बिहार विधानसभा चुनाव जनता में उत्साह नहीं है

Bihar-Assembly-Electionबिहार में विकास की किरण तो दूर, विकास की परछाई भी कहीं नज़र नहीं आती. ज़िंदगी के बोझ से दबे परेशान चेहरे, कुपोषित महिलाएं-बच्चे, कच्चे मकान, टूटे-फूटे सरकारी भवन और अंधकार में डूबे गांव, यही आज बिहार की पहचान बन गई है. ग़रीबी और महंगाई की ऐसी दोहरी मार है कि जीविकोपार्जन के लिए आज भी आम बिहारी दर-दर की ठोकरें खा रहा है.

बिहार विधानसभा चुनाव की जो तस्वीर मीडिया के ज़रिये देश के सामने पहुंच रही है, वह सच्चाई से कोसों दूर है. मीडिया में तो काफी चहल-पहल है, लेकिन बिहार की जनता चुनाव को लेकर फिलहाल उत्साहित नहीं है. भारतीय जनता पार्टी हो या फिर लालू यादव, नीतीश कुमार एवं सोनिया गांधी का महा-गठबंधन, किसी की रैलियों में आम जनता की भागीदारी न के बराबर है. इन रैलियों में स़िर्फ और स़िर्फ पार्टी कार्यकर्ता, सक्रिय समर्थक एवं भाड़े पर लाए गए लोग नज़र आते हैं.

दरअसल, बिहार की जनता राजनीतिक दलों, सरकार और सरकारी तंत्र से निराश हो चुकी है. राजनीति में जिस तरह की अवसरवादिता का उदाहरण विभिन्न राजनीतिक दलों ने बिहार में पेश किया है, उससे लोग भ्रमित हो गए हैं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि सही कौन है और ग़लत कौन? यही वजह है कि बिहार में चुनाव को लेकर आम जनता में कोई उत्साह नहीं है.

भारत में राजनीतिक दलों ने प्रजातंत्र का तमाशा बना दिया है. राष्ट्रीय पार्टियां हों या फिर क्षेत्रीय, सबने मिलकर प्रजातंत्र को मात्र एक चुनाव प्रबंधन की प्रक्रिया में तब्दील कर दिया है. देश को आज़ाद कराने और संविधान बनाने वाले महापुरुषों ने प्रजातंत्र को सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम माना था. उनके सामने सा़फ लक्ष्य था कि सरकार का चरित्र कल्याणकारी और जन-हितकारी होगा. सरकार अपनी नीतियों से ग़रीबों के दु:ख-तकलीफ दूर करेगी.

ज़िंदगी जीने के लिए ज़रूरी विभिन्न संसाधन मुहैया कराएगी. गांवों का पिछड़ापन दूर करके उन्हें विकास की ओर ले जाएगी. ग़रीब, पिछड़े, दलित एवं शोषित वर्ग की मदद करेगी, ताकि वे भी देश की मुख्य धारा से जुड़ सकें और देश के विकास में अपना योगदान कर सकें. देश की जनता के सामाजिक-आर्थिक विकास की ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों की थी, लेकिन उन्होंने राजनीति को सत्ता पाने का माध्यम बना डाला. सत्ता का एकमात्र उद्देश्य कॉरपोरेट्‌स और उद्योगपतियों का विकास बना दिया गया.

आज राजनीति का मतलब स़िर्फ यह हो गया है कि ग़रीब जनता को झूठी दिलासा देकर, वादे करके वोट ले लो और सत्ता पर विराजमान होते ही उसे भूल जाओ. झूठे वादों की भी एक सीमा होती है. बिहार की जनता का अब नेताओं के वादों से विश्वास उठने लगा है. शायद यही वजह है कि बिहार चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों और मीडिया में भारी शोरगुल है, लेकिन जनता के बीच कोई उत्साह नहीं है.

