भाजपा ने जैसा चाहा, वैसा बांटा

,Upendra-Kushwahaबिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) एक क़दम और आगे बढ़ गया यानी घटक दलों में सीटों का बंटवारा हो गया. तमाम अगर-मगर और क़रीब एक हफ्ते की रस्साकशी के बाद यह काम अंजाम दिया गया. विधानसभा की 243 सीटों में से एक सौ साठ सीटों पर भाजपा अपने प्रत्याशी उतारेगी. शेष 83 सीटों में से लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को 40, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) को 23 और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को बीस सीटें मिली हैं. साथ ही हम के पांच नेताओं को भाजपा के सिंबल पर चुनाव लड़ने की सुविधा दी जाएगी, ताकि उन्हें राजनीतिक विस्थापन की मार न झेलनी पड़े.

सीटों के बंटवारे को लेकर एक फॉर्मूला यह बना था कि जिस घटक दल ने लोकसभा की जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा था, उसकी छह गुना विधानसभा सीटें उसे मिलेंगी, क्योंकि एक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में विधानसभा की छह सीटें होती हैं. इस लिहाज से भाजपा को विधानसभा की 186, लोजपा को 42 और रालोसपा को 18 सीटें मिलनी थीं. चूंकि हम का गठन कुछ महीने पहले हुआ है, लिहाजा उसके लिए भाजपा को ही सीटों की व्यवस्था करनी पड़ी. बिहार की राजनीति में ऐसा प्रयोग पिछले कुछ चुनावों से होता रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन एनडीए में नीतीश कुमार की पार्टी के कई उम्मीदवार भाजपा के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतरे और विधायक बने. नीतीश कुमार के साथ संबंध विच्छेद के बाद कुछ तो वापस जद (यू) में चले गए और कुछ भाजपा में रह गए. भाजपा और हम के साथ वैसा ही रिश्ता बन रहा है.

एनडीए में सीटों के बंटवारे के साथ भाजपा का बड़े भाई का रुतबा बरकरार रहा, इस संबंध में उसकी रणनीति सफल रही. भाजपा नेतृत्व, चाहे वह राष्ट्रीय हो या प्रादेशिक, ने अपने हिस्से के लिए कम से कम एक सौ साठ सीटों की सीमा तय की थी. घटक दलों के दबाव के बावजूद भाजपा ने अपनी चाहत में कोई फेरबदल नहीं किया. हालांकि, रालोसपा ने काफी पहले फॉर्मूला दिया था कि पिछले चुनाव में एक सौ दो सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी थे, इस बार भी वैसा हो. शेष 141 सीटें सहयोगी दलों में बांट दी जाए. लोजपा ने 70-80 सीटों की सूची दी थी, जबकि रालोसपा पचास से कम पर राजी न होने की बात कर रही थी.

हम के नेता जीतन राम मांझी की चाहत भी बेहिसाब थी, पर वह पचास से कम सीटों पर मानने को कतई तैयार न होने की बात करते थे. लेकिन, शुरू से ही माना जा रहा था कि ये सारे दावे-दर-दावे दिल बहलाने के लिए हैं. हुआ वही, जो भाजपा ने चाहा. लोजपा की एक बड़ी शर्त हम के कुछ विधायकों-नेताओं को लेकर थी. उसके नेताओं (पासवान परिवार) का कहना था कि हम में उन लोगों की संख्या काफी है, जिन्होंने फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में जीत तो लोजपा के टिकट पर हासिल की थी, पर उसके साथ विश्वासघात कर जद (यू) में चले गए थे. अव्वल तो ऐसे लोगों को एनडीए में शामिल न किया जाए और यदि शामिल कर भी लिया जाए, तो उम्मीदवार न बनाया जाए.

ऐसी सीटों की संख्या लगभग आधा दर्जन है. सीटों के आवंटन से सा़फ है कि उसकी शर्त स्वीकार नहीं की गई. जमुई ज़िले की दो सीटें जमुई और चकाई लोजपा के खास निशाने पर थीं. ये दोनों विधानसभा क्षेत्र चिराग पासवान के जमुई संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के हिस्से हैं और यहां से पूर्व मंत्री एवं हम के नेता नरेंद्र सिंह के पुत्र विधायक हैं. ये सीटें लोजपा के हिस्से में डालने की बात भाजपा ने स्वीकार नहीं की. इसका मलाल पासवान परिवार को रहा है.

