सद्गुरु में दिव्य ईश्वरीय चेतना होती है

sai-ramहमने सुना है कि शिरडी में साईं बाबा रात भर नहीं सोते थे और हरि का नाम लेते थे. क्या यह सच है?चूंकि सद्गुुुरु जीवनमुक्त हैं, इसलिए वे चाहे शरीर में रहें या शरीर छोड़ दें, हर समय पूर्ण चेतना-अवस्था में रहते हैं. जब उनको शरीर के माध्यम से स्थूल रूप से कार्य करना पड़ता है, तब भी वह स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों ही रूपों में सक्रिय रहते हैं. एक प्रकार से कहा जाए तो यह दिव्य आत्मा एक शरीर को ओढ़कर आती है जैसे कि कोई कंबल ओढ़ता हो.

अपना कार्य पूरा होने पर, इच्छा से वह उसे छोड़ देते हैं, जैसे कि किसी ने अपने शरीर से कपड़ा उतार कर रख दिया हो. इसलिए शरीर रखने के लिए उन्हें स्थूल आहार या नींद की आवश्यकता नहीं है. यही कारण है कि उनकी इच्छानुसार बिना आहार के उनका स्थूल शरीर जिंदा रहता है. कई संतों ने तो सालों-साल तक न भोजन किया, न ही वे सोये थे. निद्रा मृत्यु का एक छोटा रूप है. मृत्यु के बाद आदमी की आत्मा एक तंद्रा या निद्रावस्था में रहती है. जन्म के समय वह फिर सचेतन होता है. उसे चेतना-शक्ति मिलती है. चूंकि सद्गुरु का जन्म या मृत्यु नहीं होती है, इसलिए वे हर समय जागृतावस्था में रहते हैं. जैसे वे यदि आंख भी बंद किए लेटे हों, तब भी वे जागृतावस्था में रहते हैं.

बाबा शारीरिक बीमारियों से अछूते क्यों नहीं?

श्री साई सच्चरित्र में लिखित है कि बाबा कभी-कभी बीमार रहते थे. क्या सद्गुरु वास्तव में बीमार पड़ते हैं या वह उनकी कोई लीला है? अधिकांश भक्तों ने अपने मन में यह धारणा बना रखी है कि चूंकि सद्‌गुरु दिव्य एवं चमत्कारी शक्तियों से युक्त होते हैं. अत: उन्हें जो शारीरिक कष्ट आदि होते हैं, उनका भी निवारण वे अपनी दिव्य चमत्कारिक शक्तियों से कर लेते होंगे. वस्तुत: लोगों की यह अवधारणा सत्य नहीं है.

लोग सम्भवत: यह नहीं समझ पाते कि उच्चतम ईश्वरीय अवस्था में पहुंचने के पश्चात्‌ भी यदि करुणावश सद्गुरु इस पृथ्वी पर आए हैं और उन्होंने देह-धारण की है, तो देह से संबंधित पीड़ा, कष्ट आदि भी वे झेलते हैं. उन्हें भी शरीरगत बीमारियां होती हैं, पर वे अपने कष्ट को भक्तों के समक्ष वयक्त नहीं करते हैं बल्कि साथ में भक्तों के कष्टों को भी अपने ऊपर लेते हैं. बाबा ने कहा था- मुझे अपने भक्तों के लिए कितना कष्ट उठाना पड़ता है. उनके कष्ट मेरे हैं. (सा.स अध्याय-7, पृ.-48) श्री रामकृष्ण परमहंस को गले का कैंसर हो गया था, पर उस हालत में भी वे अपने भक्तों को आखिर तक प्रवचन देते रहे.

वास्तव में सद्‌गुरु दो चेतनाओं के स्तर पर कार्य करते हैं. एक ओर उनमें दिव्य ईश्वरीय चेतना होती है और दूसरी ओर शरीर धारण करने के कारण वे सामान्य आदमी की चेतना के स्तर पर भी रहते हैं. जब वे परम चेतना या ब्रह्मानंद की स्थिति में रहते हैं, तो अपनी इच्छामात्र से अलौकिक कार्य कर सकते हैं. लेकिन उनकी महत्‌ इच्छा में कुछ भी अपने लिए नहीं होता. उसमें भक्तों के लिए सर्वस्व त्याग है. दूसरी ओर जब वह सामान्य चेतना के स्तर पर रहते हैं तो वे सामान्य व्यक्ति की भांति शरीर और समाज से जुड़ी हर समस्या एवं कष्ट को झेलते हैं.

शुभ्र मार्ग

बाबा ने शुभ्र मार्ग का उल्लेख किया है. यह शुभ्र मार्ग क्या है?
बाबा ने हठ योग, तंत्र-साधना, प्राणायाम एवं अन्य योग-साधना के बारे में कहीं नहीं बताया. उन्होंने मुख्यत मन को नियंत्रित करने का मार्ग सुझाया. वे सबके मन को जानते थे. श्री साई सच्चरित्र में कई उदाहरण हैं कि जब भी लोगों के मन में गलत भावना उठी, तो उन्होंने तत्काल या बाद में टोका. उन्होंने उपासनी महाराज, काका साहेब दीक्षित, म्हालसापति आदि भक्तों को लोगों से अलग रहकर धर्म-ग्रंथ पढ़कर अशुद्ध-भावना से दूर रहने के लिए कहा. उन्होंने यह भी बताया कि इस मार्ग में यह भी आवश्यक है कि भक्त अपनी सांसारिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं के लिए केवल गुरु को ही आधार माने, क्योंकि समर्थ सद्गुरु उसके जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करने में सक्षम हैं. जब भक्त की गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा होती है, तो समर्थ सद्‌गुरु शुभ्र-मार्ग पर अग्रसर होने की दिशा में उनकी सहायता करते हैं.