बिहार के लोगों में चुनाव को लेकर उत्साह कम होने के कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि लोगों का नेताओं से भरोसा उठ गया है. उन्हें लगता है कि सरकार किसी की भी बने, उनके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला, उनके इलाके का विकास नहीं होने वाला. बिहार के लोग राजनीतिक तौर पर काफी परिपक्व हैं. बड़े विश्वास के साथ उन्होंने लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को समर्थन दिया, लेकिन चुनाव के डेढ़ साल के बाद उन्हें निराशा हाथ लगी.

लोगों को कोई भी वादा ज़मीन पर उतरता दिख नहीं रहा है, वे खुद को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं. जिस तरह लोग मोदी से निराश हैं, उसी तरह नीतीश कुमार से भी उन्हें कोई उम्मीद नहीं बची है. नीतीश कुमार जंगलराज खत्म कर विकास करने का वादा करके बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल में क़ानून व्यवस्था दुरुस्त कर दी थी और उस दौरान बिहार में सड़कों की हालत में भी खासा सुधार हुआ था.

नीतीश कुमार के पिछले पांच वर्षों का कार्यकाल राजनीति की भेंट चढ़ गया. हर राजनीतिक दल अपनी-अपनी सरकार की तारी़फ करता है, बिहार के विकास में अपने योगदान का दावा करता है और इसके लिए तरह-तरह के आंकड़े पेश करता है. टीवी चैनलों पर बहस के लिए तो यह सब महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन आम जनता पर इन दावों और आंकड़ों का कोई असर नहीं होता, क्योंकि वह तो भुक्तभोगी है. गांव-ब्लॉक में कोई चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं, प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार की योजनाएं उस तक पहुंचती नहीं हैं, स्कूल-कॉलेज नहीं हैं, पीने के लिए सा़फ पानी नहीं है.

सड़कें नहीं हैं. जो सड़कें पहले बनी थीं, वे देखरेख के अभाव में टूटने लगी हैं और क़ानून व्यवस्था की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है. एक वाक्य में अगर कहा जाए, तो यह कि बिहार में सरकार का एक भी महकमा ऐसा नहीं है, जिस पर बिहार के लोग नाज कर सकें. ऐसे माहौल में लोगों की निराशा न तो पैकेज की राजनीति से ़खत्म होने वाली है और न बड़े-बड़े वादों से.

सरकारी तंत्र के प्रति निराशा के लिए कोई एक राजनीतिक पार्टी या सरकार ज़िम्मेदार नहीं है. इसमें सारे राजनीतिक दलों और सरकारों का योगदान है. पर कैपिटा इनकम के हिसाब से बिहार देश का सबसे ग़रीब राज्य है. यहां प्रति व्यक्ति सालाना आय सिर्फ 35-36 हज़ार रुपये है. जबकि गोवा और दिल्ली जैसे राज्यों में प्रति व्यक्ति सालाना आय बिहार से सात गुना ज़्यादा है. इसकी वजह यह है कि बिहार में उद्योग नहीं हैं, आर्थिक गतिविधियां थमी हुई हैं.

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि बिहार की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है. मतलब यह कि सीमित अवसर, रोज़गार एवं मूलभूत सुविधाओं पर लगातार बढ़ते दबाव के अनुरूप बिहार में विकास नहीं हो रहा है. बिहार देश के अन्य राज्यों की तुलना में लगातार पिछड़ता जा रहा है. इतना ही नहीं, बिहार में शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं एवं कमियों के चलते शिक्षित-अप्रशिक्षित युवाओं की भीड़ बढ़ती जा रही है. गांवों का हाल और भी खराब है.

भूमिहीन कृषक-मज़दूरों की संख्या बहुमत में है. मनरेगा जैसी योजनाओं से ग़रीबों को कुछ राहत तो मिली है, लेकिन यह किसी को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए पर्याप्त नहीं है. इससे दूसरे राज्यों की ओर पलायन तो थोड़ा थमा, लेकिन जीवन स्तर में कोई परिवर्तन नहीं आया.

