आरक्षण पर नई बहस की कोशिश में संघ और भाजपा

rreservationअहमदाबाद और सूरत में लोगों द्वारा अचानक प्रदर्शन करने की घटना ने देश को आश्चर्य में डाल दिया है. एक 22 वर्षीय शख्स अचानक नेता के रूप में इस तरह विशाल भीड़ जुटा सकता है, यह आम आदमी की कल्पना के बाहर था. यह सहज नहीं हो सकता. निश्चित तौर पर ऐसा कोई संगठन था, जो चुपचाप काम कर रहा था और इसका प्रबंधन कर रहा था. वह संगठन कौन है, हम नहीं जानते, लेकिन हम इस समस्या की जड़ समझने की कोशिश करते हैं.

समस्या नौकरी में कमी की है, शिक्षा के क्षेत्र में सीटों की कमी की है, समस्या सुविधा में कमी की है, पिछड़ेपन के आधार पर दावेदारी की है. और, ये बातें 1980 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट में आईं और 1990 में श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा इसे लागू किया गया था. इसे लेकर देश में व्यापक आंदोलन हुआ, लेकिन अंत में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि एक साथ सभी आरक्षण मिलाकर यह 50 फीसद से अधिक नहीं हो सकता है.

समस्या जितनी दिखती है, उससे कहीं बड़ी है. पहली बात तो यह कि आरक्षण जाति आधारित होना चाहिए या ग़रीबी आधारित? तर्क यह था कि दलित एवं पिछड़ी जातियां दशकों अथवा कहें कि सदियों से पिछड़ेपन की शिकार और आम तौर पर ग़रीब रही हैं. इसलिए जाति और ग़रीबी एक-दूसरे के प्रतिरूप हैं. मंडल कमीशन ने यह सिफारिश की कि अगर कुछ निश्चित जातियों को आरक्षण दिया जाता है, तो इसमें ग़रीब भी आ जाएंगे.

यह आंशिक रूप से सही है, लेकिन यह भी सही है कि ब्राह्मणों एवं राजपूतों की तरह ऊंची जाति के लोग भी ग़रीब हैं. उन्हें इसलिए कोई आरक्षण नहीं मिलता कि वे उच्च जाति में पैदा हुए हैं. एक अन्य समस्या जाति को परिभाषित करने को लेकर है. एक राज्य में कोई एक जाति अगड़ी हो सकती है, तो दूसरे राज्य में पिछड़ी. उदाहरण के लिए, बिहार में वैश्य समुदाय पिछड़ा माना जाता है, जबकि उत्तर भारत और पश्चिम भारत में यह बहुत समृद्ध है.

बिहार में सुशील कुमार मोदी जैसे नेता पिछड़े माने जाते हैं. इन जटिलताओं को आसानी से हल नहीं किया जा सकता. राजस्थान में जाट प्रमुख जाति हैं. वे पिछड़ी जाति में शामिल होना चाहते हैं और इसके लिए मांग करते हैं. उत्तर प्रदेश और हरियाणा में पूरी तरह से जाटों का वर्चस्व है और मानते हैं कि यदि वे पिछड़ा वर्ग में शामिल होते हैं, तो उन्हें और अधिक लाभ मिलेगा.

एक आम बौद्धिक क्षमता वाला आदमी यह समझ सकता है कि गुजरात में जो हुआ, वह पटेलों द्वारा खुद के आरक्षण से आगे की बात है. उन्हें आरक्षण नहीं मिल सकता और इस बात को वे भी समझते हैं. वे शायद आरक्षण पर इस बहस को जन्म देना चाहते हैं कि अन्य सभी जातियों के लिए भी आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए. उद्देश्य तो यही प्रतीत होता है. उन्होंने आज आंदोलन शुरू किया है और अगले चुनाव तक शायद यह राष्ट्रीय मुद्दा बन जाए कि आरक्षण नहीं होना चाहिए.

यह इस आंदोलन का प्रारंभिक खतरा है. यह क़ानून व्यवस्था की समस्या नहीं है. पुलिस ने हार्दिक पटेल को गिरफ्तार करके बेवकूफी की. आंदोलन से निपटने का यह कोई तरीका नहीं है.

इसी तरह दिल्ली पुलिस मूर्खतापूर्ण तरीके से सेना के पूर्व लोगों के साथ पेश आई. यह तरीका सही नहीं था. क्या पुलिस देश को संभाल सकती है? पाकिस्तान बहुत सही कर रहा है, जहां लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं है, प्रधानमंत्री की आवाज़ का कोई मतलब नहीं है, वहां स़िर्फ सेना है, जो असल शासन कर रही है. हम यहां वैसा नहीं कर सकते. हमारे यहां बातचीत और संवाद ही असल चीज है. बेशक, अभी यह कहना कठिन है कि पटेल चाहते क्या हैं, लेकिन हमें बड़े मुद्दे को संबोधित करना शुरू कर देना चाहिए.

