महा-गठबंधन पर गिरेगी तीसरे मोर्चे की तलवार

बिहार में तेजी से बदलते चुनावी परिदृश्य में यह कहना बड़ा दुष्कर है कि किस गठबंधन की अगले दिन क्या हालत रहेगी. राज्य में पहले दो राजनीतिक ध्रुव थे, एक भाजपा नीत एनडीए और दूसरे उसके विरोधी. एनडीए के म़ुकाबले के लिए जनता दल (यू), राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी का महा-गठबंधन बना, लेकिन सीटों के बंटवारे की घोषणा के साथ उसमें दरारें न केवल दिखने लगीं, बल्कि और चौड़ी हो गईं.

पहले एनसीपी अलग हुई और फिर रही-सही कसर सपा ने पूरी कर दी. महा-गठबंधन से अलग हुए उक्त दल कुछ अन्य राजनीतिक समूहों को साथ लेकर तीसरे मोर्चे की तैयारी में थे कि उनके भी अलग-अलग सुर सामने आने लगे. इन कोशिशों से अलग राज्य में वामपंथी दलों ने एकजुट होकर चुनाव में उतरने का निर्णय लिया है. भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), एसयूसीआई, आरएसपी एवं हिंद फॉरवर्ड ब्लॉक में सीटों के बंटवारे की प्रक्रिया चल रही है.

सपा ने राज्य विधानसभा की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, पर एनसीपी नेता तारिक अनवर अब भी तीसरा मोर्चा बनाने की तैयारी का दावा कर रहे हैं. इसके बरअक्स एनडीए की हालत ऊपर से तो अब तक ठीक दिखती है, पर सीटों को लेकर घटक दलों में मारामारी मची है और उनके अंतर्विरोध खुलकर सामने आ रहे हैं.

महा-गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद पैदा हुआ था. एनसीपी ने तीन सीटें दिए जाने से नाराज़ होकर किनारा कर लिया, तो सपा ने अपमानित किए जाने का आरोप लगाकर पटना की स्वाभिमान रैली के दो दिनों बाद अलग होने की घोषणा की. यह घोषणा पार्टी महासचिव राम गोपाल यादव ने की, जो जनता परिवार के एकीकरण के पक्षधर नहीं थे. बंटवारे के समय सपा के लिए कोई सीट नहीं छोड़ी गई.

बाद में रैली में सपा को शामिल कराने के ख्याल से उसे एनसीपी के लिए सुरक्षित तीन सीटों के अलावा राजद प्रमुख ने अपने हिस्से की दो सीटों के साथ कुल पांच सीटें देने की पहल की. सपा नेता रैली में आए, एकजुट होने का ऐलान भी किया, पर दो दिनों बाद मात्र पांच सीटें देकर अपमानित करने का आरोप लगाकर पार्टी महा-गठबंधन से अलग हो गई. इसी के साथ जनता परिवार के एकीकरण की प्रक्रिया समाप्त हो गई.

इससे एनसीपी एवं अन्य ताकतों को नई ऊर्जा मिली और राज्य में तीसरे मोर्चे को आकार देने की पहल शुरू हुई, जिसे पहला झटका सपा की ओर से लगा. सपा बड़े भाई के तेवर में है और किसी से तालमेल या गठबंधन अपनी शर्तों पर करना चाहती है. यह सही है कि हिंदी पट्टी की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और सपा की एक खास पहचान है, लेकिन यह भी सही है कि उत्तर प्रदेश से बाहर के राजनीतिक गठबंधनों में उसकी हैसियत बड़े भाई बनने की कतई नहीं है.

बिहार में वह पिछले कई चुनावों से हिस्सा ले रही है और कभी-कभी विधानसभा में उसकी मौजूदगी भी दर्ज हुई है, लेकिन उसमें प्रत्याशी विशेष की अपनी पहचान ज़्यादा लाभकारी साबित हुई. बिहार की चुनावी राजनीति में सपा कोई राजनीतिक ताकत नहीं बन सकी, फिर भी एनसीपी सहित कुछ राजनीतिक ताकतों ने उसकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. कोशिश हुई कि सपा, राकांपा, पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन (एआईएमआईएम) को लेकर तीसरा मोर्चा तैयार किया जाए. हालांकि, सपा का रुख बहुत लचीला नहीं है, फिर भी इन दलों के नेताओं में बातचीत का सिलसिला जारी है.

इन दलों-नेताओं की कोशिश की सफलता-विफलता महा-गठबंधन की राजनीति को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी. सबसे बड़ी बात यह कि भाजपा (एनडीए) विरोधी मतों का बिखराव रोकने का उसका प्रयास विफल हो जाएगा. ओवैसी ने पूर्णिया प्रमंडल की क़रीब 25 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा की है. इस प्रमंडल में एनसीपी सांसद तारिक अनवर की भी अच्छी पकड़ है, उनकी छवि गंभीर और उदार अल्पसंख्यक राजनेता की है.