बिहार की सबसे बड़ी समस्या ग़रीबी और सरकारी तंत्र की तबाही है. मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने वाले हर महकमे की स्थिति बद से बदतर है. आज़ादी के बाद 68 वर्ष बीत गए, लेकिन बिहार के ज़्यादातर जिलों में शत- प्रतिशत विद्युतीकरण नहीं हुआ है. मतलब, 21वीं सदी के बिहार में ऐसे हज़ारों गांव हैं, जहां बिजली पहुंची ही नहीं है. यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बिहार के ग्रामीण इलाकों में महज 52.8 प्रतिशत गांवों का विद्युतीकरण हुआ है. बिहार के ग्रामीण इलाकों में मात्र छह प्रतिशत घरों में बिजली पहुंच सकी है. मतलब यह कि 85 प्रतिशत ग्रामीण बिना बिजली के जीवन बिताने को मजबूर हैं. अब इन गांव वालों को इससे क्या मतलब है कि विद्युतीकरण का काम संविधान के मुताबिक राज्य सरकार या केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है या नहीं है? इन गांव वालों को बजट के आंकड़ों से क्या लेना-देना है?

उनके लिए तो स़िर्फ एक ही सत्य है कि उनके गांव-घर में बिजली नहीं पहुंची. आज के जमाने में बिजली न होने का मतलब ज़िंदगी अंधकारमय है. ज़्यादातर गांव ऐसे हैं, जहां चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं. आज भी बिहार के गांवों में झाड़-फूंक से इलाज कराने का प्रचलन है. ब्लॉक स्तर पर भी पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं. सरकार पीने का सा़फ पानी तक उपलब्ध कराने में नाकाम रही है. अब तो बिहार के कई इलाकों में कुएं का पानी भी प्रदूषित हो चुका है.

बच्चों की पढ़ाई पेड़ के नीचे हो रही है. स्कूल और शिक्षा के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह हास्यास्पद है. एक तो योग्य शिक्षकों का घोर अभाव है और जो हैं भी, वे पढ़ाने से ज़्यादा मिड डे मील मुहैया कराने में व्यस्त रहते हैं. यही हाल कमोबेश हर सरकारी महकमे का है. दुनिया न जाने कहां से कहां निकल गई और बिहार में आज भी ऐसा कुछ नहीं है, जो 21वीं सदी के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने लायक हो.

बिहार में उत्साह की कमी के पीछे एक महत्वपूर्ण वजह यह भी है कि राजनीतिक दल अब इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में तब्दील हो गए हैं. जनता से उनका न तो अब कोई संपर्क-सरोकार है और न उनकी प्राथमिकता में जनता की समस्याएं हैं. दरअसल, राजनीतिक दलों का डीएनए खराब हो चुका है. राजनीतिक दलों ने अपना दायित्व भुला दिया है. नेताओं को पता ही नहीं है कि एक राजनीतिक दल की ज़िम्मेदारी क्या होती है? राजनीतिक दलों ने राजनीति को स़िर्फ सत्ता पाने का माध्यम समझ लिया है. यही वजह है कि सारे दल स़िर्फ चुनाव के समय जीवंत होते हैं और चुनाव के बाद सुषुप्तावस्था में चले जाते हैं.

दो चुनाव के बीच इनका जनता से अब कोई रिश्ता ही नहीं रहता. जीवंत और क्रियाशील प्रजातंत्र में राजनीतिक दलों के लिए चुनाव के बाद भी जनता से सीधा संवाद रखना ज़रूरी है. कार्यकर्ताओं को तैयार करना, उन्हें प्रशिक्षित करना, जन-जागरण अभियान चलाना, स्थानीय एवं राष्ट्रीय मुद्दों पर लोगों को लामबंद करना आदि कई ज़िम्मेदारियां राजनीतिक दलों की होती हैं.

भारत में राजनीतिक दलों ने यह सब करना छोड़ दिया है. जनता से संवाद वे स़िर्फ मीडिया के माध्यम से रखते हैं. राजनीतिक दल टीवी चैनलों एवं अ़खबारों में बयान देकर और प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी सारी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पा लेते हैं. जहां तक बात कार्यकर्ता बनाने की है, तो यह महज पैसे का खेल हो गया है. यह भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि उसमें अब विचारधारा का कोई स्थान नहीं रहा.