खास मांगें (शर्त भी कह सकते हैं) सभी घटक दलों की रहीं. रालोसपा का ज़ोर था कि बंटवारे में यदि उसे अपेक्षित संख्या में सीटें नहीं मिलती हैं, तो न सही, पर प्रत्येक संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में उसे कम से कम एक सीट ज़रूर मिले. लिहाजा उसके हिस्से में कम से कम चालीस सीटें आएं. यह भी नहीं होना था, सो नहीं हुआ. बिहार के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद जीतन राम मांझी के साथ जद (यू) के कुछ विधायक-मंत्री बगावत करके जुड़े रहे. उनमें से पांच विधायक मांझी की सहमति से भाजपा में शामिल हो गए और बाकी तेरह विधायक एवं दो विधान पार्षद मांझी के साथ रह गए.

मांझी का कहना था कि इन सभी को विधानसभा की उम्मीदवारी देनी है, पार्टी को खड़ा करने में लगे कई प्रमुख लोगों को अवसर देना है, इसलिए उन्हें पर्याप्त सीटें चाहिए. फिर बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता की उनकी हैसियत को भी ध्यान में रखा जाए. लिहाजा उन्हें लोजपा से एक सीट भी कम नहीं चाहिए. अपनी इस दलील को मनवाने की हरसंभव कोशिश उन्होंने की, जो नाकाम रहीं. किसी भी क़ीमत पर एक सौ साठ सीटों से कम पर अपने प्रत्याशी न उतारने का भाजपा का प्रण पूरा हुआ. भाजपा की चिंता यह रही कि वह उतनी सीटों पर अपना सिंबल तो ज़रूर दे कि विधानसभा में अपने खुद के बहुमत लायक विधायक जुटा ले. उसका मानना रहा कि इतनी सीटों पर उम्मीदवार उतारने से यह राजनीतिक ज़रूरत पूरी हो सकती है. वस्तुत: घटक दलों की सारी घेराबंदी भाजपा की यह चाहत पूरी न होने देने की थी, लेकिन उनकी दाल नहीं गली.

विधानसभा की कोई दस सीटें रिजर्व रखने की भाजपा की रणनीति में एनडीए के घटक दलों ने पलीता ज़रूर लगा दिया. घटक दलों ने सीटों के बंटवारे का मुद्दा सार्वजनिक तौर पर जैसे ही उठाया, भाजपा ने कोई दस सीटें रिजर्व रखने की बात अनौपचारिक तौर पर शुरू कर दी. ऐसा करने का मकसद क्या है, यह भाजपा ने कभी सा़फ नहीं किया. राजनीतिक हलकों में माना गया कि उक्त सीटें उन अघोषित ताकतों के हित में रिजर्व रखी जा रही थीं, जो लालू-नीतीश के वोट बैंक को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं. इसका सीधा लाभ एनडीए को मिलना तय है. घटक दल चाहते थे कि यह व्यवस्था भाजपा अपने हिस्से से करे.

इस मसले पर भाजपा को फिलहाल पीछे हटना पड़ा. राजनीतिक तौर पर अति-महत्वाकांक्षी रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को लेकर भी उसे अपना रुख बदलना पड़ा. भाजपा नेतृत्व का एक तबका रालोसपा को विधानसभा की 15 से 18 सीटें देने का पक्षधर था. उसका कहना था कि तयशुदा फॉर्मूले के हिसाब से भी रालोसपा को इससे अधिक सीटें नहीं देनी चाहिए, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा भाजपा की यह रणनीति क्षत-विक्षत करने में सफल रहे. रालोसपा को इस फॉर्मूले के बावजूद कम से कम पांच सीटें अधिक मिलीं. एक और मोर्चे पर भाजपा नेतृत्व को अपनी अनौपचारिक पहल की अनदेखी करनी पड़ी.

