़ बनाया है, जिसमें डाकुओं को निरापद आश्रय मिलता है.

छविराम, पोथी तथा मलखान पहले व दूसरे क्षेत्र के डाकू हैं. छविराम व पोथी यादव हैं तथा मलखान मिर्धा राजपूत. क्षेत्र नंबर तीन में दो साल पहले डाकुओं के गिरोह आपस में बंटे हुए थे, जिन्हें विक्रम मल्लाह ने बाद में आपस में मिला दिया था. विक्रम के जीते जी इस इलाके में मुस्तकीम ही दूसरा बड़ा डाकू था, लेकिन वह भी विक्रम से मिलकर ही अपनी योजनाएं बनाता था. इस समय तक क्षेत्र में कोई बंटवारा नहीं था.

विक्रम को समाप्त करने के लिए कानपुर के पुलिस इंस्पेक्टर श्यामवीर सिंह राठौर ने एक चाल चली. उन्होंने विक्रम के गिरोह में शामिल मेव राजपूत लालाराम व श्रीराम से सजातीय आधार पर संपर्क साधा. दोनों ने पुलिस के समर्थन का आश्‍वासन पाकर अपनी ससुराल बैरामऊ में सोए हुए विक्रम व उसके साथी बारेलाल को मार दिया तथा फूलन को लेकर भाग गए. साथ में सात आदमी और थे.

सभी नौ लोगों ने बाइस दिनों तक फूलन के साथ बलात्कार किया. इसी क्रम में फूलन को बेहमई में भी रखा गया. बेहमई यमुना के किनारे है तथा यमुना के ठीक दूसरी तरफ़ मल्लाहों का गांव है, पालगांव. अपने कैद की तेइसवीं रात में शौच करने गई फूलन यमुना में कूद गई और तैरकर पालगांव जा पहुंची. वहीं से उसने मुस्तकीम से संपर्क किया तथा मुस्तकीम के गिरोह में शामिल हो गई. जब मुस्तकीम को पूरी बात का पता चला, तो वह क्रोध से फुंफकार उठा. एक बार वह

लालाराम व श्रीराम का पता लगाने अकेले भी बेहमई गया, लेकिन गांव वालों ने उसे कुछ भी बताया नहीं. मुस्तकीम की मौत अभी हाल में यानी चार मार्च को एक पुलिस मुठभेड़ में हुई. बहरहाल, अब फूलन की ज़िंदगी का लक्ष्य हो गया लालाराम व श्रीराम सहित उसके सातों आदमियों की हत्या कर अपने अपमान का बदला लेना. विक्रम की हत्या का बदला लेना तो केवल उसका एक हिस्सा था. उस रा़ेज फूलन ही पहरे पर थी, जब विक्रम की हत्या हुई.

इधर पुलिस इंस्पेक्टर राठौर ने दूसरा खेल खेला. उन्होंने विक्रम को मुठभेड़ में मार डालने का दावा कर दिया.लालाराम व श्रीराम इस धोखे से बौखला उठे. उन्हें डर हो गया कि भेद न खुल जाए, इसलिए पुलिस उन्हेें मार देगी. अत: उन्होंने पुलिस से मिलना-जुलना बंद कर दिया. फूलन के भाग जाने पर अब उन्हें जो भी मल्लाह मिलता, उसे वे पुलिस का जासूस समझते तथा मार देते. पालगांव के ही एक मल्लाह को उन्होंने मार दिया, क्योंकि उन्हें शक था कि वह मुखबिरी करता था.

खालला गांव के एक गड़रिये को भी उन्होंने इसी उन्माद में मार दिया. फलस्वरूप गड़रियों और मल्लाहों ने फूलन की मदद चाही. इसी बीच लालाराम व श्रीराम ने उरई के प्रसिद्ध वकील गोविंद नारायण तिवारी के लड़के देव नारायण को पकड़ा तथा पचास हज़ार रुपये लेकर छोड़ा. श्री तिवारी ने कभी उन लोगों की मदद की थी, जो फूलन के साथ थे. लालाराम व श्रीराम जिसे भी पकड़ते थे, उसे बेहमई में ले जाकर ही छोड़ते थे. इससे फूलन को अंदाज़ हो गया कि बेहमई के लोग लालाराम व श्रीराम से मिले हुए हैं.

उस रा़ेज फूलन बेहमई में लालाराम-श्रीराम को ढूंढने ही आई थी. चर्चा है कि बीस लोगों की हत्या करने के बाद भी वह माइक पर अट्टहास कर रही थी. इससे उसके भीतर धधक रहे जातीय द्वेष का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इस संदर्भ में यह बात बेमानी हो जाती है कि वह पहले से योजना बनाकर ठाकुरों की सामूहिक हत्या करने आई थी या किन्हीं परिस्थितियोंवश उसने अचानक ऐसा कर डाला.

हालांकि, जिस तरीके से एक-एक करके उसने लोगों को बटोरा और उन्हें गांव से बाहर लिवा ले गई, उससे यह नरसंहार हड़बड़ी में की गई कार्रवाई नहीं लगता. प्राप्त जानकारी के अनुसार, डाकू जब नाव से यमुना पार करके उस पार उतरे, तो एक व्यक्ति उधर से ग़ुजर रहा था. डाकुओं में से एक ने उसे बुलाया. तभी पीछे से एक ने अपने साथी से जल्दी चलने को कहकर उसे छुड़वा दिया. यानी वे जल्दी से जल्दी गांव पहुंच कर अधिक से अधिक आदमियों को अपने कब्जे में कर लेना चाहते थे.

गांव में जिस लापरवाही से उन्होंने लूटपाट की, उससे भी यही लगता है कि उनका मुख्य लक्ष्य लूटपाट करना नहीं था. यह नाटक संभवत: इसलिए किया गया, ताकि यह लगे कि वे इसीलिए आए हैं. एक घायल का कहना था कि यदि वे लोग जरा भी सतर्क हो जाते और आपा-धापी में ही भाग लेते, तो आधे से अधिक बच जाते, क्योंकि चौतरफ़ा ऊंचे-नीचे बीहड़ से घिरे इस गांव का भूगोल ही ऐसा है.

जारी…