इसलिए जो युवा राजनीति में आते हैं, वे या तो बेरोज़गार होते हैं या फिर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले धनाढ्य होते हैं. हक़ीक़त यह है कि जिसके पास धन है, वह नेता बन जाता है और जो पैसे लेकर पार्टी का काम करता है, वह कार्यकर्ता बन जाता है. ज़मीन से जुड़ा कार्यकर्ता ही पार्टी और जनता के बीच कड़ी की भूमिका निभाता है. जब पैसे लेकर काम करने वाले कार्यकर्ता होंगे, तो पार्टी जनता से कट जाती है.

यही वजह है कि राजनीतिक दलों ने जन-जागरण अभियान चलाना बंद कर दिया है. जन-जागरण का काम भारत में अब सिविल सोसाइटी के ज़िम्मे आ गया है. राजनीतिक दल जनता से बिल्कुल कट चुके हैं. यही वजह है कि लोगों में निराशा बढ़ी है. बिहार में इसका असर ज़्यादा है. आम तौर पर हर विश्लेषक का मानना है कि बिहार की जनता राजनीतिक तौर पर सबसे ज़्यादा जागरूक है, लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं देता कि बिहार में लोकसभा चुनाव के दौरान सबसे कम मतदान हुआ.

पूरे देश में लोकसभा चुनाव में 66 प्रतिशत मतदान हुआ, लेकिन बिहार में महज 52 प्रतिशत लोगों ने ही वोट डाले. लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, जिसमें मात्र 47 प्रतिशत लोगों ने ही मतदान किया. इसका मतलब सा़फ है कि चुनाव को लेकर बिहार की जनता में उत्साह की कमी है.

अब जब बिहार में चुनाव सिर पर हैं, तो राजनीतिक दल सक्रिय हुए हैं. आजकल राजनीतिक दलों के सक्रिय होने का मतलब भी अजीबोग़रीब है. चुनाव की घोषणा से पहले हर दल के नेताओं के होर्डिंग्स लगने लगे हैं, रेडियो-टीवी पर प्रचार आने लगा है, टीवी और अ़खबारों में ़खबरें आने लगी हैं. राजनीतिक दलों ने रैलियां करना शुरू कर दिया. कहने का मतलब यह कि राजनीतिक दलों ने पैसा बांटना शुरू कर दिया.

हर रैली में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं. इसकी वजह यह है कि राजनीतिक रैलियों में आम जनता ने शामिल होना बंद कर दिया है. राजनीतिक दलों को गाड़ी, खाना-पीना और पैसे देकर लोगों को जुटाना पड़ता है. हालत यह है कि अब इसे ग़लत भी नहीं माना जाता है. चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आएंगे, तमाशा और बढ़ेगा. फिल्मी सितारों को प्रचार में लगाया जाएगा, गांवों-कस्बों में नाच-गाने के कार्यक्रम होंगे और शराब बांटी जाएंगी. इन सबसे काम न चला, तो वोट खरीदने का भी काम धड़ल्ले से होगा. फिर विचारधारा, मुद्दे और समस्याएं, सब कुछ पीछे चला जाएगा. चुनाव के दौरान भी राजनीतिक दल इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की तरह काम करते हैं.

बिहार चुनाव के बारे में टीवी चैनलों पर बहस करने वाले राजनीतिक विश्लेषक हों या फिर वोट के लिए झूठे वादे करने वाले नेता, सब यही कहते नज़र आते हैं कि इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव का ऐतिहासिक महत्व है. इसके नतीजे भारतीय राजनीति के भविष्य का फैसला करेंगे. कुछ लोग तो कहते हैं कि यह बिहार का नहीं, बल्कि देश का चुनाव है. अगर बिहार की जनता का फैसला इतना ही महत्वपूर्ण है, तो बिहार के लोगों की समस्याओं को महत्व क्यों नहीं दिया गया?