भाजपा ने अपने सहयोगी दलों से विधानसभा सीटों के साथ संभावित प्रत्याशियों की सूची देने को भी कहा था, लेकिन सहयोगी दलों ने इस बात को तवज्जो नहीं दी. भाजपा का उद्देश्य जो भी रहा हो, पर सहयोगी दलों ने इसे अपनी आंतरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप जैसा मान लिया. हालांकि, इसे नए सिरे से फिर शुरू करने की तैयारी की जा रही है. कहते हैं, सीटों की पहचान की प्रक्रिया में दलों से यह कैफियत लिए जाने की तैयारी है कि संबंधित सीट पर उनके प्रत्याशी कौन होंगे. यह प्रत्याशियों की स्क्रूटनी जैसा काम होगा. देखना है कि सहयोगी दल इस प्रक्रिया को कैसे ग्रहण करते हैं.

सीटों के बंटवारे के बाद कहने को तो एनडीए में सब कुछ ठीक है. हालांकि, लोजपा ने ज़रूर कहा है कि उसके साथ पूरा न्याय नहीं किया गया, पर उसने अपनी चिंता से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अवगत करा दिया है. लोजपा या रालोसपा की शिकायत है कि उनके सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों की विधानसभा सीटों के उम्मीदवारों के चयन में उनकी कोई भूमिका नहीं रहने दी गई है, वहां प्रत्याशियों के चयन में सांसदों की सामान्य राय तक नहीं ली गई, पर चयनित उम्मीदवार की जीत की गारंटी में सांसदों की भूमिका अनिवार्य तौर पर तय की जा रही है. एनडीए के सहयोगी दलों का अनौपचारिक आरोप है कि वे अपने बड़े भाई की चौधराहट झेल रहे हैं.

यह सच्चाई है कि पूरे बिहार में संगठनात्मक संरचना भाजपा की है. लोजपा और रालोसपा के भी समर्थक समूह दिखते हैं, लेकिन हम का ऐसा कोई ढांचा बिहार में तैयार नहीं हो सका है, उसके पास वक्त की कमी भी रही, लेकिन उसमें महत्वाकांक्षी राजनेताओं का समूह हावी रहा. चुनाव लड़ने की तैयारी में लगे हम के कई नेताओं को झटका लगा है. इसी के चलते पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद सिंह ने हम से इस्ती़फा दे दिया. बताते हैं कि उन्हें खुद और समर्थकों के लिए मधुबनी में कम से कम पांच सीटें चाहिए थीं, जो संभव नहीं हो सका.

एनडीए के सहयोगी दलों में सीटों के आवंटन की प्रक्रिया अभी ढंग से शुरू भी नहीं हुई है. सीटों के आवंटन और उम्मीदवारों के चयन का काम जैसे ही ज़ोर पकड़ेगा, एनडीए दोहरे संकट का शिकार बनेगा. दलों में तनातनी बढ़ेगी और टिकटार्थियों का पलायन शुरू हो जाएगा. भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है, जिसे लेकर एनडीए के उसके सहयोगी सवाल उठा रहे हैं. एनडीए में एक नया संकट है. घटक दल चाहते हैं कि उन्हें सीटें आवंटित कर दी जाएं, लेकिन भाजपा उनसे उन तथ्यों की पुख्ता जानकारी चाहती है, जो उनकी जीत के कारण बन सकते हैं. भाजपा ने पिछले दिनों बिहार के सभी विधानसभा क्षेत्रों का आंतरिक सर्वेक्षण कराया है.

उम्मीदवारों के सहयोगी दल के होने से कोई खास फर्क़ नहीं पड़ने जा रहा है, पर भाजपा उनकी जीत के प्रति एक आश्वस्ति चाहती है. एनडीए के खाते में उसे विधानसभा की 185 प्लस सीटें चाहिए. इसके लिए वह कोई भी कसर बाकी नहीं रखना चाहती. जीत की हर तरह की पुख्ता व्यवस्था वाली भाजपाई शैली सहयोगी दलों की कार्य-संस्कृति से शायद मेल नहीं खा रही है, अंतर्द्वंद्व का यह एक बड़ा कारण है.