हम कैसे आरक्षण की इस समस्या से निपटने जा रहे हैं? हमें ग़रीबी से निपटना है. व्यक्ति किसी भी जाति का हो, अगर वह ग़रीब है, उसके पास भोजन नहीं है, तो उसे पैसा देना ही होगा. इस सरकार ने जिस मनरेगा की आलोचना की, वह बहुत अच्छा काम कर रही है. इसकी वजह से ग़रीबों के हाथ में थोड़ा-बहुत पैसा आया है. निश्चित तौर पर इसमें भ्रष्टाचार है, दुरुपयोग है, लेकिन यह भी सही है कि कल तक जिन ग़रीबों के पास कोई काम नहीं था, आज उन्हें काम मिल रहा है और इसके ज़रिये उनके हाथ में पैसा आ रहा है.

केंद्रीय मुद्दा जाति नहीं, ग़रीबी है. ग़रीबी हटाने के लिए पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया जाना चाहिए. अनुसूचित जातियों को दस साल के लिए संविधान में दस फीसद आरक्षण दिया गया, लेकिन उसके बाद इसे हटाने का साहस किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं दिखाया. मैं समझ सकता हूं कि अनुसूचित जातियों को सैकड़ों सालों तक मैला ढोने और इसी तरह के अन्य कामों की वजह से काफी ऩुकसान उठाना पड़ा. लेकिन, अन्य पिछड़ी जातियों के साथ क्या हुआ? क्या उन्हें ज़मीन मिली?

मैं समझता हूं कि इस गुजरात आंदोलन को एक संकेत के तौर पर लेना चाहिए और जाति पर गंभीरता से काम शुरू होना चाहिए. यह काम केंद्र सरकार या नीति आयोग को दिया जाना चाहिए या इसके लिए एक विशेष समिति बनानी चाहिए. एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इस तरह की सम्स्या सभी जगह नहीं है. उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु को लें. वहां मंडल आयोग के बहुत पहले से 60 फीसद आरक्षण था.

वहां के आईटी प्रोफेशनल्स अमेरिका जा रहे हैं और वे ब्राह्मण या सवर्ण नहीं, बल्कि पिछड़ी जातियों से आते हैं. अगर हम स्टीरियो टाइप ढंग से यह सोचें कि ब्राह्मण का काम स़िर्फ पूजा और कर्मकांड है, तो यह ग़लत होगा. कभी यह बात सही थी, लेकिन आज तो आपको उन्हें अवसर देने ही होंगे. आज का युवा यह मानने को तैयार नहीं है कि उसके दादा एक ब्राह्मण थे, इसलिए कोई भी उसे काम नहीं देगा.

मेरे अनुसार यह बहुत ही खतरनाक बात है कि पटेल समुदाय, जो वास्तव में गुजरात की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कारक है, जिसके पास ज़मीन है, वह आज आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहा है. वे सड़कों पर कैसे आ सकते हैं? लोग उनके ़िखला़फ सड़कों पर आ जाएंगे. लेकिन, उनका सड़कों पर आना यह संकेत करता है कि भाजपा या संघ में कुछ चल रहा है. भाजपा या संघ आरक्षण वाली बहस को शुरू करना चाहते हैं और इसलिए वे इस तंत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं.

हम नहीं जानते, लेकिन समय बताएगा कि सच क्या है. अफवाह है कि संघ परिवार दिसंबर में, जब अमित शाह का कार्यकाल खत्म होगा, तब नितिन गडकरी को भाजपा अध्यक्ष बनाएगा और अमित शाह गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए जाएंगे. ऐसा सब सुनने में आ रहा है. यह भी सुनने में आ रहा है कि अमित शाह आनंदी बेन पटेल से खुश नहीं हैं और इसलिए गुप्त रूप से इस आंदोलन को प्रोत्साहित कर रहे हैं. यह सब राजनीति में चलता रहता है और सच इतनी आसानी से बाहर नहीं आता.

लेकिन, जहां तक देश का सवाल है, तो यदि सवर्ण भी आरक्षण के लिए आंदोलन शुरू करते हैं, तब हमारे लिए एक बहुत ही मुश्किल स्थिति होगी.यह समस्या नियंत्रण से बाहर चली जाए, उससे पहले इसका समाधान निकालना होगा.

loading...