आज बिहार देश का सबसे पिछड़ा, भूखा और असहाय राज्य क्यों है? क्यों यहां के लोगों को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं? बड़ी-बड़ी बातों से ग़रीब का पेट नहीं भरता और आंकड़ों से ज़मीनी हक़ीक़त का पता नहीं चलता. सवाल यह है कि जिस देश में केरल और पंजाब जैसे खुशहाल राज्य हों, वहां बिहार जैसा मेहनतकश राज्य पिछड़ा क्यों है, बदहाल क्यों है?

जिस देश में दिल्ली और बंगलुरू जैसे आधुनिक शहर हों, वहां के दूसरे बड़े राज्य बिहार का कोई शहर, शहर जैसा नहीं है, तो इसकी वजह क्या है? बिहार के लोग रोजी-रोटी की तलाश में देश के कोने-कोने में मौजूद हैं. वे इस विषमता को जानते-देखते हैं और भलीभांति समझते भी हैं. इसके बावजूद कोई महाज्ञानी यह कहे कि बिहार के चुनाव का ऐतिहासिक महत्व है, तो यह मज़ाक के सिवाय कुछ और नहीं है. ये लोग भूल चुके हैं कि प्रजातंत्र में सरकार जन-संसाधन के प्रतिपादन का तंत्र होती है.

जनता के बीच संसाधनों और अवसरों का बंटवारा सरकार का सबसे अहम दायित्व है. इससे ही जनता एवं सरकार के बीच विश्वास और सार्थकता का रिश्ता बनता है. अगर बिहार की जनता के हाथ में भारत का भविष्य है, तो देश के संसाधन और आधुनिक मूलभूत सुविधाएं बिहार की जनता के क़दमों में होने चाहिए थे.

आज बिहार की जो हालत है, उसके लिए स़िर्फ और स़िर्फ राजनीतिक दल एवं नेता ज़िम्मेदार हैं. बिहार में कांग्रेस का शासन रहा, लालू यादव ने राज किया, नीतीश कुमार ने सरकार चलाई और भारतीय जनता पार्टी भी सात वर्षों तक सत्ता में रही. इसलिए कोई भी राजनीतिक दल यह कहने की स्थिति में नहीं है कि उसे मौक़ा नहीं मिला. यही वजह है कि बिहार के लोग निराश हैं, उन्हें किसी से कोई आशा नहीं है.

उन्हें पता है कि राजनीति अब समाजसेवा नहीं रही, समाज को बदलने का ज़रिया नहीं रही. हर उम्मीदवार अपने स्वार्थ, ऐशोआराम और सत्ता की भूख मिटाने के लिए चुनाव लड़ता है. इसके लिए हर नेता झूठ और फरेब की हर सीमा लांघने के लिए तैयार है. जनता जानती है कि इस चुनाव में भी बिहार में धार्मिक उन्माद, जातीय समीकरण और वोट बैंक की राजनीति का खेल चलेगा. हर राजनीतिक दल उसे ठगने के लिए नए-नए पैंतरे आजमाएगा. यही वजह है कि लोगों में उत्साह नहीं है.

राजनीतिक दलों और सरकार चलाने वाले लोगों की खुशनसीबी यह है कि बिहार के लोग अपने हक़ की लड़ाई लड़ने के लिए आंदोलन की राह पर नहीं उतरे, इतनी सारी समस्याओं से लड़ते हुए उन्होंने धैर्य नहीं खोया और प्रजातंत्र में अब तक उनका भरोसा कायम है. लेकिन जिस दिन धैर्य का यह बांध टूट गया, तो अनर्थ हो जाएगा.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमताके साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है.

डा. मनीष कुमार

डॉ. मनीष कुमार राजनीतिक-सामजिक मसलों पर मौलिक विचार और उसके धारदार विश्लेषण के माहिर हैं. अपनी नेतृत्व क्षमता के साथ चौथी दुनिया में संपादक (समन्वय) का दायित्व संभाल रहे हैं. विजुअल मिडिया का उनका लंबा अनुभव प्रिंट मीडिया में भी अपनी शिनाख्त दर्ज कर रहा है. ‎