इस इलाके में राजद के बर्खास्त सांसद और जअपा प्रमुख पप्पू यादव का भी प्रभाव है. क़रीब दो दर्जन विधानसभा क्षेत्रों में वह मतदान प्रभावित करने की ताकत रखते हैं. यह पूर्णिया-सहरसा प्रमंडलों की बात है. इनके बाहर की राजनीति में इन दलों-नेताओं के हस्तक्षेप की ताकत पर सोचना पड़ सकता है. इनके साथ सपा के मिलने का असर क्या होगा, यह कहना कठिन है. आम बिहारी को चुनाव के दिनों में ही सपा की गतिविधियां नज़र आती हैं. इसकी राज्य इकाई है और बड़ी संख्या में पदाधिकारी भी, पर सामान्य दिनों में कोई कहीं दिखता नहीं है.

बिहार के क़रीब आधा दर्जन ज़िलों की सीमाएं उत्तर प्रदेश को छूती हैं, जिनकी क़रीब एक दर्जन विधानसभा सीटें सपा के प्रभाव के दायरे में मानी जा सकती हैं. लेकिन, किसी गठबंधन में सपा के होने का लाभ केवल इतना है कि उसे राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े पिछड़े नेता का नाम मिलना है. सपा शायद इसी की बदौलत बड़े भाई की चौधराहट चाहती है.

बहरहाल, इन दलों का गठबंधन हो या न हो, पर महा-गठबंधन के वोट बैंक में इनकी सेंधमारी तय है. ओवैसी एवं अनवर से अल्पसंख्यक मतदाता प्रभावित होंगे, तो पप्पू यादव एवं सपा के कारण यादव मतदाता. यानी निशाने पर राजद प्रमुख का माय है. महा-गठबंधन के चुनावी नतीजे पर माय के दरकने का सीधा और नकारात्मक असर पड़ेगा. यह राजद प्रमुख लालू प्रसाद की राजनीति के लिए एक बड़ी चुनौती है और इसका सीधा लाभ एनडीए के खाते में जाता है.

इस विधानसभा चुनाव की बड़ी राजनीतिक विशेषता वामदलों की एकजुटता भी बन सकती है. राज्य में सक्रिय सभी वामपंथी दलों ने एकजुट होकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया और पटना में एक कॉन्वेंशन आयोजित करके इस सिंहासन बनाम दु:शासन की लड़ाई में जन-शासन को विजयश्री दिलाने का आह्वान किया.

कॉन्वेंशन के बाद दीपांकर भट्टाचार्य ने बताया कि सभी छह वामदलों के बीच सीटों के बंटवारे की प्रक्रिया चल रही है और 230 सीटों पर सहमति बन भी गई है. बिहार में गत शताब्दी के अंतिम दशक तक वामदलों का महत्व खूब रहा और दिखा भी, विधानसभा के भीतर और बाहर. लेकिन, वाम आंदोलन में जड़ता और मंडल की राजनीति के दौर के पिछड़ावाद ने इसके आधार समूह को गंभीर रूप से प्रभावित किया. स्थिति यह है कि मौजूदा विधानसभा में एकमात्र वामपंथी विधायक भाकपा से है. बेगूसराय, भोजपुर, सीवान, जहानाबाद, मधुबनी, रोहतास, औरंगाबाद एवं पूर्वी चंपारण में विभिन्न वामपंथी दलों की स्थिति मजबूत रही है. वामदलों के समर्थकों का बहुमत उन्हीं सामाजिक समूहों से आता है, जिन पर महा-गठबंधन के घटक दल, विशेष तौर पर जद (यू) अपना हक़ मानता है. ऐसे में यह तय है कि इस चुनाव में वामदल वोट और सीटें जो भी हासिल करें, लेकिन उन्हें भाजपा (एनडीए) विरोधी वोट ही मिलेंगे. इसका राजनीतिक निहितार्थ यह है कि वामदलों की एकजुटता भी महा-गठबंधन के चुनावी नतीजे पर ही असर डालेगी.
एनडीए इससे खुश, लेकिन अपने अंतर्विरोध से परेशान है. कुछ हफ्ते पहले तक वह खुश नहीं था, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट अधिक एकजुट दिखते थे, पर अब हालात बदल गए हैं. महा-गठबंधन का सबसे मजबूत सामाजिक समीकरण माय दरकता दिख रहा है, वहीं अति पिछड़े और महादलित सामाजिक समूहों के एक बड़े हिस्से को वामदल प्रभावित कर रहे हैं. अपने घटक दलों में सीटों को लेकर मची मारामारी से एनडीए परेशान है. एनडीए में भाजपा के बाद लोक जनशक्ति पार्टी सबसे बड़ा घटक दल है, लिहाजा उसे ग़ैर-भाजपाई दलों में सबसे बड़ा हिस्सा चाहिए. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) का लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन सौ ़फीसद रहा, लिहाजा उसे हर संसदीय क्षेत्र में कम से कम एक सीट चाहिए. पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) का दावा सबसे अलग है. उसका कहना है कि भाजपा के अलावा हम के ही विधायक हैं, सो उसे कम करके नहीं आंका जाना चाहिए. भाजपा किसी तरह अगली विधानसभा में अपना बहुमत चाहती है. इसके लिए उसे 122 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी. यह जादुई आंकड़ा पाने के लिए उसे कम से कम 160-165 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने होंगे. सीटों के बंटवारे को लेकर एनडीए में विवाद लगातार गहराता जा रहा है, जिसे यदि समय रहते और तरीके से सुलझाया नहीं गया, तो स्थितियां बिगड़ भी सकती हैं.प

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